साइंस की अविश्वसनीय छलांग, तीन माता-पिता से पैदा हुए बच्चे मुक्त हैं इस जेनेटिक बीमारी से

साइंस ने वो कर दिखाया है, जिसे कुदरत ने नकार दिया था। एक बच्चे के जन्म में तीन बायेलॉजिकल माता-पिता का योगदान और उसका माइटोकॉन्ड्रियल डिसऑर्डर से मुक्त होना वरदान जैसा ही है। ब्रिटेन के डॉक्टरों ने ये करिश्मा किया है, जिसमें 8 बच्चों का जन्म हुआ है और वे इस वंशानुगत बीमारी से मुक्त हैं।

अपडेटेड Jul 21, 2025 पर 6:18 PM
Story continues below Advertisement

ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने जानलेना वंशानुगत बीमारी माइटोकॉन्ड्रियल डिसऑर्डर के खिलाफ बड़ी सफलता पाई है। वैज्ञानिकों ने इस बीमारी को हराने का तरीका खोज निकाला है। ब्रिटेन में 8 ऐसे बच्चों का जन्म हुआ है, जिनमें तीन माता-पिता का योगदान शामिल है। ब्रिटेन में इस तकनीक को कानूनी मान्यता प्राप्त है, लेकिन पहली बार इसकी मदद से माइटोकॉन्ड्रियल डिसऑर्डर पर काबू पाने में सफलता का पुख्ता सबूत मिला है। साइंस जहां दिलचस्प है, वहीं जटिल भी है और इस मामले में इसके कल्चरल इम्प्लिकेशन भी हैं, खासतौर से भारत के संदर्भ में।

न्यूकासल यूनिवर्सिटी और न्यूकासल अपॉन टाइन हॉस्पिटल्स एनएचएस फाउंडेशन ने इस तकनीक को 10 साल पहले विकसित किया था और 2017 में एनएचएस की विशेष सेवा के तहत इसकी शुरुआत की गई थी। इस प्रक्रिया को अपनाने वाले अभिभावकों के संदर्भ में न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में दो रिपोर्ट छपी हैं, जिसके मुताबिक अब तक 22 परिवार इस तकनीक से गुजर चुके हैं। इस प्रक्रिया से सफलतापूर्वक गुजरने वाले परिवारों ने गोपनियता की शर्त पर न्यूकासल फर्टिलिटि सेंटर के जरिये बयान जारी कर कहा, ‘सालों इंतजार करने के बाद इस तकनीक ने हमें उम्मीद दी। हमें हमारा बच्चा मिला है। उन्हें जिंदगी और उम्मीद से भरा हुआ देखकर हमें बेहद खुशी होती है।’

क्या है माइटोकॉन्ड्रियल डिसऑर्डर बीमारी

इस बीमारी में शरीर की ताकत खत्म हो जाती है। ये बीमारी बच्चे को मां से मिलती है। माइटोकॉन्ड्रिया सेल का पावरहाउस होता है। ये हमारे शरीर के सेल्स में मौजूद होते हैं और इनका काम होता है ऑक्सीजन का इस्तेमाल कर खाने को एनर्जी में बदलना। इसी एनर्जी की मदद से हमारा शरीर काम करता है। माइटोकॉन्ड्रिया की बीमारी होने पर बॉडी में इतनी ताकत भी नहीं होती है कि इसके अंग अपना सामान्य काम कर पाएं। इस बीमारी के शिकार कुछ बच्चे जन्म के कुछ ही समय बाद दम तोड़ देते हैं, तो कुछ के अंग काम करना बंद कर देते हैं।

क्या है 3 पेरेंट टेक्नीक

इस तकनीक में मां और पिता के एग और स्पर्म को एक डोनर महिला के एग से मिलाया जाता है। माता-पिता के अलावा इस तकनीक में शामिल तीसरी महिला के स्वस्थ माइटोकॉन्ड्रिया लिए जाते हैं। मां के साथ डोनर महिला के एग को पिता के स्पर्म के साथ लैब में फर्टिलाइज किया जाता है। स्पर्म और एग से बने डीएनए के एक जोड़ी अंग बनने तक ये भ्रूण (फीटस) लैब में रहता है। ये प्रो न्यूक्लिआई प्रोसेस होती है, जिसमें शरीर के बनने की जानकारी होती है। इसके बाद दोनों फीटस से प्रो न्यूक्लिआई निकाल लिया जाता है और पेरेंट्स के डीएनए को हेल्दी माइटोकॉन्ड्रिया वाले फीटस में डाल दिया जाता है। इस तरह से जन्म लेने वाले बच्चों में ये वंशानुगत बीमारी नहीं होती है और वो अपने पेरेंट से बायोलॉजिकली जुड़े होते हैं। उन्हें अपना ज्यादातर डीएनए अपने बायलॉजिकल पेरेंट से मिलता है, यानी उन्हें अपना जेनिटिक ब्लूप्रिंट मिलता है। खास बात ये है कि उन्हें दूसरी महिला से भी 0.1% डीएनए मिलता है।


अब तक 8 बच्चों का हुआ जन्म

इस तकनीक से अब तक एक जुड़वा बच्चे समेत 8 बच्चों का जन्म हो चुका है। इनमें 4 लड़के और 4 लड़कियां शामिल हैं। इन बच्चों की उम्र एक साल से अधिक हो चुकी है और ये सभी माइटोकॉन्ड्रिया डिसऑर्डर से मुक्त हैं। एक-दो मामलों में कुछ बच्चों को दिक्कत हुईं थीं, लेकिन इनमें से कोई भी खराब माइटोकॉन्ड्रिया की वजह से नहीं थी।

गुटबाजी या फंड जुटाने की कोशिश? जेडी वेंस और रूपर्ट मर्डोक की मुलाकात ने अमेरिकी राजनीति में मचाई हलचल

हिंदी में शेयर बाजार स्टॉक मार्केट न्यूज़,  बिजनेस न्यूज़,  पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App  डाउनलोड करें।