पाकिस्तान को 'झूठा' बताने से लेकर 'ऑयल डील' तक... ट्रंप का कैसे हुआ हृदय परिवर्तन और क्या है कारण?
पाकिस्तान के साथ ट्रंप की इस नई डील की टाइमिंग को कई भी नजरअंदाज नहीं कर पाएगा, क्योंकि इस डील का ऐलान भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद हुआ। इतना ही नहीं ट्रंप ने रूस से तेल और हथियार खरीदने को लेकर भारत पर टैरिफ से अलग पेनल्टी लगाने का भी ऐलान किया
पाकिस्तान को 'झूठा' बताने से लेकर 'ऑयल डील' तक... ट्रंप का कैसे हुआ हृदय परिवर्तन और क्या है कारण? (PHOTO-AI)
'उन्होंने हमें झूठ और धोखे के अलावा कुछ नहीं दिया' ये शब्द थे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के, जिन्होंने 2018 में पाकिस्तान को लेकर ये बात कही थी। ये वाकया उनके पहले कार्यकाल था, लेकिन अब अपने दूसरे कार्यकाल में, ऐसा लगता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस्लामाबाद के प्रति अपना रुख बदल दिया है और दोनों देशों के बीच संबंध और ज्यादा घनिष्ठ होते जा रहे हैं।
दरअसल, बुधवार 30 जुलाई को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया कि वाशिंगटन ने इस्लामाबाद के साथ एक बड़ी डील साइन की है, जिसके तहत अमेरिका पाकिस्तान के भीतर साथ मिलकर, देश के "बड़े तेल भंडार" को विकसित करेगा।
पाकिस्तान के साथ ट्रंप की इस नई डील की टाइमिंग को कई भी नजरअंदाज नहीं कर पाएगा, क्योंकि इस डील का ऐलान भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद हुआ। इतना ही नहीं ट्रंप ने रूस से तेल और हथियार खरीदने को लेकर भारत पर टैरिफ से अलग पेनल्टी लगाने का भी ऐलान किया।
तेल भंडार समझौता अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों एक नहीं कहानी बयां करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप और इस एशियाई देश के बीच संबंधों में एक नया मोड़ आ रहा है। लेकिन पड़ोसी भारत के लिए इसका क्या मतलब है और क्या हमें परेशना होना चाहिए? आज यही समझते हैं।
पाकिस्तान के साथ ट्रंप की 'बड़ी ऑयल डील'
बुधवार को, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि उनके प्रशासन ने दक्षिण एशियाई देश पाकिस्तान के तेल भंडार को विकसित करने के लिए उसके साथ एक समझौता किया है।
ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा, "हमने अभी-अभी पाकिस्तान के साथ एक समझौता किया है, जिसके तहत पाकिस्तान और अमेरिका अपने विशाल तेल भंडार को विकसित करने के लिए मिलकर काम करेंगे।"
उन्होंने कहा, "हम उस तेल कंपनी को चुनने की प्रक्रिया में हैं, जो इस पार्टनरशिप को लीड करेगी।"
हालांकि, इस समझौते के बारे में अभी और ज्यादा डिटेल उपलब्ध नहीं है, लेकिन अपने तट पर बड़े तेल भंडारों का इस्तेमाल करने की दिशा में इस्लामाबाद की ओर से उठाया गया ये पहला बड़ा कदम है।
यह ऑयल डील पाकिस्तान और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत के बीच हुई है। पिछले हफ्ते, पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने शुक्रवार को विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुलाकात के बाद कहा था कि दोनों देश एक ट्रेड डील करने के "बहुत करीब" हैं, जो कुछ ही दिनों में हो सकता है।
पाकिस्तान ने अमेरिकी जनरल को दिया उच्च सम्मान
हालांकि, तेल और व्यापार समझौता इस बात का सिर्फ एक संकेत है कि इस्लामाबाद और वाशिंगटन एक-दूसरे के साथ घनिष्ठ संबंध बना रहे हैं। कुछ दिन पहले ही पाकिस्तान ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड (USCENTCOM) के प्रमुख जनरल माइकल कुरिल्ला को देश के सर्वोच्च राजकीय सम्मानों में से एक, निशान-ए-इम्तियाज (सैन्य) से सम्मानित किया था।
इस्लामाबाद में राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक सरकारी समारोह में पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने क्षेत्रीय शांति को बढ़ावा देने और अमेरिका-पाकिस्तान सैन्य संबंधों को बढ़ाने में उनकी भूमिका के लिए कुरिल्ला को इस पुरस्कार से नवाजा, जो वाशिंगटन के लिए एक प्रतीकात्मक और रणनीतिक संकेत है।
इससे पहले कुरिल्ला ने आतंकवाद के खिलाफ इस्लामाबाद की "शानदार साझेदारी" की तारीफ की थी, जिसके कुछ हफ्ते बाद ही अमेरिकी जनरल को ये बड़ा सम्मान मिला।
ट्रंप के साथ मुनीर का लंच
ट्रंप और पाकिस्तान के बीच संबंधों में बदलाव का सबसे बड़ा संकेत जून के मध्य में तब मिला, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने व्हाइट हाउस में पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को लंच पर बुलाया। यह पहली बार था, जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान के किसी ऐसे सैन्य प्रमुख की मेजबानी की जो उस देश का राष्ट्राध्यक्ष भी नहीं है।
यह साफ नहीं है कि बंद दरवाजों के पीछे दोनों के बीच क्या बातचीत हुई, लेकिन व्हाइट हाउस की प्रवक्ता अन्ना केली के हवाले से बताया गया कि दोनों के बीच यह बैठक ऐसे समय हुई, जब पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध को रोकने में उनकी भूमिका के लिए ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार देने की पैरवी की।
इससे भी ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि मुनीर के ट्रंप के साथ लंच के बाद जुलाई के पहले हफ्ते में पाकिस्तानी वायुसेना प्रमुख जहीर अहमद बाबर सिद्धू वाशिंगटन आए। उन्होंने "द्विपक्षीय रक्षा सहयोग और आपसी हितों को और बढ़ाने" के लिए पेंटागन, विदेश विभाग और कैपिटल हिल में हाई लेवल बैठकें कीं।
कई विश्लेषकों ने बताया कि सिद्धू की यात्रा का मकसद अमेरिकी मिलिट्री हार्डवेयर हासिल करना था। पाकिस्तान को उम्मीद है कि वह अमेरिका निर्मित F-16 ब्लॉक 70 फाइटर जेट, AIM-7 स्पैरो हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और अमेरिका निर्मित हाई मोबिलिटी आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम (HIMARS) की बैटरियां हासिल कर सकेगा।
पाकिस्तान के प्रति ट्रंप का हृदय परिवर्तन
सालों की कूटनीतिक सुस्ती के बाद, ट्रंप के नेतृत्व में पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ तेजी से रिश्ते फिर से कायम किए हैं। दरअसल, ट्रंप के पूर्ववर्ती जो बाइडन ने पाकिस्तान से दूरी बना ली थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान से फोन पर बात तक करने से इनकार कर दिया था।
हालांकि, जनवरी में सत्ता में आने के तुरंत बाद, ट्रंप ने सब कुछ बदल दिया। उन्होंने 4 मार्च को कांग्रेस के संयुक्त सत्र में अपने पहले संबोधन में, एबी गेट बम विस्फोट के मास्टरमाइंड की गिरफ्तारी में मदद के लिए पाकिस्तान का भी जिक्र किया और उसे धन्यवाद दिया।
अधिकारियों ने बताया कि दो बड़े कारणों से पाकिस्तान को ट्रंप का भरोसा जीतने में मदद मिली- क्रिप्टोकरेंसी को अपनाना और ट्रंप परिवार से जुड़ी फर्म वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल के साथ पार्टनरशिप करना, और 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति के नाम की पैरवी करना ।
ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान को ट्रंप के साथ नजदीकियां बढ़ाने में भी मदद की है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत ने इन दावों का खंडन किया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने दोनों देशों के बीच युद्धविराम कराने में मदद की, लेकिन इस्लामाबाद ने उनकी भूमिका को कबूला है।
वाशिंगटन में एडवाइजरी फर्म पोलिटैक्ट के मुख्य रणनीतिकार आरिफ अंसार ने Al Jazeera को बताया कि टकराव के दौरान पाकिस्तान के सैन्य प्रदर्शन को देखर ट्रंप इसमें शामिल होने के लिए प्रेरित हुए।
अंसार ने कहा, "इसने यह दर्शाया कि अपनी राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद, देश अपने से कहीं बड़े प्रतिद्वंद्वी को मात दे सकता है।" उन्होंने आगे कहा, "इसी वजह से राष्ट्रपति ट्रंप अपने मूल रणनीतिक हितों के आधार पर पाकिस्तान के पारंपरिक सत्ता केंद्रों के साथ जुड़ रहे हैं।"
भारत के लिए चिंता की बात?
अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों में सुधार एक बेहद अहम समय पर हो रहा है। ट्रंप इस्लामाबाद के प्रति नरम रुख अपनाते दिख रहे हैं, वहीं भारत के प्रति उनका रुख सख्त है। उन्होंने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ और "रूस पेनल्टी" लगा दी है।
अपने प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में ट्रंप ने कहा कि सालों से भारत की संरक्षणवादी नीतियों के कारण अमेरिका ने उनके साथ उम्मीद से कम व्यापार किया है।
उन्होंने लिखा, "इसके अलावा, उन्होंने हमेशा अपने सैन्य उपकरणों का एक बड़ा हिस्सा रूस से ही खरीदा है, और चीन के साथ, वो भी रूस के सबसे बड़े ऊर्जा खरीदार हैं, वो भी ऐसे समय में जब हर कोई चाहता है कि रूस यूक्रेन में हत्याएं बंद करे- ये सब ठीक नहीं है!" हालांकि, उन्होंने यह साफ नहीं किया कि नए घोषित 25 प्रतिशत टैरिफ के अलावा लगाई गया "जुर्माना" क्या और कितना होगा।
बाद में उन्होंने भारत को अपना "दोस्त" बताते हुए कहा कि वाशिंगटन अभी भी नई दिल्ली के साथ बातचीत कर रहा है और हफ्ते के आखिर तक स्थिति साफ हो जाएगी।
ट्रंप ने कहा, "अब भारत के पास दुनिया में सबसे ज्यादा टैक्स में से एक है, लेकिन वे इसे बहुत कम करने को तैयार हैं… हम अभी भारत से बात कर रहे हैं, देखते हैं क्या होता है। आपको इस हफ्ते के आखिर तक पता चल जाएगा।"
FirstPost के मुताबिक, विशेषज्ञों को यह भी डर है कि "अमेरिका और पाकिस्तान के बीच बढ़ती बातचीत के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध फिर से उलझ सकते हैं। इसके साथ ही, भारत, इस्लामाबाद के साथ न सिर्फ वाशिंगटन बल्कि बीजिंग के भी अच्छे संबंधों को बर्दाश्त नहीं कर सकता। यह स्थिति भारत को वैश्विक मंच पर मुश्किल परिस्थिति में डाल सकती है।"
लेकिन उनका का यह भी मानना है कि "ट्रंप प्रशासन में कुछ भी स्थायी नहीं है"। जैसा कि सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क (CUNY) के लेक्चरर रजा अहमद रूमी ने बताया, "पिछले प्रेम-संबंधों की तरह, अमेरिका और पाकिस्तान के ये संबंध भी रणनीतिक लक्ष्यों की पूर्ति या सत्ता परिवर्तन के बाद फीके पड़ सकते हैं।" खैर आगे क्या होता है, यह देखने के लिए हमें फिलहाल और इंतजार करना होगा।