Nepal Sanatan Row: नेपाल की राजनीति में बड़ा भूचाल! सनातन को लेकर नेपाली कांग्रेस में मचा घमासान, समझिए शेर बहादुर देउबा चला ये कैसा दांव
Nepal Sanatan religion Row: पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाले नेपाली कांग्रेस के गुट में सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान बनाने के प्रस्ताव को लेकर मतभेद बढ़ गए हैं। इस वजह से पार्टी का राष्ट्रीय सम्मेलन कोई नतीजा नहीं निकाल पाया। बवाल के बाद सोमवार को होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस को टालना पड़ा
Nepal Sanatan religion Row: सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान बनाने की कोशिश पर देउबा गुट में मतभेद सामने आए हैं
Nepal Sanatan religion Row: नेपाल की प्रमुख राजनीतिक पार्टी 'नेपाली कांग्रेस' में सनातन धर्म को देश की राष्ट्रीय पहचान के रूप में बढ़ावा देने के प्रस्ताव को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाले गुट में ही इस मुद्दे पर मतभेद सामने आए हैं। विवाद इतना बढ़ गया कि पार्टी की राष्ट्रीय सभा के निष्कर्षों को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। सोमवार 17 अगस्त को होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस भी टालनी पड़ी।
दरअसल, देउबा के आग्रह पर सोमवार 17 अगस्त को बंद सत्र में पांच सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया। इसके तीसरे बिंदु में सनातन धर्म को नेपाल की राष्ट्रीय पहचान के रूप में बढ़ावा देने की बात कही गई है। हालांकि, पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने इस प्रस्ताव का विरोध किया।
देउबा के प्रस्ताव पर वरिष्ठ नेताओं ने जताई आपत्ति
नेपाली मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सनातन धर्म से जुड़े प्रस्ताव का विरोध करने वालों में कृष्ण प्रसाद सिटौला, विमलेंद्र निधि, प्रकाशमान सिंह और मिन विश्वकर्मा जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं। विश्वकर्मा ने कहा कि धार्मिक मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाने के कारण अंतिम दस्तावेज तैयार करने में देरी हुई। इसी वजह से प्रेस कॉन्फ्रेंस स्थगित करनी पड़ी।
विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नेपाली कांग्रेस ने मौजूदा संविधान के निर्माण और उसे लागू कराने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। विरोध करने वाले नेताओं का तर्क है कि पार्टी को ऐसी नई राजनीतिक दिशा नहीं अपनानी चाहिए। इससे संविधान में हासिल किए गए धर्मनिरपेक्षता और अन्य संवैधानिक प्रावधान कमजोर हों।
20 सूत्रीय निष्कर्ष में सिर्फ धार्मिक स्वतंत्रता की बात थी
राष्ट्रीय सभा के समापन के लिए पहले 20 सूत्रीय निष्कर्ष तैयार किए गए थे। नेताओं के बीच 19 पॉइंट पर सहमति बन चुकी थी। लेकिन 16वें बिंदु में धर्म से संबंधित प्रावधान को लेकर विवाद हो गया। मूल प्रस्ताव में नेपाल को बहुजातीय, बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश बताते हुए सभी धार्मिक समुदायों को अपने धर्म और संस्कृति का पालन एवं संरक्षण करने की संवैधानिक स्वतंत्रता मजबूत करने की बात कही गई थी।
इसमें सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान घोषित करने की मांग नहीं थी। देउबा ने इस बिंदु की भाषा पर आपत्ति जताई। इसके बाद मूल 20 सूत्रीय दस्तावेज को अंतिम रूप देने के बजाय अलग से पांच सूत्रीय प्रस्ताव तैयार किया गया, जिसे बंद सत्र में पारित कर दिया गया।
पांच सूत्रीय प्रस्ताव में क्या है?
पांच सूत्रीय प्रस्ताव का सबसे अहम हिस्सा सनातन धर्म को नेपाल की राष्ट्रीय पहचान के रूप में बढ़ावा देने से जुड़ा है। प्रस्ताव में कहा गया है कि नेपाल की लंबे समय से चली आ रही धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं देश की राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा हैं। इसमें हिंदू, बौद्ध, किरात और प्रकृति-आधारित धार्मिक परंपराओं के संरक्षण की बात भी कही गई है।
साथ ही प्रस्ताव में धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी, धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने की प्रतिबद्धता भी जताई गई है। यानी प्रस्ताव को केवल हिंदू धर्म की स्थापना के रूप में पेश करने के बजाय नेपाल की पारंपरिक धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ने की कोशिश की गई है। लेकिन पार्टी के भीतर इसे लेकर मतभेद काफी गहरे हो गए हैं।
क्या धर्मनिरपेक्षता की जगह हिंदू राष्ट्र की मांग?
देउबा के समर्थकों और प्रस्ताव के विरोधियों के बीच सबसे बड़ा मतभेद इसी मुद्दे पर है। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि देउबा की पहल नेपाल के संविधान में दर्ज धर्मनिरपेक्षता की प्रतिबद्धता को बदलकर देश को हिंदू राष्ट्र की दिशा में ले जाने की कोशिश है। देउबा खेमे में शशांक कोइराला, प्रकाश शरण महत, एनपी साउद और शंकर भंडारी जैसे नेता प्रस्ताव के समर्थन में बताए गए हैं। शंकर भंडारी पिछले कुछ वर्षों से खुले तौर पर नेपाल को 'हिंदू राष्ट्र' बनाने और संवैधानिक राजशाही की वकालत करते रहे हैं।
संविधान निर्माण के समय भी था मतभेद
देउबा खेमे के नेताओं का कहना है कि नेपाली कांग्रेस के भीतर सनातन धर्म को लेकर समर्थन संविधान निर्माण के समय भी मौजूद था। उनके अनुसार, संविधान लागू करते समय धर्मनिरपेक्षता को एक राजनीतिक समझौते के हिस्से के रूप में स्वीकार किया गया था। प्रकाश शरण महत का कहना है कि संविधान लागू होने के बाद भी नेपाली कांग्रेस के महाधिवेशन और अन्य औपचारिक मंचों पर सनातन धर्म का मुद्दा समय-समय पर उठता रहा है। उन्होंने राष्ट्रीय सभा के फैसले को पार्टी की पुरानी स्थिति से एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बताया।
मंच पर नेताओं के बीच तीखी बहस
मूल 20 सूत्रीय निष्कर्षों को पेश करने से पहले पांच सूत्रीय प्रस्ताव पारित किए जाने को लेकर पार्टी के मंच पर भी नेताओं के बीच तीखी बहस हुई। विरोध कर रहे नेताओं का कहना है कि राष्ट्रीय सभा में चर्चा किए गए अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे पीछे छूट गए। पूरा ध्यान हिंदू धर्म तथा सनातन धर्म के सवाल पर केंद्रित हो गया है।
नेपाली कांग्रेस के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती
सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान बनाने का प्रस्ताव अब नेपाली कांग्रेस के लिए एक बड़ी राजनीतिक और वैचारिक चुनौती बन गया है। एक तरफ देउबा समर्थक नेता नेपाल की पारंपरिक धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं।
दूसरी तरफ पार्टी के कई नेता संविधान में स्थापित धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था और सभी धार्मिक समुदायों की समान स्वतंत्रता को बनाए रखने की वकालत कर रहे हैं। यही मतभेद पार्टी की राष्ट्रीय सभा के अंतिम निष्कर्षों को रोकने का कारण बना। अब यह देखना अहम होगा कि नेपाली कांग्रेस सनातन धर्म, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच किस तरह संतुलन बनाती है। साथ ही यह भी देखना होगा कि इस मुद्दे पर पार्टी की आधिकारिक राजनीतिक लाइन क्या तय होती है।