चीन धड़ाधड़ और तेजी से क्यों खरीदने लगा है हिंदुओं का पवित्र रुद्राक्ष, Rudraksha फार्मिंग तो गजब चमका रही नेपाल की किस्मत!

सदियों से रुद्राक्ष को हिंदू धर्म में भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है। भक्त इसे माला के रूप में पहनते हैं, पूजा में इस्तेमाल करते हैं और इसे अत्यंत पवित्र मानते हैं। लेकिन अब चीन में इसकी मांग एक बिल्कुल अलग वजह से बढ़ रही है, वहां के खरीदार रुद्राक्ष को धार्मिक वस्तु नहीं, बल्कि खूबसूरत आभूषण और फैशन एक्सेसरी के रूप में देखते हैं

अपडेटेड Jun 12, 2026 पर 1:21 PM
चीन धड़ाधड़ और तेजी से क्यों खरीदने लगा है हिंदुओं का पवित्र रुद्राक्ष

नेपाल के मकालू हिमालय इलाके में अशोक कार्की का परिवार तीन दशकों से रुद्राक्ष के ऊंचे-ऊंचे पेड़ों की देखभाल करता आया है। इन पेड़ों को वहां के लोग "Elaeocarpus ganitrus" के नाम से जानते हैं। बचपन से इन बागानों में काम करने वाले अशोक के लिए यह सिर्फ एक परंपरा थी — मगर अब यह एक बड़ा व्यापार बन चुका है। आपको जान कर हैरानी होगी कि हिंदुओं के पवित्र रुद्राक्ष को लेकर इन दिनों चीन की दिलचस्पी काफी बढ़ गई है।

भगवान शिव का आभूषण अब फैशन ज्वेलरी बना

सदियों से रुद्राक्ष को हिंदू धर्म में भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है। भक्त इसे माला के रूप में पहनते हैं, पूजा में इस्तेमाल करते हैं और इसे अत्यंत पवित्र मानते हैं। लेकिन अब चीन में इसकी मांग एक बिल्कुल अलग वजह से बढ़ रही है, वहां के खरीदार रुद्राक्ष को धार्मिक वस्तु नहीं, बल्कि खूबसूरत आभूषण और फैशन एक्सेसरी के रूप में देखते हैं।


चीनी बाजार में रुद्राक्ष की डिमांड इतनी तेजी से बढ़ी है कि नेपाल के छोटे-छोटे गांवों की किस्मत रातोंरात बदल गई। जहां पहले एक किलो पांच मुखी रुद्राक्ष सिर्फ 30 नेपाली रुपये में बिकता था, वहीं अब एक-एक दाने की कीमत 2,000 रुपये तक पहुंच चुकी है। और दुर्लभ किस्में? उनकी बात ही अलग है- कुछ दाने तो लाखों-करोड़ों में बिकते हैं।

रुद्राक्ष की राजधानी: नेपाल की सदानंद म्युनिसिपैलिटी में 1 लाख से ज्यादा रुद्राक्ष के पेड़ हैं। यह इलाका अब "नेपाल की रुद्राक्ष राजधानी" कहलाता है और हर साल करीब 1 अरब नेपाली रुपये की एक्सपोर्ट करता है।

एक पेड़ = हजारों रुपये की कमाई

अशोक कार्की बचपन से ही रुद्राक्ष के बागानों से कमाई करते आए हैं। एक स्वस्थ रुद्राक्ष का पेड़ साल में 4,000 से ज्यादा दाने दे सकता है। पांच मुखी (पंचमुखी) रुद्राक्ष सबसे आम और सबसे ज्यादा मांग वाला है। लेकिन एक मुखी (एकमुखी) रुद्राक्ष बेहद दुर्लभ होता है और धार्मिक मान्यता के अनुसार उसमें चमत्कारी शक्तियां होती हैं।

मगर इस चमक के पीछे एक अंधेरा भी है

चीनी खरीदारों को खास आकार और साइज के रुद्राक्ष चाहिए, ऐसे दाने जो देखने में ज्यादा आकर्षक और परफेक्ट लगें। इस मांग को पूरा करने के लिए नेपाल के किसान अब एक चिंताजनक रास्ता अपना रहे हैं — कलियों में 4 बार तक "Plant Growth Regulators (PGR)" यानी रासायनिक दवाइयां इंजेक्ट की जाती हैं। यह रसायन रुद्राक्ष को बड़ा, गोल और चमकदार बनाते हैं, मगर इनका इस्तेमाल बिना किसी सरकारी नियम-कानून के हो रहा है।

रुद्राक्ष किसान अशोक कार्की कहते हैं, "प्राकृतिक दाने उतने आकर्षक नहीं होते। चीनी व्यापारियों का ध्यान खींचने के लिए हमें ये दवाइयां लगानी ही पड़ती हैं। यह अब मजबूरी बन गई है।"

हालांकि, इन रासायनिक दवाओं के बेलगाम इस्तेमाल से पर्यावरण, मिट्टी और स्थानीय स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इसे जल्द नहीं रोका गया, तो यह तरक्की टिकाऊ नहीं होगी।

नेपाल के लिए सोने का अंडा- मगर कब तक?

रुद्राक्ष की खेती ने पूर्वी नेपाल के कई गांवों में आर्थिक क्रांति-सी ला दी है। जो परिवार कभी दो वक्त की रोटी के लिए जूझते थे, वे अब अच्छे मकान बनवा रहे हैं, बच्चों को अच्छे स्कूल भेज रहे हैं। नेपाल की सरकार भी इस नए "ग्रीन गोल्ड" से मिल रहे राजस्व को लेकर उत्साहित है।

लेकिन विशेषज्ञ और पर्यावरणविद चेतावनी दे रहे हैं कि बिना नियमन के रसायनों का इस्तेमाल और चीन की ऊंची मांग पर पूरी तरह निर्भरता — दोनों मिलकर इस समृद्धि की बुनियाद कमजोर कर सकते हैं।

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