कहानी उस ग्रीनलैंड की, जो न 'ग्रीन' है और न ही 'लैंड'...! दो हत्याओं से शुरू हुई जिसकी खोज, अब बना सुपरपावर की जंग का मैदान
US threat Greenland: एक तरफ यहां की शांति और शुद्ध हवा दिल जीत लेती है, तो दूसरी तरफ यहां की भू-राजनीति इन दिनों पूरी दुनिया में हलचल पैदा कर रही है। चलिए आज आपको इसी ग्रीनलैंड से रूबरू कराते हैं, इसकी खोज कैसे हुई, इससे जुड़े दिलचस्प फैक्ट्स और क्यों अमेरिका अब इसे हर कीमत पर हासिल करना चाहता है
Greeland: ग्रीनलैंड की भू-राजनीति इन दिनों पूरी दुनिया में हलचल पैदा कर रही है
दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप, जहां भारत के कई राज्य समा सकते हैं, लेकिन इसकी आबादी एक छोटे शहर जितनी है। यहां रात के अंधेरे में आसमान जादुई हरी रोशनियों से जगमगा उठता है और कभी-कभी महीनों तक सूरज यहां डूबना ही भूल जाता है। मजे की बात ये है कि इस द्वीप का नाम ग्रीनलैंड है, लेकिन 80% हिस्सा बर्फ की मोटी चादर से ढका है, हरियाली के नाम पर ऊंचे और लंबे पेड़ तक नहीं हैं और लैंड होने के बाद भी शहरों के बीच एक सड़क तक नहीं है। हम आज ग्रीनलैंड की बात क्यों कर रहे हैं? इसकी वजह है ट्रंप और उनकी एक जिद कि साम, दाम, दंड, भेद मुझे अब ग्रीनलैंड पर अमेरिका का कब्जा चाहिए ही चाहिए।
एक तरफ यहां की शांति और शुद्ध हवा दिल जीत लेती है, तो दूसरी तरफ यहां की भू-राजनीति (Geopolitics) इन दिनों पूरी दुनिया में हलचल पैदा कर रही है। चलिए आज आपको इसी ग्रीनलैंड से रूबरू कराते हैं, इसकी खोज कैसे हुई, इससे जुड़े दिलचस्प फैक्ट्स और क्यों अमेरिका अब इसे हर कीमत पर हासिल करना चाहता है।
ग्रीनलैंड की खोज
ग्रीनलैंड की खोज की शुरुआत डबल मर्डर यानी दो हत्याओं से हुई। ये कहानी किसी रोमांचक फिल्म की तरह है। ग्रीनलैंड की खोज का पूरा श्रेय एरिक द रेड नाम के एक वाइकिंग योद्धा को जाता है। एरिक एक बहुत ही गुस्सैल स्वभाव का आदमी था। 10वीं शताब्दी में (करीब साल 980), एरिक को हत्या के जुर्म में नॉर्वे से निकाल दिया गया। तब वह आइसलैंड गया, लेकिन वहां भी उसने किसी की हत्या कर दी और उसे 3 साल के लिए वहां से भी देश निकाला दे दिया गया।
देश निकाले के बाद, एरिक समुद्र में पश्चिम की ओर जाने का फैसला करता है। उसने उन कहानियों के बारे में सुना था कि दूर समुद्र में एक बड़ी जमीन है। अपनी नाव और कुछ साथियों के साथ, उसने अटलांटिक महासागर की खतरनाक लहरों को पार किया और आखिरकार एक विशाल द्वीप के तट पर पहुंचा। यह जगह आज का ग्रीनलैंड थी।
जब एरिक का 3 साल का निर्वासन खत्म हुआ, तो वह वापस आइसलैंड गया। वो चाहता था कि लोग उसके साथ इस नई जगह पर आकर बसें। लेकिन लोग अपना घर-बार और काम धंधा छोड़कर एक बर्फीली और बंजर जगह पर क्यों जाते?
ग्रीनलैंड की खोज का पूरा श्रेय एरिक द रेड नाम के एक वाइकिंग योद्धा को जाता है
यहीं एरिक ने दिमाग लगाया। उसने उस द्वीप का नाम 'ग्रीनलैंड' (Greenland) रख दिया, जिसका मतलब होता है 'हरी-भरी जमीन'। उसने लोगों से कहा कि वहां बहुत घास और उपजाऊ जमीन है।
इसे ही इतिहास का पहला बड़ा 'मार्केटिंग झूठ' माना जाता है, क्योंकि ग्रीनलैंड का ज्यादातर हिस्सा तो बर्फ से ढका था। उसके इस नाम के लालच में आकर सैकड़ों लोग उसके साथ चलने को तैयार हो गए।
साल 985 में, एरिक 25 नावों के साथ आइसलैंड से निकला, जिनमें से केवल 14 नावें ही सुरक्षित पहुंच पाईं। उन्होंने ग्रीनलैंड के दक्षिणी हिस्से में दो मुख्य बस्तियां बसाईं। इन वाइकिंग्स ने वहां करीब 400-500 सालों तक राज किया। वे वहां जो भी थोड़ी बहुत खेती करते और समुद्री जीवों का शिकार करते थे।
15वीं शताब्दी के आसपास, ग्रीनलैंड से वाइकिंग्स अचानक गायब हो गए। इसके कई कारण माने जाते हैं, जैसे कि अचानक बढ़ी कड़ाके की ठंड या खाने की कमी। इसके बाद ग्रीनलैंड को दुनिया लगभग भूल ही गई थी।
डेनमार्क को कैसे मिला ग्रीनलैंड?
अब यहां से कहानी में एंट्री होती है डेनमार्क की। तो हुआ ये कि वाइकिंग्स ने अपना अस्तित्व खत्म होने से काफी पहले ही 13वीं शताब्दी (साल 1261) में ग्रीनलैंड को नॉर्वे के राजा के अधीन कर दिया। इसके बाद ग्रीनलैंड नॉर्वे का हिस्सा बन गया।
14वीं शताब्दी के आखिर में, नॉर्वे, डेनमार्क और स्वीडन ने मिलकर एक यूनियन बनाई जिसे 'कालमार यूनियन' कहा जाता था। इस यूनियन का केंद्र डेनमार्क था। क्योंकि नॉर्वे अब डेनमार्क के साथ एक ही राजा के अधीन था, इसलिए ग्रीनलैंड पर भी धीरे-धीरे डेनमार्क का प्रभाव बढ़ने लगा।
15वीं शताब्दी में जब वाइकिंग्स वहां से गायब हो गए, तो यूरोप का संपर्क ग्रीनलैंड से टूट गया। 1721 में डेनमार्क-नॉर्वे के एक पादरी हंस एगेडे (Hans Egede) ने डेनमार्क के राजा से वहां जाने की अनुमति मांगी। उनका मकसद उन पुराने वाइकिंग्स को ढूंढना था, जिन्हें वे ईसाई बनाना चाहते थे।
हंस एगेडे ग्रीनलैंड पहुंचे, तो उन्हें वाइकिंग्स तो नहीं मिले, लेकिन वहां के स्थानीय लोग मिले
जब हंस एगेडे वहां पहुंचे, तो उन्हें वाइकिंग्स तो नहीं मिले, लेकिन वहां के स्थानीय लोग मिले, जो खुद को 'इनुइट' कहते थे। उन्होंने वहां 'गॉडथाब' नाम की एक बस्ती बसाई और उसे डेनमार्क का व्यापारिक केंद्र बनाया। यही गॉडथाब आज के ग्रीनलैंड की राजधान- नुक है। यहीं से आधुनिक ग्रीनलैंड पर डेनमार्क का असली कब्जा शुरू हुआ।
1953 में ग्रीनलैंड को डेनमार्क का एक प्रांत बना दिया गया। 1979 में ग्रीनलैंड को 'होम रूल' मिला, यानी उसे अपने आंतरिक फैसले खुद लेने की शक्ति मिली। फिर 2009 में 'सेल्फ-रूल एक्ट' के तहत ग्रीनलैंड को और भी ज्यादा आजादी दी गई।
आज ग्रीनलैंड तकनीकी रूप से 'किंगडम ऑफ डेनमार्क' का हिस्सा है, लेकिन उसके पास अपनी संसद और अपनी सरकार है। डेनमार्क केवल ग्रीनलैंड की विदेशी नीतियों और रक्षा की जिम्मेदारी संभालता है।
ग्रीनलैंड के बारे में क्या आपको पता हैं ये बातें?
ग्रीनलैंड के बारे में कई ऐसे अनोखे और मजेदार तथ्य हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं। लेकिन चलिए हम आपको बारी-बारी से बताते हैं।
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जो कोई महाद्वीप (Continent) नहीं है। इसका क्षेत्रफल इतना बड़ा है कि इसमें भारत के कई राज्य समा सकते हैं, लेकिन इसकी आबादी एक छोटे शहर जितनी ही है।
सुनने में अजीब लगता है, लेकिन ग्रीनलैंड के शहरों के बीच कोई सड़क नेटवर्क नहीं है। अगर आपको एक शहर से दूसरे शहर जाना है, तो आपको नाव (Boat), हेलिकॉप्टर या प्लेन का इस्तेमाल करना होगा। सर्दियों में लोग बर्फ पर चलने वाली 'डॉग स्लेज' का इस्तेमाल करते हैं। ये एक तरह की गाड़ी होती है, जिसे कुत्ते खींचते हैं।
उत्तर में होने के कारण, यहां गर्मियों में कुछ महीने ऐसे होते हैं, जब सूरज कभी डूबता ही नहीं। आप रात के 12 बजे भी सूरज की रोशनी देख सकते हैं। वहीं सर्दियों में कई हफ्तों तक सूरज निकलता ही नहीं और चारों तरफ अंधेरा रहता है।
ग्रीनलैंड में अपराध बहुत कम होते हैं। यहां की जेलें बहुत अनोखी हैं। कई कैदियों को दिन में काम पर जाने और शाम को वापस जेल आने की इजाजत होती है। वे यहां तक कि गार्ड्स के साथ शिकार पर भी जा सकते हैं।
क्योंकि यहां फैक्टरियां और गाड़ियां बहुत कम हैं, इसलिए यहां की हवा दुनिया में सबसे शुद्ध मानी जाती है। यहां के ग्लेशियरों का पानी इतना पुराना और साफ है कि आप उसे सीधे पी सकते हैं।
जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं ग्रीनलैंड का ज्यादातर हिस्सा बर्फ की मोटी चादर से ढका है, जहां कुछ भी नहीं उग सकता। बाकी बचे तटीय इलाकों (Coastal areas) में भी कड़ाके की ठंड और बर्फीली हवाओं के कारण बड़े पेड़ विकसित नहीं हो पाते। वहां जो पेड़ मिलते हैं, वे अक्सर बौने होते हैं।
यहां का मौसम इतना ठंडा होता है कि पेड़ों को बढ़ने के लिए बहुत कम समय मिलता है। जो पेड़ भारत या दूसरे देशों में 5 साल में बड़ा हो जाता है, उसे ग्रीनलैंड में उतना बढ़ने के लिए 50 से 100 साल लग सकते हैं।
ग्रीनलैंड को हासिल करने की अमेरिका की पुरानी इच्छा
अब आते हैं मौजूदा हालात पर, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार कहते आए हैं कि वे हर कीमत पर ग्रीनलैंड को हासिल कर के रहेंगे- प्यार से नहीं तो हथियार से। अमेरिका का ग्रीनलैंड को हासिल करने का सपना कोई नया नहीं है, बल्कि यह करीब 160 साल पुराना इतिहास है। अमेरिका ने समय-समय पर इसके लिए कई कोशिशें की हैं।
इसकी शुरुआत 1867 में हुई, इसके बाद 1910 में भी अमेरिका ने फिलीपींस का कुछ हिस्सा डेनमार्क को देने और बदले में ग्रीनलैंड लेने का ऑफर दिया, लेकिन उसने ठुकरा दिया।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद, जब कोल्ड वॉर (Cold War) शुरू हो रहा था, तब 1946 में राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने आधिकारिक रूप से डेनमार्क को ग्रीनलैंड के बदले 100 मिलियन डॉलर का सोने देने का भी ऑफर दिया, लेकिन वो भी किसी काम नहीं आया।
अमेरिका को क्यों चाहिए ग्रीनलैंड?
ट्रंप प्रशासन ने ग्रीनलैंड को अपनी "राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकता" घोषित कर दिया है। इतना ही नहीं अमेरिका अब ग्रीनलैंड के नागरिकों को सीधे तौर पर पैसे का लालच देकर डेनमार्क से अलग होने के लिए मनाने की रणनीति भी अपना रहा है। तो चलिए अब जानते हैं कि आखिर अमेरिका को ग्रीनलैंड हासिल करने की इतनी बेताबी क्यों है?
1. सैन्य और सामरिक सुरक्षा
ग्रीनलैंड दुनिया के नक्शे पर एक ऐसी जगह स्थित है, जो अमेरिका को रूस और यूरोप के बहुत करीब लाती है। अमेरिका इसे अपनी सुरक्षा के लिए एक "किले" की तरह देखता है। यहां अमेरिका का 'पिटुफिक स्पेस बेस' पहले से मौजूद है, जो अंतरिक्ष से आने वाले खतरों और दुश्मन की मिसाइलों पर नजर रखता है।
अगर अमेरिका ग्रीनलैंड को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लेता है, तो वो यहां से पूरे आर्कटिक क्षेत्र की निगरानी कर सकेगा और रूस की नौसैनिक गतिविधियों को आसानी से रोक पाएगा।
2. बेशकीमती खनिजों का भंडार
ग्रीनलैंड की धरती के नीचे 'रेयर अर्थ एलिमेंट्स' का विशाल भंडार दबा हुआ है। इन खनिजों का इस्तेमाल स्मार्टफोन, कंप्यूटर चिप्स, इलेक्ट्रिक कारों की बैटरी और घातक मिसाइलों को बनाने में किया जाता है। वर्तमान में इन खनिजों की सप्लाई पर चीन का एकछत्र राज है।
इसलिए अमेरिका चाहता है कि ग्रीनलैंड को हासिल करके वो इन धातुओं के लिए चीन पर अपनी निर्भरता खत्म कर दे और भविष्य की तकनीक में दुनिया का लीडर बना रहे।
3. तेल, गैस और ऊर्जा की संभावना
वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनलैंड के तटों के पास समुद्र की गहराई में अरबों बैरल कच्चा तेल और भारी मात्रा में नेचुरल गैस छिपी हो सकती है। जैसे-जैसे दुनिया में एनर्जी की मांग बढ़ रही है, अमेरिका इन संसाधनों पर अपना हक जमाना चाहता है।
हालांकि, कड़ाके की ठंड के कारण यहां खुदाई करना अभी मुश्किल है, लेकिन भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अमेरिका इस द्वीप को एक बेहतरीन निवेश के रूप में देखता है।
4. बर्फ पिघलना और नए समुद्री रास्ते
ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक क्षेत्र की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इससे समुद्र में ऐसे नए रास्ते खुल रहे हैं जो एशिया, यूरोप और अमेरिका के बीच की दूरी को हजारों किलोमीटर कम कर सकते हैं। इन नए रास्तों को 'आर्कटिक सिल्क रोड' कहा जा रहा है।
ऐसे में अमेरिका चाहता है कि ग्रीनलैंड उसके पास हो ताकि वो इन व्यापारिक रास्तों पर अपना नियंत्रण रख सके और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से भारी मुनाफा कमा सके।
5. चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव को रोकना
रूस और चीन दोनों ही आर्कटिक क्षेत्र में अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं। रूस वहां पुराने सैन्य अड्डों को फिर से चालू कर रहा है, जबकि चीन वहां बुनियादी ढांचे में पैसा लगाकर अपना दखल बढ़ाना चाहता है। अमेरिका को डर है कि अगर उसने ग्रीनलैंड को नहीं संभाला, तो उसके दुश्मन देश उसके दरवाजे (उत्तरी सीमा) तक पहुंच जाएंगे। इसलिए, ग्रीनलैंड को हासिल करना अमेरिका के लिए अपनी 'सुपरपावर' की साख बचाए रखने की लड़ाई भी है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने किया कड़ा विरोध
अमेरिका और ट्रंप की धमकी के बीच डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकार ने साफ-साफ कह दिया है कि ये द्वीप बिकाऊ नहीं है। उनके लिए यह केवल जमीन नहीं, बल्कि उनकी पहचान और संप्रभुता का मामला है।
डेनिश प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने इस विचार को "बेतुका" बताया है। उन्होंने ये भी चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ने NATO सहयोगी देश के किसी भी इलाके पर कब्जा करने की कोशिश की, तो हम NATO गठबंधन तोड़ देंगे। डेनमार्क और अमेरिका दोनों ही NATO के सहयोगी देश हैं।
इतना ही नहीं डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय ने तो अपनी सेना को आदेश का इंतजार किए बिना है एक्शन लेने की छूट दे दी है। मंत्रालय ने साफ सैनिकों को साफ शब्दों में कहा- इलाके में जरा सी भी कोई हरकत होती दिखे, तो पहले गोली चलाना फिर सवाल पूछना।
इस विवाद में डेनमार्क को यूरोप के कई देशों का समर्थन भी मिला है। यूरोपीय नेताओं का कहना है कि ग्रीनलैंड का भविष्य ग्रीनलैंड और डेनमार्क ही तय करेंगे। उन्होंने अमेरिका की इस धमकी या होने वाले किसी भी एक्शन का कड़ा विरोध किया है।
वहीं ग्रीनलैंड के लोग भी यही कहते हैं कि "ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है।" प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नीलसन ने जोर देकर कहा है कि "ग्रीनलैंड उसके लोगों का है" और यह बिकाऊ नहीं है।