जंग में तबाह हो रही इजरायल और ईरान की अर्थव्यवस्था, नहीं रुका यु्द्ध तो मच जाएगी आर्थिक तबाही, खाली हो जाएंगे खजाने

Iran Israel War News: शुरुआत में यह टकराव एक सैन्य शक्ति प्रदर्शन लग रहा था, लेकिन अब यह दोनों देशों के लिए आर्थिक सहनशक्ति की परीक्षा भी बनता जा रहा है। ये जंग अब सिर्फ मोर्चे पर नहीं, बल्कि बैलेंस शीट और बजट डिफिसिट की जंग बन चुकी है

अपडेटेड Jun 20, 2025 पर 9:11 PM
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Israel Iran War: जंग में तबाह हो रही इजरायल और ईरान की अर्थव्यवस्था

इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध अब सिर्फ जान लेने और सैन्य हमलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी गूंज दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भी हिला रही है। एक ओर इजरायल बढ़ते सैन्य खर्च से जूझ रहा है, तो दूसरी ओर ईरान पर उसके तेल निर्यात और ऊर्जा ढांचे पर भारी हमले हो रहे हैं। अब सवाल यह है कि यह जंग आर्थिक रूप से कौन और कब तक झेल पाएगा?

इजरायल की आर्थिक हालत: खर्च और घाटे की मार

इजरायल पहले से ही गाजा में चल रहे महंगे सैन्य ऑपरेशन में उलझा हुआ था, जिसकी लागत 2024 के आखिर तक करीब 250 अरब शेकेल (करीब 67.5 अरब डॉलर) हो चुकी है। अब ईरान से बढ़ते टकराव के चलते इजरायल ने और 5.5 अरब शेकेल (1.45 अरब डॉलर) की नई सैन्य लागत जोड़ ली है।


2023 में जहां इजरायल का रक्षा बजट 60 अरब शेकेल (17 अरब डॉलर) था, वहीं 2025 तक यह आंकड़ा 118 अरब शेकेल (34 अरब डॉलर) तक पहुंचने की संभावना है। यह तेजी से बढ़ता खर्च इजरायल की सरकारी अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाल रहा है। सरकार ने इस साल के लिए GDP घाटे की सीमा 4.9% रखी थी, लेकिन अब इसे पूरा कर पाना मुश्किल लग रहा है।

इस आर्थिक दबाव का असर साफ दिखने लगा है:

  • 2024 में 60,000 से ज्यादा बिजनेस बंद हो चुके हैं।
  • टूरिज्म सेक्टर अभी भी युद्ध से पहले के स्तर पर नहीं लौटा है।
  • इजरायल की 2025 की GDP ग्रोथ का अनुमान 4.3% से घटकर 3.6% कर दिया गया है।

S&P ग्लोबल रेटिंग ने चेतावनी दी है कि अगर युद्ध जारी रहा या और फैला, तो इजरायल की क्रेडिट रेटिंग A से गिराकर A- कर दी जा सकती है।

कैसी है ईरान की स्थिति?

ईरान, जो पहले ही अमेरिका के लंबे समय से चले आ रहे प्रतिबंधों की वजह से कमजोर अर्थव्यवस्था से जूझ रहा था, अब सीधे इजरायली हमलों का निशाना बन गया है।

ईरान के लिए सबसे बड़ा झटका तब लगा जब इजरायल के हवाई हमलों ने खार्ग द्वीप (Kharg Island) पर उसके तेल टर्मिनल को निशाना बनाया, जो ईरान के 90% क्रूड ऑयल एक्सपोर्ट का केंद्र है। इसके कारण ईरान का तेल निर्यात 242,000 बैरल प्रतिदिन से गिरकर सिर्फ 102,000 बैरल प्रतिदिन रह गया है।

इसके अलावा साउथ पार्स गैस फील्ड, जो देश की 80% गैस जरूरतें पूरी करता है, वो भी आंशिक रूप से बंद हो चुका है। शहर रे (Shahr Rey) रिफाइनरी और तेहरान के बाहर के फ्यूल डिपो भी हमलों की चपेट में आ गए हैं।

ईरान की अर्थव्यवस्था पहले ही बुरी हालत में थी:

  • 2018 से अब तक उसकी मुद्रा 'रियाल' 90% से ज्यादा गिर चुकी है।
  • आधिकारिक महंगाई दर 40% से ऊपर है।
  • विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 33 अरब डॉलर है, जो लंबी लड़ाई के लिए तो काफी नहीं लगता।
  • ईरान का सालाना रक्षा बजट लगभग 12 अरब डॉलर है, जो GDP का 3–5% बनाता है।

क्या दोनों देश इस जंग को लंबा खींच सकते हैं?

इजरायल के लिए यह युद्ध अगर लंबा खिंचता है, तो न सिर्फ उसकी आर्थिक ग्रोथ रुक सकती है, बल्कि निवेशकों का भरोसा भी डगमगा सकता है। वहीं ईरान के सामने तो और भी बड़ा संकट है – राजकोषीय संकट, अंतरराष्ट्रीय अलगाव और प्रतिबंध और आंतरिक अस्थिरता।

शुरुआत में यह टकराव एक सैन्य शक्ति प्रदर्शन लग रहा था, लेकिन अब यह दोनों देशों के लिए आर्थिक सहनशक्ति की परीक्षा भी बनता जा रहा है। ये जंग अब सिर्फ मोर्चे पर नहीं, बल्कि बैलेंस शीट और बजट डिफिसिट की जंग बन चुकी है।

दोनों देश जिस आर्थिक दबाव का सामना कर रहे हैं, उसे देखकर यह कहना मुश्किल नहीं कि अगर युद्ध जल्द नहीं रुका, तो इसके परिणाम दोनों मुल्कों के लिए लंबे समय तक भुगतने वाले होंगे- चाहे वे जीतें या हारें।

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