नेपाल बाढ़: त्रासदी से पहले टीचर ने बजाई 'खतरे की घंटी'! तुरंत खाली कराई स्कूल, बसें रुकवाईं और बचा ली 1,643 बच्चों की जान

Nepal Floods: पड़ोसी देश नेपाल में भयावह बाढ़ के बीच एक स्कूल टीचर एवं प्रिंसिपल की सूझबूझ ने 1,643 बच्चों की जान बचा ली। 47 वर्षीय अंग्रेजी टीचर एवं प्रिंसिपल राजेंद्र दवाड़ी ने बिना किसी आधिकारिक आदेश का इंतजार किए ऐसे फैसले लिए, जिनसे स्कूल में एक बड़ी त्रासदी टल गई

अपडेटेड Aug 30, 2026 पर 11:00 PM
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Nepal Floods: एक टीचर और प्रिंसिपल की सूझबूझ ने 1,643 बच्चों की जान बचा ली

Nepal Floods: पड़ोसी देश नेपाल में ग्लेशियर से अचानक आई भयंकर बाढ़ ने कुछ ही मिनटों में तबाही मचाकर रख दी। पानी, बर्फ, चट्टानों और कीचड़ की करीब 9 मीटर ऊंची लहर ने उत्तर-मध्य नेपाल की त्रिशूली घाटी में कई गांवों को अपनी चपेट में ले लिया। इस भयावह स्थिति के बीच एक टीचर और प्रिंसिपल की सूझबूझ ने 1,643 बच्चों की जान बचा ली। 47 वर्षीय अंग्रेजी टीचर एवं प्रिंसिपल राजेंद्र दवाड़ी ने बिना किसी आधिकारिक आदेश का इंतजार किए ऐसे फैसले लिए, जिनसे स्कूल में एक बड़ी त्रासदी टल गई।

न्यूज 18 के मुताबिक, बुधवार सुबह करीब 9:20 बजे त्रिभुवन त्रिशूली सेकेंडरी स्कूल में करीब 900 बच्चे मौजूद थे। वहीं, करीब 700 अन्य बच्चे पैदल या बसों से स्कूल पहुंचने के रास्ते में थे। इसी दौरान राजेंद्र दवाड़ी को ऊपर की तरफ करीब पांच मील दूर बेत्रावती में रहने वाले अपने एक दोस्त का फोन आया। दोस्त ने घबराई हुई आवाज में बताया कि नदी ने उनके गांव को तबाह कर दिया है। पानी तेजी से नीचे की ओर बढ़ रहा है।

उसने दवाड़ी से तुरंत भागने को कहा। शुरुआत में दवाड़ी को लगा कि स्कूल की तीन मंजिला कंक्रीट की इमारत सुरक्षित है। स्कूल नदी के तल से करीब 60 मीटर ऊंचाई पर था। लेकिन कुछ ही सेकंड बाद एक घबराया हुआ अभिभावक स्कूल पहुंचा और बताया कि पानी असामान्य गति से बढ़ रहा है। फिर दवाड़ी ने एक पल भी बर्बाद नहीं किया।


तुरंत बजाई स्कूल की घंटी

उन्होंने किसी सरकारी आदेश का इंतजार नहीं किया। तुरंत स्कूल की घंटी बजाई और सभी को क्लासेस खाली कराने का निर्देश दे दिया। टीचर्स बच्चों को तेजी से सुरक्षित स्थान की ओर निकालने लगे। इसी दौरान दवाड़ी ने स्कूल की ओर आ रही बसों को फोन करना शुरू किया। इन बसों में करीब 80-80 बच्चे सवार थे। दवाड़ी ने लगभग सभी बस चालकों से संपर्क कर लिया और उन्हें तत्काल वापस लौटने का निर्देश दिया। लेकिन एक बस ऐसी थी, जिसके ड्राइवर से संपर्क नहीं हो सका। तभी दवाड़ी की नजर उस बस पर पड़ी।

बस लोहे के पुल से होकर स्कूल की तरफ आ रही थी। उधर स्कूल परिसर में पानी तेजी से घुस रहा था। दवाड़ी ने बस चालक को दूर से ही चिल्लाकर और हाथों से इशारा करके वापस लौटने को कहा। ड्राइवर ने तुरंत बस को पीछे करना शुरू किया। बस किसी तरह सुरक्षित स्थान तक पहुंच गई। इसके कुछ ही पल बाद वह पुल तेज बहाव के कारण नदी में ढह गया। अगर बस कुछ सेकंड और आगे बढ़ जाती, तो उसमें सवार करीब 80 बच्चों की जिंदगी खतरे में पड़ सकती थी।

घबराई बच्ची को बाइक से पहुंचाया सुरक्षित स्थान

बाढ़ का पानी बढ़ता देख बच्चे पैदल ही ऊंचाई वाले स्थानों की ओर भागने लगे। चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल था। इसी दौरान एक छोटी बच्ची को तेज घबराहट का दौरा पड़ा और वह आगे नहीं बढ़ पा रही थी। स्कूल स्टाफ ने तुरंत उसकी मदद की और उसे मोटरसाइकिल के पीछे बैठाकर ढलान की ओर सुरक्षित ऊंचाई तक पहुंचाया।

राजेंद्र दवाड़ी की तेजी से लिए गए फैसलो जैसे स्कूल खाली कराने, बसों को वापस बुलाने और आखिरी बस को पुल पार करने से रोकने वाले एक्शन ने उस दिन एक बेहद बड़ी त्रासदी को टाल दिया। एक टीचर की समय पर दिखाई गई समझदारी और साहस ने 1,643 बच्चों को मौत के मुंह में जाने से बचा लिया।

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