ट्रंप की 'सीक्रेट कॉल' से मिडिल ईस्ट में खलबली, सऊदी-पाक समेत 8 देशों के सामने रखी ऐसी शर्त की सन्न रह गए मुस्लिम नेता!

Trump Abraham Accords Iran Deal: इक तरफ ईरान डील हो रही दूसरी तरफ ट्रंप ने मिडिल ईस्ट के देशों को एक अलग ही भंवर में डाल दिया है। अब्राहम अकॉर्ड को लेकर सऊदी अरब का रुख अभी भी बेहद जटिल बना हुआ है। पिछले साल नवंबर में जब ट्रंप ने ओवल ऑफिस में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से इस पर बात की थी, तो दोनों के बीच बहस काफी तीखी हो गई थी

अपडेटेड May 25, 2026 पर 8:37 AM
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ट्रंप ने तो यहां तक कह दिया कि भविष्य में एक दिन ईरान भी अब्राहम अकॉर्ड का हिस्सा बन सकता है

Trump Abraham Accords: अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने और होर्मुज जलमार्ग को दोबारा खोलने की ऐतिहासिक डील अब अंतिम चरण में है। लेकिन इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा 'मास्टरस्ट्रोक' खेला है, जिसने मिडिल ईस्ट के मुस्लिम देशों को हैरान कर दिया है।

'एक्सियोस' की रिपोर्ट के मुताबिक, शनिवार को ट्रंप ने सऊदी अरब, यूएई, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन के राष्ट्रप्रमुखों के साथ एक सीक्रेट फोन कॉल की। इस बातचीत में ट्रंप ने साफ कर दिया कि ईरान के साथ युद्ध खत्म होते ही वे सभी मुस्लिम देशों से इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने यानी 'अब्राहम अकॉर्ड' में शामिल होने की उम्मीद करते हैं।

जब ट्रंप की शर्त सुनते ही फोन पर छा गया 'सन्नाटा'


रिपोर्ट के मुताबिक, जब ट्रंप ने उन देशों के सामने इजरायल को मान्यता देने और दोस्ती करने की शर्त रखी जिनके इजरायल के साथ कोई आधिकारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं, तो फोन लाइन पर अचानक गहरा सन्नाटा पसर गया।

इस असहज कर देने वाली शांति को तोड़ने के लिए ट्रंप ने मजाक में पूछा, 'क्या आप सब अभी भी कॉल पर हैं?' ट्रंप ने नेताओं को साफ बताया कि उनके विशेष दूत जारेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ आने वाले हफ्तों में इस नॉर्मलाइजेशन के मुद्दे पर आगे की बातचीत के लिए उनके पास आएंगे। ट्रंप ने तो यहां तक कह दिया कि भविष्य में एक दिन ईरान भी अब्राहम अकॉर्ड का हिस्सा बन सकता है, हालांकि ईरान के पुराने रुख को देखते हुए इसकी उम्मीद बेहद कम है।

इसके बावजूद, यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद समेत सभी नेताओं ने इस शांति समझौते का समर्थन किया और एक अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक नेताओं ने कहा, 'हम इस डील पर आपके साथ हैं। और अगर यह काम नहीं भी करती है, तब भी हम आपके साथ खड़े रहेंगे'।

रूस ले जा सकता है ईरान का 'परमाणु कचरा'!

एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार, इस उभरते हुए समझौते में सबसे बड़ी शर्त यह है कि ईरान को अपना अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का पूरा स्टॉक छोड़ना होगा। IAEA के आंकड़े के अनुसार ईरान के पास फिलहाल 60% शुद्धता वाला 440.9 किलोग्राम यूरेनियम है, जो परमाणु हथियार बनाने के बेहद करीब माना जाता है।

प्रस्तावित 60 दिनों की बातचीत की अवधि के दौरान इस यूरेनियम को या तो पतला किया जाएगा या किसी तीसरे देश में भेजा जाएगा। रूस ने इस खतरनाक सामग्री को अपनी कस्टडी में लेने की पेशकश की है।

एक अमेरिकी अधिकारी ने साफ कर दिया है कि अगर ईरान ने यूरेनियम सरेंडर नहीं किया, तो उसे प्रतिबंधों में कोई ढील नहीं दी जाएगी। हालांकि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने दोहराया है कि उनका देश परमाणु हथियार नहीं चाहता।

नाकेबंदी हटेगी, खुलेगा होर्मुज जलमार्ग

इस समझौते के तहत, जैसे ही अमेरिका ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी खत्म करेगा, वैसे ही होर्मुज जलमार्ग को भी धीरे-धीरे जहाजों के लिए खोल दिया जाएगा।

बता दें कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर की गई भीषण बमबारी के बाद होर्मुज जलमार्ग बंद हो गया था, जिससे दुनिया भर में ऊर्जा संकट खड़ा हो गया और तेल-गैस की कीमतें आसमान छूने लगी थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि जलमार्ग खुलने के बाद भी जहाजों की आवाजाही और तेल की कीमतों को पूरी तरह स्थिर होने में हफ्तों या महीनों का समय लग सकता है।

सऊदी अरब का रुख: 'पहले फिलिस्तीन, फिर इजरायल'

अब्राहम अकॉर्ड को लेकर सऊदी अरब का रुख अभी भी बेहद जटिल बना हुआ है। पिछले साल नवंबर में जब ट्रंप ने ओवल ऑफिस में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) से इस पर बात की थी, तो दोनों के बीच बहस काफी तीखी हो गई थी।

सऊदी अधिकारियों का साफ कहना है कि जब तक इजरायल एक समय सीमा के भीतर स्वतंत्र फिलिस्तीन देश बनाने के लिए 'अपरिवर्तनीय' प्रतिबद्धता नहीं जताता, तब तक वे इजरायल से कोई रिश्ता नहीं रखेंगे। अमेरिकी अधिकारियों को भी उम्मीद नहीं है कि इजरायल में सितंबर में होने वाले चुनावों और नई सरकार के गठन से पहले सऊदी अरब कोई कदम उठाएगा।

दूसरी तरफ, इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि वह और ट्रंप इस बात पर सहमत हैं कि ईरान के साथ किसी भी फाइनल डील में 'परमाणु खतरा' पूरी तरह खत्म होना चाहिए और इजरायल के पास हिजबुल्लाह के खिलाफ रक्षा का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए।

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