Ayatollah Ali Khamenei: ईरान के सबसे शक्तिशाली नेता और 'इस्लामी क्रांति' के ध्वजवाहक अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो चुकी है। शनिवार, 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के एक संयुक्त हवाई हमले में उनकी मृत्यु हो गई। 86 वर्षीय खामेनेई पिछले 36 वर्षों से ईरान के सर्वोच्च नेता थे। ईरानी मीडिया और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दोनों ने इस खबर की पुष्टि की है। ट्रंप ने कहा कि खामेनेई अमेरिकी खुफिया तंत्र और आधुनिक ट्रैकिंग सिस्टम से बच नहीं सके।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, यह एक बेहद सटीक और सुनियोजित सैन्य अभियान था। शनिवार सुबह खामेनेई के परिसर को निशाना बनाकर हवाई हमला किया गया। ईरान की 'तस्नीम न्यूज एजेंसी' ने इसे एक 'शहादत' करार देते हुए कहा कि अमेरिका और इजरायल ने मिलकर इस हमले को अंजाम दिया। यह हमला ऐसे समय में हुआ जब ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव अपने चरम पर था।
खामेनेई का राजनीतिक सफर संघर्षों से भरा रहा:
क्रांति की शुरुआत: 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद वे ईरान के एक प्रमुख स्तंभ बने।
इराक युद्ध: 1980 के दशक में इराक के साथ खूनी युद्ध के दौरान वे ईरान के राष्ट्रपति थे। इस युद्ध ने उनके मन में पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका के प्रति गहरा अविश्वास पैदा कर दिया।
सर्वोच्च पद: 1989 में अयातुल्ला खुमैनी की मृत्यु के बाद उन्हें ईरान का सर्वोच्च नेता चुना गया। तब से लेकर आज तक, ईरान की सेना, अर्थव्यवस्था और विदेशी नीति पर उनका एकछत्र राज था।
आधुनिक ईरान के सबसे शक्तिशाली वास्तुकार
अयातुल्ला अली खामेनेई ने साल 1989 में अयातुल्ला खुमैनी के निधन के बाद ईरान की कमान संभाली और करीब 36 वर्षों तक देश के सर्वोच्च नेता बने रहे। उनका जन्म 1939 में मशहद के एक धार्मिक परिवार में हुआ था। राष्ट्रपति के रूप में इराक के साथ लंबे और भीषण युद्ध का अनुभव लेने के बाद, उन्होंने ईरान को एक ऐसी सैन्य शक्ति के रूप में विकसित किया जो बाहरी दबाव के सामने झुकने को तैयार नहीं थी। उन्होंने 'रिवोल्यूशनरी गार्ड्स' (IRGC) को न केवल सेना, बल्कि एक विशाल आर्थिक और राजनीतिक संस्थान बना दिया, जिससे ईरान का प्रभाव लेबनान, सीरिया और यमन जैसे देशों तक फैल गया।
वैश्विक संघर्ष और घरेलू चुनौतियों के बीच नेतृत्व
खामेनेई का पूरा कार्यकाल पश्चिम, विशेषकर अमेरिका और इजरायल के साथ निरंतर संघर्ष और अविश्वास की कहानी रहा है। उन्होंने 'प्रतिरोध की अर्थव्यवस्था' का नारा दिया ताकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद देश टिका रहे। हालांकि, उनके शासन को देश के भीतर भी कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। जहां एक ओर वे परमाणु कार्यक्रम को लेकर दुनिया से लोहा ले रहे थे, वहीं दूसरी ओर ईरान की युवा आबादी उनके कट्टरपंथी सामाजिक नियमों और गिरती अर्थव्यवस्था के खिलाफ सड़कों पर उतरती रही। उनके निधन के समय ईरान एक तरफ बाहरी युद्ध की विभीषिका झेल रहा था और दूसरी तरफ देश के भीतर दशकों के सबसे बड़े जन-आंदोलन का सामना कर रहा था।
भले ही वे बाहर एक सख्त नेता थे, लेकिन देश के भीतर उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। ईरान की युवा पीढ़ी उनके कट्टरपंथी नियमों और आर्थिक पाबंदियों से परेशान थी। 2009 के चुनावी विवाद, 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद हुए प्रदर्शन और हाल ही में जनवरी 2026 में आर्थिक तंगी को लेकर हुए देशव्यापी आंदोलनों ने उनकी सत्ता की नींव हिला दी थी। हालिया प्रदर्शनों में सुरक्षा बलों की कार्रवाई में हजारों लोग मारे गए थे।
परमाणु युद्ध की आहट और अंतिम संघर्ष
खामेनेई के अंतिम दिन युद्ध की छाया में बीते। जून 2025 में इजरायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर बड़ा हमला किया था, जिसके जवाब में ईरान ने तेल अवीव पर मिसाइलें दागी थीं। अमेरिका ने 2003 के इराक युद्ध के बाद पहली बार इस क्षेत्र में अपनी सबसे बड़ी सेना तैनात की। ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया था कि वे ईरान में 'सत्ता परिवर्तन' चाहते हैं।
खामेनेई की मौत के बाद ईरान और पूरा मध्य पूर्व एक अनिश्चित मोड़ पर खड़ा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरानी जनता से अपनी सरकार खुद संभालने की अपील की है। अब सवाल यह है कि क्या ईरान में एक और क्रांति होगी या फिर सेना सत्ता अपने हाथ में ले लेगी।