19 सीटों वाली अरब पार्टियों के हाथ में इजरायल की सत्ता की चाबी? नेतन्याहू का अब क्या होगा, समझिए पूरा चुनावी गणित

इजरायल में चुनाव जीतने और सरकार बनाने के बीच फंसा सत्ता का गणित। नेतन्याहू की लिकुड सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन 61 सीटों का बहुमत किसी भी खेमे के पास नहीं है। ऐसे में 19 सीटों वाली अरब पार्टियों की भूमिका, विपक्ष की राजनीतिक सीमाएं और संभावित यूनिटी गवर्नमेंट का गणित समझिए।

अपडेटेड Oct 30, 2026 पर 9:09 AM
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इजरायल के 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव की मतगणना पूरी हो चुकी है। अंतिम मतगणना में सैनिकों, विदेशों में तैनात राजनयिकों, कैदियों और अस्पतालों में भर्ती मतदाताओं के विशेष मतपत्र भी शामिल किए गए। इन मतों को डबल-एनवलप बैलेट कहा जाता है।

इजरायल के संसदीय चुनाव के नतीजों ने देश की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन उनका गठबंधन सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत हासिल नहीं कर सका है। आपको बता दें कि 120 सदस्यों वाली इजरायली संसद यानी नेसेट (Knesset) में बहुमत के लिए 61 सीटों की जरूरत है जबकि नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को महज 53 सीटें मिली हैं। दूसरी तरफ उन्हें सत्ता से हटाने के लिए चुनाव लड़ने वाले विपक्षी गठबंधन के पास 48 सीटें हैं।

इस पूरे चुनावी गणित में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उन दो अरब राजनीतिक दलों की हो गई है, जिन्होंने मिलकर 19 सीटें हासिल की हैं। इनमें जॉइंट लिस्ट को 11 और Ra'am पार्टी को 8 सीटें मिली हैं। दोनों दलों की सीटें जोड़ दें तो यह संख्या किसी भी गठबंधन को बहुमत के आंकड़े तक पहुंचाने में अहम साबित हो सकती हैं।

यानी चुनाव में न तो नेतन्याहू का गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति में स्पष्ट बहुमत हासिल कर सका और न ही उन्हें चुनौती देने वाला विपक्ष। अब सरकार बनाने के लिए राजनीतिक दलों के बीच बातचीत, संभावित गठबंधन और समर्थन जुटाने की कोशिशें अहम होंगी। ऐसे में सवाल है कि क्या नेतन्याहू एक बार फिर प्रधानमंत्री बने रहेंगे या फिर विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट अरब पार्टियों के समर्थन से नई सरकार बनाने की कोशिश करेंगे?


इजरायल चुनाव के नतीजों में किसे कितनी सीटें मिलीं?

इजरायल के 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव की मतगणना पूरी हो चुकी है। अंतिम मतगणना में सैनिकों, विदेशों में तैनात राजनयिकों, कैदियों और अस्पतालों में भर्ती मतदाताओं के विशेष मतपत्र भी शामिल किए गए। इन मतों को डबल-एनवलप बैलेट कहा जाता है। इनकी गिनती के बाद भी प्रमुख राजनीतिक गठबंधनों की सीटों के गणित में कोई बदलाव नहीं हुआ। सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के आंकड़ों के मुताबिक, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है। वहीं गादी आइजेनकोट की याशर पार्टी ने 21 सीटें हासिल की हैं। यहां नीचे एक नजर में देखिए इजरायल के पूरे चुनावी नतीजे-

लिकुड (बेंजामिन नेतन्याहू) 27 सीटें

याशर (गादी आइजेनकोट) 21 सीटें

बी'याचद (नफ्ताली बेनेट) 12 सीटें

जॉइंट लिस्ट 11 सीटें

डेमोक्रेट्स 8 सीटें

Ra'am 8 सीटें

यूनाइटेड टोरा जूडिज्म 7 सीटें

इजरायल बेतेनु 7 सीटें

ओत्जमा येहुदित 7 सीटें

शास 6 सीटें

रिलिजियस जियोनिज्म 6 सीटें

कुल 120 सीटें

इन नतीजों के आधार पर नेतन्याहू के समर्थन वाले राजनीतिक गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं जबकि गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को 48 सीटें हासिल हुई हैं। दोनों अरब पार्टियों के पास कुल 19 सीटें हैं। यही 19 सीटें अब सरकार बनाने की बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई हैं।

19 सीटों वाली अरब पार्टियां कैसे बन गईं किंगमेकर?

इजरायल के चुनाव में अरब पार्टियों का प्रदर्शन इस बार काफी महत्वपूर्ण रहा है। जॉइंट लिस्ट और Ra'am ने मिलकर 19 सीटें हासिल की हैं। यह इजरायल की संसद में अरब राजनीतिक दलों का अब तक का सबसे बड़ा संयुक्त प्रतिनिधित्व है। चुनाव में नेतन्याहू के विरोधी गठबंधन को 48 सीटें मिली हैं। अगर उसे दोनों अरब पार्टियों का समर्थन मिल जाता है तो उसके पास कुल 67 सीटें हो जाएंगी। यानी बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों के मुकाबले छह सीटें अधिक। इस तरह अरब पार्टियों का समर्थन विपक्षी गठबंधन को सरकार बनाने के लिए जरूरी संसदीय संख्या उपलब्ध करा सकता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि ये पार्टियां सीधे सरकार में शामिल होंगी। एक विकल्प यह भी है कि वे सरकार में शामिल हुए बिना बाहर से समर्थन दें।

इस अंतर को समझना जरूरी है। इजरायल में किसी पार्टी का सरकार में शामिल होना और किसी सरकार को संसद में समर्थन देना दो अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाएं हैं। आइजेनकोट के नेतृत्व में बनने वाली संभावित अल्पमत सरकार अरब पार्टियों के बाहरी समर्थन पर निर्भर हो सकती है। दोनों अरब पार्टियों ने आइजेनकोट के खेमे के साथ सहयोग करने की इच्छा के संकेत दिए हैं। हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर विपक्षी दलों के भीतर भी एक राय नहीं है। फिलहाल केवल डेमोक्रेट्स ने सार्वजनिक तौर पर अरब पार्टियों को सरकार गठन की प्रक्रिया में शामिल करने का समर्थन किया है।

इस मुद्दे पर इजरायल की घरेलू राजनीति में विरोध भी मौजूद है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजरायल के अरब अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर राजनीतिक और सामाजिक माहौल में बदलाव आया है। ऐसे में विपक्ष के लिए अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने का फैसला राजनीतिक रूप से आसान नहीं होगा।

क्या गादी आइजेनकोट अरब पार्टियों के समर्थन से प्रधानमंत्री बन सकते हैं?

नेतन्याहू को चुनौती देने वाले विपक्षी खेमे में गादी आइजेनकोट एक प्रमुख नेता के तौर पर उभरे हैं। उनकी पार्टी याशर को 21 सीटें मिली हैं और यह लिकुड के बाद संसद की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। आइजेनकोट के नेतृत्व वाले खेमे में याशर के अलावा नफ्ताली बेनेट की बी'याचद, डेमोक्रेट्स और एविग्डोर लिबरमैन की इजरायल बेतेनु पार्टी शामिल हैं। इन चारों दलों की कुल सीटें 48 हैं। अगर ये दल दोनों अरब पार्टियों का समर्थन हासिल कर लेते हैं तो संयुक्त संख्या 67 हो जाएगी। इससे संसद में बहुमत का आंकड़ा पार हो जाएगा। लेकिन इसमें एक बड़ी राजनीतिक अड़चन है। आइजेनकोट ने चुनाव प्रचार के दौरान अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने को लेकर जो रुख अपनाया था, उसे बदलना पड़ सकता है। विपक्षी दलों के कई नेताओं ने अरब पार्टियों के समर्थन को लेकर आपत्तियां जताई हैं।

वहीं, नेतन्याहू ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान अरब पार्टियों के समर्थन से बनने वाली सरकार की वैधता पर सवाल उठाए थे। ऐसे में आइजेनकोट के लिए केवल संसदीय संख्या जुटाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन्हें अपने सहयोगी दलों और मतदाताओं के बीच भी इस प्रस्ताव को स्वीकार्य बनाना होगा।

हालांकि इजरायल में इससे पहले भी अरब पार्टी सरकार का हिस्सा बन चुकी है। 2021 में Ra'am पार्टी नफ्ताली बेनेट के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल हुई थी। ऐसा पहली बार हुआ था जब कोई स्वतंत्र अरब राजनीतिक दल इजरायल की गठबंधन सरकार में शामिल हुआ। हालांकि यह सरकार करीब 18 महीने बाद गिर गई थी।

क्या नेतन्याहू विपक्ष के साथ मिलकर बना सकते हैं यूनिटी गवर्नमेंट?

सरकार गठन का दूसरा संभावित रास्ता यूनिटी गवर्नमेंट यानी राष्ट्रीय एकता सरकार का है। इसमें नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उनके विरोध में चुनाव लड़ने वाले कुछ प्रमुख दल एक साथ आ सकते हैं। इस तरह के गठबंधन में गादी आइजेनकोट की याशर, नफ्ताली बेनेट की बी'याचद और एविग्डोर लिबरमैन की इजरायल बेतेनु जैसी पार्टियां शामिल हो सकती हैं।

चुनाव में इन दलों की सीटें इस प्रकार हैं:

लिकुड: 27 सीटें

याशर: 21 सीटें

बी'याचद: 12 सीटें

इजरायल बेतेनु: 7 सीटें

इनके मौजूदा घोषित सीट आंकड़ों को जोड़ने पर कुल संख्या 67 होती है। इस तरह यह गठबंधन भी 61 सीटों के बहुमत के आंकड़े को पार कर सकता है। हालांकि इस विकल्प के सामने राजनीतिक चुनौतियां हैं। नेतन्याहू के मौजूदा राजनीतिक सहयोगियों में दक्षिणपंथी और अति-रूढ़िवादी यहूदी दल शामिल हैं। इनमें ओत्जमा येहुदित, रिलिजियस जियोनिज्म, शास और यूनाइटेड टोरा जूडिज्म जैसे दल हैं। अगर नेतन्याहू विपक्षी दलों के साथ राष्ट्रीय एकता सरकार बनाते हैं तो उन्हें अपने मौजूदा सहयोगियों को छोड़ना पड़ सकता है। दूसरी तरफ विपक्षी दलों ने चुनाव के दौरान नेतन्याहू को सत्ता से हटाने का वादा किया था। ऐसे में उनके साथ सरकार बनाना उनके लिए भी राजनीतिक रूप से मुश्किल फैसला होगा।

फिर भी अगर कई हफ्तों की बातचीत के बाद कोई भी खेमा बहुमत जुटाने में नाकाम रहता है तो यूनिटी गवर्नमेंट एक विकल्प के रूप में सामने आ सकती है। ईरान या क्षेत्र के किसी दूसरे पक्ष के साथ दोबारा सैन्य संघर्ष की स्थिति भी राजनीतिक दलों को एक साथ आने के लिए प्रेरित कर सकती है।

क्या नेतन्याहू अपने विरोधियों को तोड़कर फिर बचा सकते हैं सत्ता?

नेतन्याहू के पास सरकार बनाने का एक और रास्ता है। वह विपक्षी गठबंधन में शामिल कुछ सांसदों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर सकते हैं। इजरायल की राजनीति में नेतन्याहू लंबे समय से गठबंधन बनाने और राजनीतिक समीकरणों को अपने पक्ष में करने की रणनीति अपनाते रहे हैं। 2022 के चुनाव से पहले भी उन्होंने विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक विरोधियों के बीच मतभेदों का फायदा उठाया था और सत्ता में वापसी की थी। इस बार भी वह विपक्षी दलों के कुछ सांसदों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो उनके गठबंधन की संख्या बढ़ सकती है और वह दक्षिणपंथी सरकार बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। हालांकि इस बार चुनौती अलग है। नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं जबकि विपक्षी खेमे के पास 48 सीटें हैं। बहुमत तक पहुंचने के लिए उन्हें कम से कम आठ अतिरिक्त सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी। इसलिए विपक्षी खेमे में टूट की स्थिति पैदा करना उनके लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती होगी।

इजरायल के राष्ट्रपति की क्या होगी भूमिका?

सरकार गठन की प्रक्रिया में इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। चुनावी नतीजों के बाद राष्ट्रपति विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से बातचीत करेंगे। इसके बाद वह उस सांसद को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे, जिसके पास बहुमत जुटाने की सबसे बेहतर संभावना होगी। इस प्रक्रिया में राष्ट्रपति किसी पार्टी को सीधे बहुमत नहीं देते, बल्कि राजनीतिक दलों के समर्थन और गठबंधन बनाने की संभावनाओं को देखते हुए सरकार बनाने का अवसर देते हैं।

जिस उम्मीदवार को सरकार बनाने का जिम्मा मिलेगा, उसे संसद में पर्याप्त समर्थन जुटाना होगा। अगर पहला उम्मीदवार सरकार बनाने में विफल रहता है तो दूसरे उम्मीदवार को भी मौका मिल सकता है। इसके बाद भी कोई समाधान नहीं निकलता है तो नेसेट खुद किसी अन्य उम्मीदवार को नामित कर सकती है। इस पूरी प्रक्रिया के लिए करीब 100 दिनों की समयसीमा है। अगर इस दौरान कोई भी उम्मीदवार सरकार बनाने में सफल नहीं होता है तो देश को एक बार फिर संसदीय चुनाव का सामना करना पड़ सकता है। राष्ट्रपति हर्जोग ने भी राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे खुले मन से बातचीत करें और एक और चुनाव की नौबत आने से बचने के लिए हरसंभव कोशिश करें।

क्या इजरायल में फिर होंगे चुनाव?

अगर नेतन्याहू और विपक्ष दोनों ही बहुमत जुटाने में नाकाम रहते हैं तो इजरायल में दोबारा चुनाव कराने की स्थिति बन सकती है। इसका मतलब होगा कि चुनाव में जनता के जनादेश के बावजूद राजनीतिक दल सरकार बनाने के लिए जरूरी सहमति नहीं बना पाए। हालांकि दोबारा चुनाव होने से पहले राष्ट्रपति की ओर से सरकार गठन के लिए निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया पूरी की जाएगी। नेतन्याहू फिलहाल कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में पद पर बने हुए हैं। जब तक नई सरकार नहीं बनती, तब तक वह इस भूमिका में रहेंगे।

चुनाव में धांधली और विदेशी दखल के आरोपों से भी बढ़ा विवाद

चुनाव के नतीजों के बाद इजरायल में राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है। नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने आरोप लगाया है कि अरब नेतृत्व वाली पार्टियों को वोट खरीदने और अवैध तरीके से मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक पहुंचाने का फायदा मिला। पार्टी की ओर से चुनाव को चोरी किए जाने तक का आरोप लगाया गया है। इजरायल की घरेलू सुरक्षा एजेंसी शिन बेट विदेशी फंडिंग के जरिए अरब क्षेत्रों में मतदान को प्रभावित करने की आशंकाओं की जांच कर रही है। इन आरोपों में कथित तौर पर कतर और तुर्की से जुड़े फंड का भी जिक्र किया गया है। इसके अलावा इजरायल पुलिस की विशेष जांच इकाई लाहव 433 चुनाव में रिश्वतखोरी की आशंकाओं की जांच कर रही है।

सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के चेयरमैन नोआम सोलबर्ग ने शिन बेट प्रमुख डेविड जिनी से विदेशी प्रभाव और अनुचित गतिविधियों के आरोपों की जांच करने को कहा है। वैसे कमेटी के कार्यवाहक महानिदेशक ने चुनावी प्रक्रिया में व्यवस्थित स्तर पर गड़बड़ी के आरोपों को आधारहीन बताया है। कतर ने भी इजरायल के चुनाव में हस्तक्षेप करने के आरोपों को खारिज किया है। अभी तक इन आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है और जांच में ऐसा कोई निष्कर्ष सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो कि चुनाव के नतीजे प्रभावित हुए थे।

नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?

इजरायल के चुनावी नतीजों ने नेतन्याहू के सामने सरकार गठन की चुनौती खड़ी कर दी है। उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनी है लेकिन 53 सीटों के साथ उनका गठबंधन बहुमत से आठ सीटें पीछे है। दूसरी तरफ विपक्ष के पास 48 सीटें हैं और अरब पार्टियों की 19 सीटें उसे बहुमत तक पहुंचा सकती हैं। ऐसे में नेतन्याहू के सामने तीन प्रमुख रास्ते हैं। पहला वह विपक्ष के कुछ सांसदों का समर्थन हासिल करके अपने गठबंधन का विस्तार करें। दूसरा, विपक्षी दलों के साथ राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने पर सहमति बनाएं। तीसरा, अगर कोई भी रास्ता सफल नहीं होता है तो देश में दोबारा चुनाव की स्थिति बन सकती है।

विपक्ष के सामने भी यह तय करने की चुनौती है कि क्या वह अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश करेगा या फिर नेतन्याहू के साथ किसी व्यापक राजनीतिक समझौते की ओर बढ़ेगा। फिलहाल चुनावी नतीजों ने किसी एक नेता के लिए प्रधानमंत्री पद का रास्ता साफ नहीं किया है। अब राष्ट्रपति की सलाह-मशविरा प्रक्रिया और राजनीतिक दलों के बीच होने वाली बातचीत तय करेगी कि इजरायल में अगली सरकार किसकी बनेगी।

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