US-Iran Peace Deal: शांति समझौते पर अमेरिका और ईरान की राय अलग-अलग क्यों है? इन अहम मुद्दों पर मतभेद बरकरार

US-Iran Peace Deal: अमेरिका और ईरान के बीच 107 दिन तक जारी रहे युद्ध को समाप्त करने एवं होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने पर सहमति बन गई है। अधिकारियों ने बताया कि दोनों देशों के बीच शांति समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर किए जाएंगे

अपडेटेड Jun 15, 2026 पर 11:14 AM
US-Iran Peace Deal: शांति समझौते को लेकर अमेरिका और ईरान अलग-अलग दावे कर रहे हैं

US-Iran Peace Deal: अमेरिका और ईरान ने युद्ध समाप्त करने, अमेरिकी नाकाबंदी हटाने और होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने के लिए एक समझौते पर सहमति बनने का दावा किया है। हालांकि, समझौते की पूरी डिटेल्स अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। दोनों देश इसकी शर्तों लागू होने के समय और आगे की बातचीत की प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग दावे कर रहे हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के साथ समझौता अब पूरा हो चुका है। दूसरी ओर, ईरान का कहना है कि वह समझौते को औपचारिक रूप से साइन किए जाने के बाद ही लागू करेगा।

जमे हुए ईरानी फंड पर सबसे बड़ा विवाद


दोनों पक्षों के बीच सबसे स्पष्ट मतभेद अरबों डॉलर की उन ईरानी संपत्तियों को लेकर है जो विदेशों में जमी हुई हैं। ईरान के उप विदेश मंत्री काज़ेम ग़रीबाबादी ने कहा कि प्रस्तावित 60 दिनों की वार्ता तभी शुरू होगी जब अमेरिका तीन प्रमुख कदम उठाएगा:-

जैसे अमेरिका नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त करेगा

युद्ध और सैन्य कार्रवाई खत्म करेगा

और ईरान के जमे हुए फंड जारी करेगा।

इससे पहले खबर आई थी कि मसौदा समझौते में 25 अरब डॉलर की जमी हुई ईरानी संपत्तियां जारी करने का प्रावधान है। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने इस दावे को खारिज कर दिया। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि यह परफॉर्मेंस के बदले लाभ वाला समझौता है और ईरान के अपने दायित्व पूरे किए बिना कोई फंड जारी नहीं किया जाएगा। यानी सबसे बड़ा सवाल यही है कि पहले कदम कौन उठाएगा?

परमाणु कार्यक्रम पर सबसे गंभीर मतभेद

समझौते का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पहलू ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने संकेत दिया है कि समझौता ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से स्थायी रूप से रोक देगा।

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार अंतिम व्यवस्था के तहत:-

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त किया जाएगा।

उच्च स्तर पर संवर्धित यूरेनियम का भंडार नष्ट किया जाएगा।

और उसे देश से बाहर ले जाया जाएगा।

लेकिन ईरान ने सार्वजनिक रूप से इस संस्करण को स्वीकार नहीं किया है। तेहरान का कहना है कि परमाणु मुद्दे पर अगले 60 दिनों की वार्ता में चर्चा होगी। ईरान लगातार यह दावा करता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।

ईरानी अधिकारियों के अनुसार, उच्च संवर्धित यूरेनियम को देश के भीतर ही पतला (Dilute) किया जा सकता है, न कि उसे बाहर भेजा जाएगा।

यही पॉइंट दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा मतभेद माना जा रहा है।

प्रतिबंध हटाने को लेकर भी अलग सोच

ईरान चाहता है कि वार्ता की शुरुआत में ही उसके खिलाफ लगाए गए प्रतिबंध हटाए जाएं।

ग़रीबाबादी ने कहा कि अहम मुद्दों में शामिल हैं:-

सभी आर्थिक प्रतिबंधों की समाप्त करना।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों की समाप्ति।

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के कुछ प्रस्तावों को हटाना।

वहीं अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगी ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली का कहना है कि प्रतिबंध तभी हटाए जाएंगे जब ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर स्पष्ट और सत्यापित कदम उठाएगा। इसलिए विवाद सिर्फ प्रतिबंध हटाने पर नहीं, बल्कि उसके समय और शर्तों पर भी है।

होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने पर भ्रम

ट्रंप ने शुरुआत में घोषणा की थी कि होर्मुज जलडमरूमध्य तुरंत खोल दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि वह जलमार्ग को टोल-फ्री आधार पर खोलने और अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाने की अनुमति दे रहे हैं। हालांकि कुछ घंटों बाद उनका रुख बदलता नजर आया।

बाद में उन्होंने कहा कि जलडमरूमध्य शुक्रवार को खुलेगा, जब स्विट्जरलैंड में समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। शुरुआत में इसका उपयोग समुद्री बारूदी सुरंगों को हटाने के लिए किया जाएगा। दूसरी ओर, ईरानी मीडिया का दावा है कि समझौते के तहत जलडमरूमध्य को 30 दिनों के भीतर ईरान की व्यवस्था के अनुसार खोला जाएगा।

इससे यह स्पष्ट नहीं है कि मार्ग कब और किस प्रक्रिया के तहत पूरी तरह खुलेगा।  ईरान और पाकिस्तान दोनों का कहना है कि समझौते में लेबनान समेत सभी मोर्चों पर तत्काल और स्थायी युद्धविराम शामिल है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी कहा कि दोनों पक्षों ने सभी मोर्चों पर सैन्य गतिविधियां समाप्त करने पर सहमति जताई है। हालांकि इस मामले में एक बड़ी चुनौती मौजूद है।

इजयाल, अमेरिका-ईरान वार्ता का हिस्सा नहीं है। उसने पहले ही संकेत दिया है कि वह लेबनान में अपनी सैन्य कार्रवाई पर किसी तरह की पाबंदी स्वीकार नहीं करेगा। इजरायली अधिकारियों का मानना है कि समझौते के बाद वॉशिंगटन उस पर दबाव बना सकता है। लेकिन सरकार फिलहाल इस मुद्दे पर पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रही। ऐसे में लेबनान वह पहला क्षेत्र बन सकता है जहां इस समझौते की वास्तविक परीक्षा होगी।

एक समझौता, दो अलग कहानियां

अमेरिका इस समझौते को एक बड़ी रणनीतिक सफलता के रूप में पेश कर रहा है, जिसके तहत:-

होर्मुज जलडमरूमध्य खुलेगा।

नाकाबंदी समाप्त होगी।

ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोका जाएगा।

वहीं, ईरान इसे ऐसे ढांचे के रूप में पेश कर रहा है जिसमें अमेरिका को पहले सैन्य और आर्थिक दबाव समाप्त करना होगा। उसके बाद विस्तृत वार्ता आगे बढ़ेगी।

शांति समझौते का निष्कर्ष

समझौते का पूरा पाठ सार्वजनिक न होने के कारण यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तविक शर्तें क्या हैं। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि इस समझौते ने युद्धविराम और आगे की बातचीत का रास्ता खोला है। लेकिन परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत, जमे हुए फंड और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे सबसे कठिन मुद्दों पर अभी भी दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण मतभेद बने हुए हैं।

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