US Iran War: कौन हैं हसन खुमैनी, अयातुल्ला खुमैनी के पोते, क्या बन सकते हैं ईरान के अगले सुप्रीम लीडर?
Who is Hassan Khomeini: हसन खोमैनी ईरान के पहले सुप्रीम लीडर अयातुल्ला रुहोल्लाह खोमैनी के पोते हैं, जिन्होंने 1979 की इस्लामी क्रांति का नेतृत्व किया था। 53 साल के हसन खोमैनी खुद एक मौलवी (धार्मिक विद्वान) हैं, लेकिन उन्होंने कभी कोई सरकारी पद नहीं संभाला। फिलहाल वे तेहरान में अपने दादा की दरगाह (मकबरे) के संरक्षक हैं
US Iran War: कौन हैं हसन खुमैनी, अयातुल्ला खुमैनी के पोते, क्या बन सकते हैं ईरान के अगले सुप्रीम लीडर?
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद देश में सत्ता को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है- अब अगला सुप्रीम लीडर कौन होगा? इसी बीच एक नाम तेजी से चर्चा में है- हसन खोमैनी। वह इस्लामिक रिपब्लिक के संस्थापक रुहोल्लाह खुमैनी के पोते हैं और मौजूदा व्यवस्था के भीतर एक “मध्यमार्गी चेहरा” माने जाते हैं।
कौन हैं हसन खोमैनी?
हसन खोमैनी ईरान के पहले सुप्रीम लीडर अयातुल्ला रुहोल्लाह खोमैनी के पोते हैं, जिन्होंने 1979 की इस्लामी क्रांति का नेतृत्व किया था।
53 साल के हसन खोमैनी खुद एक मौलवी (धार्मिक विद्वान) हैं, लेकिन उन्होंने कभी कोई सरकारी पद नहीं संभाला। फिलहाल वे तेहरान में अपने दादा की दरगाह (मकबरे) के संरक्षक हैं।
उनका झुकाव सुधारवादी खेमे की ओर माना जाता है। उनके करीबी संबंध पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी और हसन रूहानी से रहे हैं। दोनों नेताओं ने अपने कार्यकाल में पश्चिमी देशों के साथ बातचीत और समझौते की नीति अपनाई थी।
क्यों बन रहे हैं संभावित दावेदार?
खामेनेई की मौत के बाद सत्ता में खालीपन पैदा हो गया है। कुछ नेताओं का मानना है कि हसन खोमैनी कट्टरपंथियों के मुकाबले ज्यादा संतुलित चेहरा हो सकते हैं।
खासकर तब, जब खामेनेई के बेटे मोजतबा को भी संभावित उत्तराधिकारी माना जा रहा है, जो हार्डलाइन रुख के लिए जाने जाते हैं।
पिछले साल अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले के बाद हसन खोमैनी का नाम और ज्यादा चर्चा में आया। माना जा रहा है कि वे अमेरिका के साथ सीधे टकराव के बजाय बातचीत का रास्ता चुन सकते हैं।
सुधारवादी सोच, लेकिन सिस्टम के वफादार
हसन खोमैनी ने कई बार खुलकर अपनी राय रखी है। 2021 में उन्होंने गार्जियन काउंसिल की आलोचना की थी, जब सुधारवादी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोका गया।
2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद उन्होंने पारदर्शिता की मांग की थी और कहा था कि जनता को सच्चाई बताई जानी चाहिए।
हालांकि, उन्होंने उन प्रदर्शनकारियों की भी आलोचना की जो सीधे सुप्रीम लीडर के खिलाफ नारे लगा रहे थे। यानी वे व्यवस्था के भीतर सुधार की बात करते हैं, लेकिन पूरी व्यवस्था को चुनौती नहीं देते।
पहले भी झेल चुके हैं विरोध
2016 में उन्होंने “असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स” का चुनाव लड़ने की कोशिश की थी। यही संस्था सुप्रीम लीडर का चयन करती है।
लेकिन गार्जियन काउंसिल ने यह कहकर उनकी उम्मीदवारी खारिज कर दी कि उनके पास पर्याप्त धार्मिक योग्यता नहीं है। कई विश्लेषकों ने इसे सुधारवादी चेहरे को रोकने की कोशिश बताया था।
2008 में उन्होंने परोक्ष रूप से ईरान की शक्तिशाली फोर्स इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की राजनीति में भूमिका पर सवाल उठाए थे। हालांकि उनके इस संगठन से रिश्ते पूरी तरह खराब नहीं माने जाते।
इजराइल और पश्चिम पर क्या रुख?
हसन खोमैनी ने इजराइल को “जायोनी शासन” और “कैंसर जैसी बीमारी” कहा है। वे फिलिस्तीन मुद्दे पर सख्त रुख रखते हैं।
उन्होंने 2015 के परमाणु समझौते का समर्थन किया था, जिसे बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रद्द कर दिया था। उनका मानना रहा है कि प्रतिबंधों की वजह से आम ईरानियों को भारी आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
हसन खोमैनी अरबी और अंग्रेजी भाषा जानते हैं। अपनी युवावस्था में फुटबॉल खेलते थे। शादीशुदा हैं और चार बच्चों के पिता हैं।
आगे क्या?
हसन खोमैनी को एक “फॉरवर्ड-थिंकिंग” मौलवी माना जाता है, जो संगीत, महिलाओं के अधिकार और सामाजिक आजादी जैसे मुद्दों पर अपेक्षाकृत उदार विचार रखते हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ईरान की मौजूदा ताकतवर धार्मिक और सैन्य व्यवस्था उन्हें स्वीकार करेगी?
खामेनेई के बाद की राजनीति में यह तय करेगा कि ईरान कट्टर रुख की ओर जाएगा या किसी हद तक नरम और बातचीत की दिशा में बढ़ेगा।