6 जुलाई को 90 साल के हो जाएंगे दलाई लामा; उनका उत्तराधिकारी कौन चुनेगा, तिब्बत के लोग या फिर चीन?
Dalai Lama succession: दलाई लामा 6 जुलाई को 90 साल के हो जाएंगे। उनकी बढ़ती उम्र और गिरती सेहत के बीच उनके उत्तराधिकारी को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। चीन खुद दलाई लामा चुनना चाहता है, जबकि तिब्बती समुदाय और पश्चिमी देश इसे खारिज कर चुके हैं। जानिए दलाई लामा के उत्तराधिकारी की इतनी अहमियत क्यों है?
तिब्बती बौद्ध धर्म में उत्तराधिकारी की खोज एक गूढ़ धार्मिक परंपरा है।
Dalai Lama succession: तिब्बती धर्मगुरु 14वें दलाई लामा 6 जुलाई 2025 को अपनी 90वीं वर्षगांठ मनाएंगे। जैसे-जैसे उनका जन्मदिन नजदीक आ रहा है, उनके उत्तराधिकारी को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि दलाई लामा अपने जन्मदिन पर उत्तराधिकार से जुड़ी घोषणा कर सकते हैं।
तिब्बती बौद्ध धर्म में उत्तराधिकारी की खोज एक गूढ़ धार्मिक परंपरा है। लेकिन, इस बार यह पूरी प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है। चीन का दावा है कि वह अगला दलाई लामा चुनेगा, जबकि निर्वासन में रह रहा तिब्बती समुदाय इस दावे को खारिज कर चुका है।
दलाई लामा तिब्बतियों के लिए न सिर्फ आध्यात्मिक नेता हैं, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान के प्रतीक भी हैं। वहीं, चीन उन्हें अलगाववाद का प्रतिनिधि मानता है, जिसकी वैश्विक मान्यता तिब्बत पर उसके नियंत्रण को चुनौती देती है।
दलाई लामा की पुनर्जन्म प्रक्रिया क्या है?
तिब्बती मान्यताओं के अनुसार, दलाई लामा बोधिसत्व का पुनर्जन्म होते हैं, जो बार-बार जन्म लेकर मानवता की सेवा करते हैं। जब किसी दलाई लामा का देहांत होता है, तो वरिष्ठ लामाओं और भिक्षुओं का एक दल दिव्य संकेतों, सपनों और अन्य रहस्यमयी घटनाओं के आधार पर नए अवतार की खोज करता है।
ऐसे बच्चों की पहचान की जाती है, जिनका जन्म पिछले दलाई लामा की मृत्यु के आसपास हुआ हो और जिनमें असाधारण बौद्धिक या आध्यात्मिक लक्षण दिखाई दें। इन्हें खास वस्तुएं पहचानने के लिए दी जाती हैं, जो पुराने दलाई लामा से जुड़ी हों। सही चयन करने पर इन्हें पुनर्जन्म माना जाता है।
इसी प्रक्रिया के तहत मौजूदा दलाई लामा ल्हामो धोंडुप को महज दो साल की उम्र में चुना गया था। उन्होंने 13वें दलाई लामा की वस्तुओं को पहचान कर कहा था, 'यह मेरी है।'
चीन बनाम दलाई लामा: कौन चुनेगा दलाई लामा?
14वें दलाई लामा यह स्पष्ट कर चुके हैं कि उनके पुनर्जन्म से जुड़ा निर्णय वे स्वयं लेंगे, न कि चीनी सरकार। हाल के वर्षों में उन्होंने इस मुद्दे पर अपना रुख सार्वजनिक रूप से साफ किया है:
अगर उन्हें लगे कि दलाई लामा की संस्था ने अपना मकसद पूरा कर लिया है, तो वह पुनर्जन्म न लेने का भी फैसला कर सकते हैं।
वह'पुनर्जन्म' के बजाय 'उत्सर्जन' का विकल्प चुन सकते हैं यानी जीते-जी किसी को दलाई लामा चुनना।
अगर पुनर्जन्म होता है, तो वह चीन के बाहर, किसी स्वतंत्र देश में होगा। सबसे संभावित रूप से भारत में होगा, जहां दलाई लामा 1959 से निर्वासन में रह रहे हैं।
चीन की ओर से घोषित किसी भी बच्चे को तिब्बती निर्वासित समुदाय वैध उत्तराधिकारी नहीं मानेगा।
दलाई लामा ने कहा है, 'जो कम्युनिस्ट धर्म को नकारते हैं, उन्हें लामाओं की पुनर्जन्म प्रक्रिया में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।'
दलाई लामा के उत्तराधिकारी की प्रक्रिया की निगरानी के लिए गदेन फोड्रांग फाउंडेशन (Gaden Phodrang Foundation) है। इसकी स्थापना 2015 में दलाई लामा ने की थी। यह वरिष्ठ भिक्षुओं और आध्यात्मिक सहयोगियों के साथ मिलकर उत्तराधिकारी तलाशने की जिम्मेदारी निभाएगी। धर्मशाला स्थित निर्वासित तिब्बती संसद का भी कहना है कि उनके पास एक ऐसा ढांचा मौजूद है, जो पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप वैध उत्तराधिकार सुनिश्चित करेगा।
चीन का दावा और ‘गोल्डन अर्न’ परंपरा
चीनी सरकार का कहना है कि दलाई लामा की अगली नियुक्ति को वैधता देने का अधिकार उसी के पास है। इसके लिए वह किंग राजवंश की परंपरा ‘गोल्डन अर्न’ का हवाला देती है। यह एक लॉटरी प्रक्रिया है, जो 1793 में लागू की गई थी और जिसके तहत पुनर्जन्म की मंजूरी दी जाती थी। मौजूदा चीनी कानूनों के अनुसार:
सभी तिब्बती धार्मिक गुरुओं के पुनर्जन्म पर सरकारी मंजूरी जरूरी है।
अगला दलाई लामा चीन की सीमा के भीतर पैदा होना चाहिए।
अगर किसी दूसरे उत्तराधिकारी को मान्यता दी जाती है, तो उसे चीनी संप्रभुता का उल्लंघन माना जाएगा।
हालांकि आलोचकों का कहना है कि यह सब तिब्बती बौद्ध धर्म पर नियंत्रण स्थापित करने और वहां की सांस्कृतिक पहचान को दबाने की कोशिश भर है। साथ ही, चीन जिस तरह से नए दलाई लामा को चुनने को अपना हक बता रहा, उससे लगता है कि वह छह दशकों के आर्थिक विकास और दमन-चक्र के बावजूद तिब्बतियों की वफादारी नहीं जीत पाया। न ही उनके धार्मिक नेता के प्रति उनकी श्रद्धा को डिगा पाया। ऐसे में चीन आखिरी दांव के रूप में अपना दलाई लामा चाहता है, जिससे तिब्बत के चीन में शामिल होने में कोई रुकावट ना रहे।
चीन को क्यों है इतनी चिंता?
चीन को इस बात की गहरी चिंता है कि अगला दलाई लामा अगर चीन के बाहर, खासकर भारत में खोजा गया, तो उसकी मुश्किलें बढ़ जाएंगी। वह न सिर्फ उसकी वैधता को चुनौती देगा, बल्कि यह भी उजागर करेगा कि तिब्बती आध्यात्मिक मामलों पर चीन का नियंत्रण बेहद सीमित है।
भारत में दलाई लामा की मौजूदगी नई दिल्ली को कूटनीतिक बढ़त देती है। भारत में 1 लाख से ज्यादा तिब्बती निर्वासित रहते हैं, और यहां दलाई लामा को मुक्त आवाज और वैश्विक मीडिया तक पहुंच हासिल है।
तिब्बती नेतृत्व के साथ है पश्चिम
अमेरिका और अन्य पश्चिमी लोकतंत्र तिब्बती नेतृत्व के साथ खड़े हैं। वे बार-बार स्पष्ट कर चुके हैं कि वे चीन की ओर से नियुक्त किसी भी दलाई लामा को मान्यता नहीं देंगे।
पश्चिमी देश दलाई लामा से काफी प्रभावित हैं। उन्हें साल 1989 में नोबेल के शांति पुरस्कार से नवाजा गया। हॉलीवुड स्टार ब्रैड पिट की फिल्म 'सेवन इयर्स इन तिब्बत' से उनकी पश्चिम में लोकप्रियता और बढ़ गई। कई हॉलिवुड सितारे और दुनिया की सम्मानित हस्तियां दलाई लामा के साथ सार्वजनिक तौर पर नजर आईं। इससे पूरी दुनिया में उनका प्रभाव बढ़ा।