100 साल से ज्यादा पुराना है ट्रैफिक लाइट का राज, जानें लाल-पीला-हरा ही क्यों है खास
सड़क पर लाल, पीली और हरी बत्ती इतनी आम है कि इनके पीछे की कहानी पर शायद ही कोई गौर करता है। लेकिन इन तीन रंगों का चुनाव यूं ही नहीं हुआ। बढ़ते ट्रैफिक और सड़क हादसों के बीच ऐसी व्यवस्था की जरूरत पड़ी, जिसे हर कोई आसानी से समझ सके। यहीं से इन रंगों की कहानी शुरू हुई
आज ट्रैफिक सिग्नल के ये तीन रंग दुनिया के लगभग हर हिस्से में पहचाने जाते हैं।
सड़क पर लाल, पीली और हरी बत्ती हमारे रोजमर्रा के जीवन का इतना सामान्य हिस्सा है कि शायद ही कभी मन में सवाल आता हो कि ट्रैफिक सिग्नल के लिए आखिर इन्हीं तीन रंगों को क्यों चुना गया। लेकिन इन रंगों के पीछे की कहानी काफी दिलचस्प और पुरानी है। आज से एक सदी से भी पहले, जब शहरों की सड़कें कारों, साइकिलों, घोड़ागाड़ियों, ट्राम और पैदल यात्रियों से तेजी से भरने लगी थीं, तब यातायात को संभालना बड़ी चुनौती बन गया था। हर तरफ बढ़ती भीड़ के बीच दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ रहा था।
ऐसे में एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत महसूस हुई, जिसे सड़क पर मौजूद हर व्यक्ति आसानी से समझ सके। धीरे-धीरे संकेतों की तकनीक विकसित हुई और लाल, पीले व हरे रंगों ने अपनी खास जगह बना ली। लेकिन इन तीनों रंगों का चुनाव सिर्फ पसंद के आधार पर नहीं हुआ था, बल्कि इसके पीछे सुरक्षा और स्पष्टता से जुड़ी खास वजहें थीं।
1868 में लंदन से हुई शुरुआत
दुनिया की पहली ट्रैफिक लाइट 1868 में लंदन में लगाई गई थी। इसका डिजाइन रेलवे सिग्नल से प्रेरित था और इसमें गैस से रोशन होने वाली व्यवस्था थी। इसमें केवल दो संकेत थे रुकना और आगे बढ़ना।जैसे-जैसे शहरों में वाहनों की संख्या बढ़ी, चौराहों पर पुलिसकर्मियों को खड़े होकर ट्रैफिक संभालना पड़ता था। लेकिन बढ़ती भीड़ के बीच यह तरीका हादसों को पूरी तरह रोकने के लिए पर्याप्त नहीं था।
सड़कों पर बढ़े हादसे तो बदलने लगी व्यवस्था
20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका की सड़कों पर वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ी और ट्रैफिक हादसे भी गंभीर समस्या बनने लगे। 1924 में अमेरिका में सड़क दुर्घटनाओं के कारण करीब 23,600 लोगों की मौत और 7 लाख लोग घायल होने की रिपोर्ट सामने आई। इसी दौर में इलेक्ट्रिक ट्रैफिक सिग्नल कई शहरों में दिखाई देने लगे। शुरुआती सिग्नलों में मुख्य रूप से लाल और हरे रंग का इस्तेमाल होता था।
William Potts ने जोड़ा तीसरा रंग
सिग्नल की दुनिया में बड़ा बदलाव 1920 में आया। डेट्रॉयट के पुलिस अधिकारी William Potts ने पहला चार-तरफा, तीन-रंग वाला ट्रैफिक सिग्नल विकसित किया। लाल और हरे के बीच पीला रंग जोड़ने का मकसद ड्राइवरों को अचानक रुकने के बजाय पहले से चेतावनी देना था। धीरे-धीरे यही लाल-पीला-हरा व्यवस्था दुनियाभर में लोकप्रिय हो गई।
लाल रंग को ही Stop क्यों बनाया गया?
लाल रंग का इस्तेमाल ट्रैफिक लाइट से काफी पहले रेलवे में किया जाता था। इसकी बड़ी वजह थी इसकी दूर से दिखाई देने की क्षमता। धुंध और कम रोशनी जैसी परिस्थितियों में भी लाल रंग अपेक्षाकृत आसानी से नजर आ जाता है। यही वजह रही कि लाल रंग को रुकने के संकेत के तौर पर अपनाना स्वाभाविक और सुरक्षित माना गया।
हरा रंग Go का संकेत कैसे बना?
दिलचस्प बात यह है कि हरा रंग हमेशा से “Go” का संकेत नहीं था। कुछ शुरुआती सिग्नल प्रणालियों में सफेद रंग का इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन सफेद रोशनी को लोग तारों या दूसरी रोशनियों से भ्रमित कर सकते थे। इसके मुकाबले हरा रंग ज्यादा स्पष्ट विकल्प साबित हुआ और धीरे-धीरे इसे आगे बढ़ने के संकेत के रूप में अपनाया गया। आंखों को भी आसानी से दिखता है हरा रंग। हरे रंग के पक्ष में एक और वैज्ञानिक वजह थी। इंसानी आंखें हरे प्रकाश के प्रति काफी संवेदनशील होती हैं, इसलिए अलग-अलग परिस्थितियों में इसे पहचानना आसान रहता है। इस तरह हरे रंग ने ड्राइवरों को पहले इस्तेमाल होने वाले सफेद संकेत की तुलना में ज्यादा स्पष्ट संदेश देना शुरू किया।
पीला रंग क्यों जरूरी था?
अगर सिर्फ लाल और हरा रंग होता, तो Go से Stop के बीच अचानक बदलाव ड्राइवरों के लिए मुश्किल पैदा कर सकता था। ऐसे में पीले रंग ने दोनों के बीच एक जरूरी चेतावनी चरण बनाया। पीली बत्ती का मतलब हुआ रफ्तार कम करें और अगले बदलाव के लिए तैयार रहें।
पीला रंग बना Warning का संकेत
पीला रंग दिन और कम रोशनी, दोनों में काफी स्पष्ट दिखाई देता है। इसलिए इसे चेतावनी के लिए उपयुक्त माना गया। लाल, पीले और हरे रंग का क्रम इतना सरल बनाया गया कि ड्राइवर उसे कुछ ही सेकंड में समझ सकें और सुरक्षित प्रतिक्रिया दे सकें।
तीन रंग, लेकिन कहानी बेहद दिलचस्प
आज ट्रैफिक सिग्नल के ये तीन रंग दुनिया के लगभग हर हिस्से में पहचाने जाते हैं। लाल यानी रुकना, पीला यानी सावधान होना और हरा यानी आगे बढ़ना। देखने में यह व्यवस्था बेहद साधारण लगती है, लेकिन इसके पीछे परिवहन, तकनीक और सड़क सुरक्षा में हुए वर्षों के बदलाव की लंबी कहानी छिपी है।