राजस्थान के रेगिस्तानी और अर्ध-रेगिस्तानी इलाकों में बाजरा केवल एक फसल नहीं, बल्कि किसानों की रोजी-रोटी का आधार है। कम बारिश और सीमित पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में यह अनाज बड़ी मजबूती से खड़ा रहता है। यही वजह है कि यहां के किसानों के लिए बाजरा खेती का भरोसेमंद सहारा माना जाता है। यह लोगों की थाली भरता है और पशुओं के लिए भी अहम चारा साबित होता है। हालांकि, हर साल इस फसल पर कई तरह की चुनौतियां भी मंडराती रहती हैं। इनमें सबसे बड़ी परेशानी ‘करवा’ नाम के कीट की होती है, जो देखते ही देखते खेतों में फैलकर नुकसान पहुंचा सकता है।
पहले के समय में जब आधुनिक कीटनाशक या दवाएं आसानी से नहीं मिलती थीं, तब किसानों ने अपने अनुभव, परंपरा और लोकज्ञान के आधार पर कई अनोखे और देसी उपाय अपनाए। यही पारंपरिक ज्ञान आज भी ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
जीते जी भी काम का, मरने के बाद भी काम का
राजस्थान प्राच्या विद्या प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी डॉ. नितिन गोयल के मुताबिक, रेगिस्तानी इलाकों में ऊंट सिर्फ जानवर नहीं, बल्कि जीवन की रीढ़ माना जाता है। खेती, ढुलाई और रोज़गार में मदद करने वाला ऊंट मरने के बाद भी बेकार नहीं जाता। गांवों में उसकी हड्डियां आज भी अलग-अलग कामों में इस्तेमाल होती हैं।
करवा भगाने का देसी जुगाड़
गांव के किसानों का कहना है कि बाजरे के खेत में जब ‘करवा’ कीड़ा बढ़ जाता है, तो ऊंट की सूखी हड्डियां खेत के पास जला दी जाती हैं। इससे उठने वाला तेज धुआं और गंध कीड़ों को दूर भगाने में मदद करता है। यह तरीका पीढ़ियों से चलता आ रहा है, खासकर उन इलाकों में जहां रासायनिक कीटनाशक नहीं मिलते थे। वैज्ञानिक इसे पूरी तरह प्रमाणित नहीं मानते, लेकिन मानते हैं कि धुआं कुछ कीटों को अस्थायी तौर पर दूर रख सकता है।
परंपरा और विज्ञान का संगम जरूरी
डॉ. गोयल का कहना है कि ऐसे देसी तरीकों को अंधविश्वास कहकर नकारना ठीक नहीं। इन पर शोध कर इन्हें सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सकता है। आज जब ज्यादा रसायन मिट्टी और सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं, तब किसानों का यह लोकज्ञान टिकाऊ खेती की दिशा में अहम भूमिका निभा सकता है।