तेल नहीं अब पानी की जंग! मिडिल ईस्ट में पानी के प्लांटों को क्यों बनाया जा रहा निशाना? मच जाएगी भारी तबाही
Middle East War: बहरीन ने दावा किया है कि रविवार को एक ईरानी ड्रोन हमले से देश के एक डिसेलिनेशन प्लांट (समुद्री पानी को मीठा बनाने वाला प्लांट) को नुकसान पहुंचा है। हालांकि, बहरीन के गृह मंत्रालय ने कहा कि प्लांट को कुछ नुकसान जरूर हुआ, लेकिन इससे पानी की सप्लाई पर कोई असर नहीं पड़ा
Middle East War: तेल नहीं अब पानी की जंग! मिडिल ईस्ट में पानी के प्लांटों को क्यों बनाया जा रहा निशान
पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष अब एक नए और खतरनाक दौर में पहुंचता दिखाई दे रहा है। अब तेल और गैस के ठिकानों के साथ-साथ समुद्री पानी को पीने के पानी में बदलने वाले प्लांट भी हमलों के निशाने पर आने लगे हैं। इस युद्ध में ईरान, अमेरिका और इजरायल आमने-सामने हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक बहरीन ने दावा किया है कि रविवार को एक ईरानी ड्रोन हमले से देश के एक डिसेलिनेशन प्लांट (समुद्री पानी को मीठा बनाने वाला प्लांट) को नुकसान पहुंचा है। हालांकि, बहरीन के गृह मंत्रालय ने कहा कि प्लांट को कुछ नुकसान जरूर हुआ, लेकिन इससे पानी की सप्लाई पर कोई असर नहीं पड़ा।
ईरान ने अमेरिका पर लगाया आरोप
इस घटना से एक दिन पहले ईरान ने आरोप लगाया था कि अमेरिका ने दक्षिणी ईरान के केशम द्वीप पर मौजूद एक मीठा पानी बनाने वाले प्लांट पर हमला किया।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि इस हमले के कारण करीब 30 गांवों में पानी की सप्लाई प्रभावित हुई है।
उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि किसी देश के पानी से जुड़े ढांचे पर हमला करना बेहद खतरनाक कदम है और इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
हालांकि अमेरिका ने इन आरोपों से इनकार किया है।
युद्ध की शुरुआत कैसे हुई?
यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सैन्य ठिकानों पर हमला किया था।
इन हमलों में ईरान के परमाणु केंद्र जैसे नतांज न्यूक्लियर फैसिलिटी और फोर्डो न्यूक्लियर फैसिलिटी को निशाना बनाया गया।
इसके जवाब में ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिनका असर पूरे खाड़ी क्षेत्र में देखने को मिला।
पहले तेल और गैस के ठिकाने थे निशाना
युद्ध की शुरुआत में हमले मुख्य रूप से तेल रिफाइनरी, गैस प्लांट और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास के समुद्री रास्तों पर केंद्रित थे।
लेकिन हाल के दिनों में पानी से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और प्लांट के पास भी धमाके और नुकसान की खबरें सामने आने लगी हैं।
उदाहरण के तौर पर जेबेल अली पोर्ट के पास हमला हुआ, जो दुनिया के सबसे बड़े डिसेलिनेशन प्लांट्स में से एक के करीब है। इसके अलावा फुजैरा और कुवैत के दोहा वेस्ट डिसेलिनेशन प्लांट में भी नुकसान की खबरें आई हैं।
क्या होता है डिसेलिनेशन प्लांट?
डिसेलिनेशन प्लांट समुद्र के खारे पानी को साफ करके उसे पीने लायक बनाते हैं। इसमें या तो पानी को गर्म करके भाप बनाई जाती है और फिर उसे ठंडा करके मीठा पानी तैयार किया जाता है, या फिर विशेष झिल्लियों (मेम्ब्रेन) के जरिए नमक और गंदगी को अलग किया जाता है।
खाड़ी देशों में आमतौर पर रिवर्स ऑस्मोसिस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जो समुद्री पानी से नमक हटाने का एक आधुनिक तरीका है।
खाड़ी देशों के लिए क्यों जरूरी है यह सिस्टम?
खाड़ी क्षेत्र में प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत बहुत कम हैं। इसलिए यहां की ज्यादातर आबादी डिसेलिनेशन प्लांट से मिलने वाले पानी पर निर्भर है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, इस इलाके के लगभग 90% पानी के स्रोत भूजल और डिसेलिनेशन प्लांट ही हैं।
खाड़ी देशों में 400 से ज्यादा डिसेलिनेशन प्लांट काम कर रहे हैं और दुनिया की लगभग 60% डिसेलिनेशन क्षमता इसी क्षेत्र में है।
कुछ देशों में इन पर निर्भरता बहुत ज्यादा है:
UAE– लगभग 42% पीने का पानी
कुवैत– करीब 90%
ओमान– लगभग 86%
सऊदी अरब– करीब 70%
युद्ध में बड़ी कमजोरी बन सकते हैं ये प्लांट
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन प्लांट्स को निशाना बनाया गया, तो इसका सीधा असर लाखों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ेगा।
पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक इन प्लांट्स को नुकसान पहुंचने से न सिर्फ पानी की कमी हो सकती है बल्कि इससे खाद्य सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर युद्ध में पानी के इन इंफ्रास्ट्रक्चर या प्लांट को निशाना बनाया जाने लगा, तो यह संघर्ष सिर्फ सैन्य टकराव नहीं रहेगा, बल्कि आम लोगों के जीवन के लिए भी बड़ा खतरा बन सकता है।