New Zealand: न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में सिख समुदाय और वहां के लोकल चर्च के एक ग्रुप के बीच तनावपूर्ण स्थिति देखने को मिली। दोनों गुटों के बीच स्थिति उस वक्त तनावपूर्ण हो गई जब सिख समुदाय द्वारा निकाली जा रही एक धार्मिक कीर्तन परेड का स्थानीय चर्च से जुड़े लोगों ने पुरजोर विरोध किया। साउथ ऑकलैंड के मनुरेवा में हुई इस घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल है।
विरोध प्रदर्शन के दौरान 'यह न्यूजीलैंड है, भारत नहीं' जैसे नारे लगाए गए और पारंपरिक 'हाका' नृत्य के जरिए कीर्तन परेड को रोकने की कोशिश की गई। पुलिस को बीच-बचाव कर दोनों गुटों को अलग करना पड़ा, जिसके बाद इस मामले ने धार्मिक स्वतंत्रता और आप्रवासन को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।
'वन ट्रू गॉड जीसस' बनाम 'जो बोले सो निहाल'
नानकसर सिख मंदिर द्वारा आयोजित इस परेड में सैकड़ों श्रद्धालु शामिल थे। जैसे ही यह जुलूस ग्रेट साउथ रोड पर पहुंचा, करीब 50 प्रदर्शनकारियों ने रास्ता जाम कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने हाथों में बैनर ले रखे थे जिन पर 'कीवी फर्स्ट' और 'न्यूजीलैंड ईसाइयों का देश है' जैसे स्लोगन लिखे थे। डेस्टिनी चर्च के नेता ब्रायन तामाकी द्वारा शेयर किए गए फुटेज में प्रदर्शनकारी 'वन ट्रू गॉड' और 'जीसस-जीसस' चिल्लाते नजर आ रहे हैं, जिसके जवाब में सिख प्रतिभागियों ने 'जो बोले सो निहाल' और 'सत श्री अकाल' के जयकारे लगाए। हालांकि इस दौरान पुलिसकर्मियों ने सुरक्षा दीवार बनाकर परेड को सुरक्षित रूप से आगे बढ़ाया।
'राष्ट्रीय पहचान को है खतरा': चर्च नेता
चर्च नेता ब्रायन तामाकी ने इस विरोध प्रदर्शन को 'राष्ट्रीय पहचान' की रक्षा बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर परेड की आलोचना करते हुए इसे 'बड़े पैमाने पर आप्रवासन के जरिए आक्रमण' बताया। तामाकी ने सिखों द्वारा लिए गए पारंपरिक कृपाणों और तलवारों पर भी सवाल उठाए और कहा कि यह न्यूजीलैंड की जीवनशैली का हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने दावा किया कि वे केवल अपनी संस्कृति और ईसाई राष्ट्र होने की पहचान को बचाने के लिए शांतिपूर्ण तरीके से 'हाका' नृत्य कर रहे थे। उन्होंने चेतावनी दी कि वे भविष्य में भी 'विदेशी धार्मिक प्रभाव' का विरोध जारी रखेंगे।
सिख समुदाय ने बताया 'धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला'
सिख समुदाय के नेताओं ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि यह एक कानूनी रूप से स्वीकृत धार्मिक आयोजन था, जिसमें जानबूझकर बाधा डाली गई। सिख प्रतिनिधियों के अनुसार, उन्होंने केवल इसलिए संयम बरता क्योंकि जुलूस के साथ उनकी पवित्र पुस्तक 'गुरु ग्रंथ साहिब' थी, जिसकी मर्यादा वे किसी भी हाल में भंग नहीं होने देना चाहते थे। भारत में अकाल तख्त और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने भी इस घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए न्यूजीलैंड सरकार से अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है।