50 साल के अहमद काबुल के एक नशा मुक्ति केंद्र में इलाज करा रहे थे। उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने दोस्तों को आग में जलते देखा। पाकिस्तान के हवाई हमले के बाद चारों तरफ आग लग गई थी और लोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे, लेकिन अहमद किसी को बचा नहीं पाए। उन्होंने कहा कि मंजर “कयामत जैसा” था।
अफगान तालिबान सरकार के मुताबिक, सोमवार रात हुए इस हमले में कम से कम 400 लोगों की मौत हुई और 250 घायल हुए। वहीं पाकिस्तान ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने किसी अस्पताल को नहीं, बल्कि सैन्य ठिकानों और आतंकियों से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया।
यह हमला दोनों देशों के बीच चल रहे तनाव का हिस्सा है, जो पवित्र महीने रमजान के दौरान और भी ज्यादा बढ़ गया।
Reuters के मुताबिक, अहमद अस्पताल में गार्ड के तौर पर भी मदद करते थे। उन्होंने बताया कि हमले के वक्त वे अपने 25 साथियों के साथ नमाज के बाद कमरे में बैठे थे। उन सबमें से सिर्फ वही जिंदा बचे।
उन्होंने कहा, “पूरी जगह आग में घिर गई थी, सब कुछ खत्म हो गया था।”
अस्पताल के रेडियोलॉजी विभाग में काम करने वाले मोहम्मद मियां ने बताया कि वहां इलाज करा रहे कई युवा बड़े कंटेनरों में रहते थे और हमले में बहुत कम लोग बच पाए।
उन्होंने कहा, “यह बेहद डरावना था। जिनके कमरे नहीं टूटे, वही बच पाए। जहां बम गिरा, वहां कोई जिंदा नहीं बचा।”
जब रॉयटर्स की टीम मंगलवार को मौके पर पहुंची, तो एक मंजिला इमारत की काली पड़ी दीवारें साफ बता रही थीं कि कुछ घंटे पहले वहां भीषण आग लगी थी।
कई जगहों पर इमारतें पूरी तरह टूटकर मलबे में बदल गई थीं। वहां मरीजों के सामान जैसे तकिए, जूते और कपड़े इधर-उधर बिखरे पड़े थे।
अहमद के कमरे में कुछ बंक बेड अभी भी दीवार के सहारे खड़े थे, लेकिन छत उड़ चुकी थी और कमरा खुला आसमान दिखा रहा था।
अस्पताल के स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. अहमद वली यूसुफजई ने बताया कि हमले के समय वहां करीब 2,000 मरीज थे। उन्होंने तीन जोरदार धमाकों को याद करते हुए कहा कि धमाके इतने तेज थे कि उनके कुछ साथी एक दीवार से दूसरी दीवार तक उछल गए।
उन्होंने कहा कि आग लगने के बाद हर तरफ से लोगों की चीखें और मदद की आवाजें आ रही थीं।