US-Iran Peace Deal: ईरान को ट्रंप पर नहीं है भरोसा! अमेरिका के साथ हुई शांति डील पर कर दी नई मांग

US-Iran Peace Deal: अमेरिका और ईरान ने जारी युद्ध को खत्म करने के मकसद से एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। रॉयटर्स को एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि इस दस्तावेज पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेरी गालिबाफ ने साइन किए

अपडेटेड Jun 16, 2026 पर 7:44 AM
US-Iran Peace Deal: ईरान चाहता है कि अमेरिका के साथ हुई शांति डील पर संयुक्त राष्ट्र की मुहर लगे

US-Iran Peace Deal: ईरान और अमेरिका 19 जून को जिनेवा में अपने 'मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' (MoU) पर औपचारिक रूप से साइन करने वाले हैं। 14-सूत्रीय समझौते की एक शर्त पर शायद प्रतिबंधों में ढील और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के फिर से खुलने जितनी चर्चा न हो। लेकिन कानूनी नतीजों के लिहाज से इसमें उन सबसे ज्यादा असरदार होने की क्षमता है। इस बीच, ऐसा लग रहा है कि ईरान को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भरोसा नहीं है। यही वजह है कि ईरान चाहता है कि अमेरिका के साथ हुई शांति डील पर UNSC की मुहर लगे।

ईरान की सरकारी 'मेहर न्यूज एजेंसी' द्वारा जारी MoU की 13वीं शर्त में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के फैसले के जरिए अंतिम समझौते की मंजूरी (ratification) की बात कही गई है। 'मंजूरी' (ratification) और 'सुरक्षा परिषद' (Security Council) ये दो शब्द ऐसी शब्दावली का हिस्सा हैं जो लोगों को अलग-अलग तो शायद ही कभी सुनने को मिलते हों।

अनुसमर्थन (ratification) वह तरीका है जिससे कोई देश औपचारिक रूप से कहता है, 'हम कानूनी तौर पर इसके लिए बाध्य हैं।' अंतरराष्ट्रीय कानून में अनुसमर्थन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई देश किसी संधि से बंधे रहने के लिए अपनी सहमति देता है। किसी समझौते पर साइन करना केवल इरादा जताना है। अनुसमर्थन कानूनी नतीजों वाली सहमति है। असल में इन दोनों के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है।


कोई देश समझौते पर साइन कर सकता है और औपचारिक अनुसमर्थन पूरा होने से पहले पीछे हट सकता है। लेकिन एक बार अनुसमर्थन हो जाने के बाद समझौता देश की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रतिबद्धताओं के पूरे भार के साथ लागू हो जाता है।

अनुसमर्थन प्रक्रिया में आमतौर पर देश की संसद या संसदीय निकायों से समझौते को मंजूरी लेनी पड़ती है, अगर देश के संविधान में ऐसा प्रावधान हो। उदाहरण के लिए अमेरिका में प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संधियों के लिए सीनेट से दो-तिहाई बहुमत की मंजूरी की आवश्यकता होती है।

ईरान में अनुसमर्थन की प्रक्रिया 'इस्लामिक कंसल्टेटिव असेंबली' और 'गार्जियन काउंसिल' से होकर गुजरती है। अनुसमर्थन के दस्तावेज पर राष्ट्राध्यक्ष, सरकार के प्रमुख या विदेश मंत्री के हस्ताक्षर होने चाहिए। तभी यह कानूनी रूप से प्रभावी होता है। इसलिए, अनुसमर्थन 'हमने सहमति दी' से लेकर 'हम बाध्य हैं' तक का पूरा एक सफर है।

धारा 13 में ईरान जो मांग कर रहा है, वह सामान्य द्विपक्षीय मंजूरी से कहीं ज्यादा है। वह चाहता है कि अंतिम समझौते को न केवल दोनों देश अपने यहां मंजूरी दें, बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद भी इसके लिए औपचारिक फैसला ले। ईरान की यह सबसे खास और अहम मांग है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद क्या है और यह क्या कर सकती है?

संयुक्त राष्ट्र के कई अंग हैं। लेकिन सुरक्षा परिषद ही एकमात्र ऐसा अंग है जिसके फैसले सभी 193 सदस्य देशों पर बाध्यकारी होते हैं। संयुक्त राष्ट्र का कोई अन्य अंग देशों को कार्रवाई करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। महासभा सिफारिश कर सकती है। बहस कर सकती है और निंदा कर सकती है। लेकिन उसके प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं होते।

सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य हैं। चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका, जिन्हें सामूहिक रूप से P5 कहा जाता है। इनमें से कोई भी सदस्य किसी प्रस्ताव को वीटो कर सकता है। 10 अन्य सदस्य दो साल के कार्यकाल के लिए बारी-बारी से आते हैं। हालांकि, उनके पास वीटो का अधिकार नहीं होता है।

ईरान और अमेरिका में हुई डील

अमेरिका और ईरान के बीच 107 दिन तक जारी रहे युद्ध को समाप्त करने और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने पर सहमति बन गई है। दोनों देशों के बीच समझौते पर शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में साइन किए जाएंगे।

अधिकारियों ने बताया कि शांति समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर किए जाएंगे। ट्रंप ने कहा कि समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य फिर से खोला जाएगा और ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकेबंदी समाप्त कर दी जाएगी।

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समझौते को अंतिम रूप दिए जाने से कुछ घंटे पहले बेरूत में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर इजरायल के हवाई हमलों के कारण तनाव बढ़ गया। ट्रंप की इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ तीखी बातचीत हुई। ट्रंप ने अमेरिकी मीडिया को बताया कि उन्होंने नेतन्याहू और ईरानी वार्ताकारों, दोनों से नए हमले नहीं करने को कहा है।

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