Israel Elections: कौन हैं पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट जिन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ खोला मोर्चा, क्या शिकस्त दे पाएंगे?
Israel Elections: सुरक्षा के मोर्चे पर बेहद सख्त रुख रखने वाले पूर्व इजरायली सैन्य प्रमुख गादी आइजनकोट ने गाजा युद्ध में अपने बेटे को खोया था और बाद में युद्ध नीति में स्पष्ट रणनीति की कमी का आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के युद्ध कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था
Israel Elections: गादी आइजनकोट आगामी चुनावों में नेतन्याहू के सबसे गंभीर चुनौती देने वाले प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरे हैं
Israel Elections: इजरायल में आगामी आम चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले नेताओं में अब पूर्व इजरायली सैन्य प्रमुख गादी आइजनकोट का नाम सबसे आगे आ गया है। सुरक्षा के मोर्चे पर बेहद सख्त रुख रखने वाले आइजनकोट ने गाजा युद्ध में अपने बेटे को खोया था और बाद में युद्ध नीति में स्पष्ट रणनीति की कमी का आरोप लगाते हुए नेतन्याहू के युद्ध कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था। अब वे आगामी चुनावों में नेतन्याहू के सबसे गंभीर चुनौती देने वाले प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरे हैं।
हमारी सहयोगी न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक 66 वर्षीय गादी आइजनकोट ने 30 जून को औपचारिक रूप से अपनी मध्यमार्गी पार्टी याशर (Yashar) के अभियान की शुरुआत की। याशर का अर्थ सीधा या ईमानदार होता है। उन्होंने खुद को एक सैनिक से राजनेता बने व्यक्ति के रूप में पेश किया है। आइजनकोट के पक्ष का दावा है कि वो 7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमलों और उसके बाद शुरू हुए युद्धों के बाद इजरायल के नेतृत्व में जनता का भरोसा फिर से कायम करना चाहते हैं।
अभियान की शुरुआत करते हुए आइजनकोट ने कहा कि 'इस बार यह हमारे ऊपर है। क्या हम उस आपदा से अपनी आंखें मूंद लेंगे जो हम पर आई है? क्या हम निरंतर विभाजन को स्वीकार करेंगे और अगली आपदा की ओर बढ़ेंगे? या हम घावों को भरेंगे और पुनर्निर्माण करेंगे?ट
कौन हैं गादी आइजनकोट और क्यों उन्हें माना जा रहा है एंटी-नेतन्याहू?
मोरक्कन यहूदी प्रवासी परिवार में जन्मे गादी आइजनकोट ने इजरायल रक्षा बलों में चार दशक बिताए हैं। साल 2015 से 2019 तक वह सेना के चीफ ऑफ स्टाफ के पद पर भी रहे। उनकी यह पृष्ठभूमि बेंजामिन नेतन्याहू से बिल्कुल अलग है। नेतन्याहू एक लंबे समय से राजनीति में सक्रिय नेता हैं, अमेरिका से शिक्षित संभ्रांत वर्ग से आते हैं, लिकुड पार्टी के प्रमुख हैं और वर्तमान में भ्रष्टाचार के आरोपों में मुकदमे का सामना कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आइजनकोट का आकर्षण इस बात में है कि वे पारंपरिक राजनेताओं की तरह नहीं दिखते और न ही उनकी तरह बोलते हैं। इजरायल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो गिदोन रहाट के अनुसार, वे नेतन्याहू के विपरीत हैं, वे ध्रुवीकरण करने वाले या लोकलुभावन नेता नहीं हैं बल्कि देश को एकजुट करने का प्रयास करेंगे। वहीं बार-इलान यूनिवर्सिटी के बिगिन-सादात सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के निदेशक एतान शमीर के मुताबिक लोग उन्हें एक सच्चे और आम इंसान के रूप में देखते हैं।
गाजा में ड्यूटी के दौरान मारा गया था बेटा
गाजा युद्ध के दौरान आइजनकोट को व्यक्तिगत रूप से भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस पारिवारिक क्षति ने उनकी सार्वजनिक छवि को गहराई से प्रभावित किया है। दिसंबर 2023 में गाजा में ड्यूटी के दौरान उनके 25 वर्षीय बेटे गाल मीर आइजनकोट की मौत हो गई थी। इसके अलावा इस युद्ध में उनके दो भतीजे भी मारे गए। इजरायल में आइजनकोट के परिवार से हुई क्षति को शहादत के तौर पर देखा जा रहा है और लोग इसे लेकर इमोशनल दिख रहे हैं। इससे इजरायलियों के बीच उनकी यह साख बनी है कि वे युद्ध की कीमत को समझते हैं और सैनिकों की कुर्बानी को हल्के में नहीं लेंगे।
वॉर कैबिनेट के अंदरूनी सूत्र से नेतन्याहू के सबसे बड़े आलोचक तक
आइजनकोट ने केवल चार साल पहले राजनीति में कदम रखा था और 2022 में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में संसदीय सीट जीती थी। 7 अक्टूबर के हमलों के बाद वे नेतन्याहू के वॉर कैबिनेट में शामिल हुए लेकिन 2024 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
उन्होंने प्रधानमंत्री पर गाजा में स्पष्ट रणनीति न होने का आरोप लगाया था। उन्होंने कैबिनेट सदस्यों को एक कड़ा पत्र लिखकर चेतावनी दी थी कि युद्ध के मैदान में मिल रही जीत को उन फैसलों के रूप में देखने की गलती की जा रही है जो वास्तव में हमास को बेअसर कर सकते हैं और इजरायल को सुरक्षित बना सकते हैं।
वे इजरायल के सैन्य अभियानों (गाजा, लेबनान और ईरान में) का व्यापक समर्थन करते हैं लेकिन उनका मानना है कि नेतन्याहू की नीतियों के कारण इजरायल दुनिया में अलग-थलग पड़ रहा है। आइजनकोट के मुताबिक ये बात राज्य के भविष्य के लिए खतरा है।
सुरक्षा के मामले में बेहद सख्त, दहियाह डॉक्ट्रिन से जुड़ा है नाम
गादी आइजनकोट के उभार का मतलब यह नहीं है कि इजरायल की क्षेत्रीय नीति में कोई नरमी आएगी। उन्होंने फिलिस्तीनी राज्य की मांगों को अप्रासंगिक बताकर खारिज कर दिया है और नेतन्याहू पर आरोप लगाया है कि वे ईरान संघर्ष को सुलझाने के लिए लेबनान में संघर्षविराम के अमेरिकी दबाव के आगे बहुत आसानी से झुक गए। उनका नाम दहियाह डॉक्ट्रिन से जुड़ा है।
इसे उन्होंने 2006 में लेबनान में हिजबुल्लाह के साथ युद्ध के बाद विकसित किया था। बेरूत के दक्षिणी उपनगर 'दहियाह' (जो हिजबुल्लाह का गढ़ है) के नाम पर बनी यह रणनीति कहती है कि उग्रवादी समूहों के हमलों का जवाब उन क्षेत्रों में भारी तबाही और अत्यधिक बल प्रयोग के साथ दिया जाना चाहिए जहां से वे काम करते हैं।
2008 में एक इजरायली अखबार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने साफ कहा था कि इजरायल पर गोलीबारी करने वाले हर गांव को सैन्य अड्डा माना जाएगा और वहां भारी तबाही मचाई जाएगी। हाल ही में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मांगी गई युद्धविराम की मांग को कहा था कि ऐसी मांगें इजरायली सेना के हाथ बांधती हैं।
क्या हैं उनकी पार्टी 'याशर' के मुख्य एजेंडे?
गादी आइजनकोट की पार्टी याशर एक मध्यमार्गी ताकत के रूप में चुनाव लड़ रही है लेकिन इसके सुरक्षा सिद्धांत पूरी तरह सख्त हैं। उनके मुख्य एजेंडे में शामिल हैं:-
क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से इजरायल की राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना।
इजरायल के उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों का पुनर्निर्माण।
शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में निवेश।
7 अक्टूबर के हमलों के कारणों की जांच के लिए एक राज्य स्तरीय जांच आयोग का गठन करना।
सभी के लिए सेवा: इसके तहत वे कट्टरपंथियों और अरबों को भी सेना में अनिवार्य रूप से भर्ती करने के पक्ष में हैं, जिसमें बहुत सीमित छूट होगी।
क्या बेंजामिन नेतन्याहू को शिकस्त दे पाएंगे आइजनकोट?
इजरायल में चुनावों की कोई निश्चित तारीख अभी तय नहीं हुई है। हालांकि इसके अक्टूबर के अंत तक होने की उम्मीद है। रॉयटर्स के पोल्स के मुताबिक आइजनकोट की पार्टी गति पकड़ रही है और संसदीय सीटों के मामले में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी के बाद दूसरे नंबर पर आ सकती है। हालांकि दोनों में से किसी को भी स्पष्ट बहुमत मिलने की उम्मीद नहीं है।
इजरायल में बहुमत न मिलने की स्थिति में भले ही लिकुड पार्टी अधिक सीटें जीते लेकिन आइजनकोट के पास विभिन्न विचारधाराओं वाली पार्टियों (वामपंथी, मध्यमार्गी और संभवतः अरब के नेतृत्व वाली पार्टियों) के साथ गठबंधन सरकार बनाने के बेहतर अवसर हो सकते हैं। हालांकि अरब पार्टियों के समर्थन की संभावना को नेतन्याहू और उनके दक्षिणपंथी सहयोगी एक राजनीतिक हमले के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट की पार्टी भी इस रेस में एक बड़ा फैक्टर साबित हो सकती है।
दूसरी ओर नेतन्याहू ने भी पलटवार करना शुरू कर दिया है। उन्होंने हाल ही में कहा कि अगर उन्होंने आइजनकोट की बात मानी होती तो आज पूरे गाजा पर हमास का नियंत्रण होता। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेतन्याहू राजनीति के किसी भी अकल्पनीय और कठिन परिस्थिति से बाहर निकलने का रास्ता खोज लेते हैं, इसलिए उन्हें रेस से बाहर नहीं माना जा सकता।