Budget 2026: कैपिटल गेन टैक्स में बदलाव, इक्विटी और म्यूचुअल फंड के लिए बने रोडमैप
Budget 2026: पिछले करीब दो दशकों में भारत की कैपिटल गेन टैक्स व्यवस्था में बड़ा और अहम बदलाव देखने को मिला है। एक समय ऐसा था जब कैपिटल गेन को लगभग कर-मुक्त माना जाता था, लेकिन समय के साथ सरकार ने इस व्यवस्था को ज्यादा संरचित, पारदर्शी और संतुलित बनाया है
Budget 2026: पिछले करीब दो दशकों में भारत की कैपिटल गेन टैक्स व्यवस्था में बड़ा और अहम बदलाव देखने को मिला है।
Budget 2026: पिछले करीब दो दशकों में भारत की कैपिटल गेन टैक्स व्यवस्था में बड़ा और अहम बदलाव देखने को मिला है। एक समय ऐसा था जब कैपिटल गेन को लगभग कर-मुक्त माना जाता था, लेकिन समय के साथ सरकार ने इस व्यवस्था को ज्यादा संरचित, पारदर्शी और संतुलित बनाया है। इसका मकसद साफ रहा है—एक तरफ सरकार की राजस्व जरूरतों को पूरा करना और दूसरी तरफ निवेशकों का भरोसा बनाए रखना। नीति-निर्माताओं ने लगातार इस बात की कोशिश की है कि टैक्स सिस्टम ऐसा हो जो निवेश को हतोत्साहित न करे, बल्कि भारत को एक भरोसेमंद और आकर्षक निवेश गंतव्य के रूप में पेश करे।
बदलता हुआ परिदृश्य
परंपरागत रूप से लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) पर 20 प्रतिशत टैक्स लगता था और इसमें इंडेक्सेशन का गेन दिया जाता था। इंडेक्सेशन से महंगाई के असर को कम करने में मदद मिलती थी, जिससे वास्तविक कर बोझ घट जाता था। लेकिन वर्ष 2004 में सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) लागू होने के साथ यह व्यवस्था पूरी तरह बदल गई। इसके बदले सूचीबद्ध इक्विटी शेयरों और इक्विटी-उन्मुख म्यूचुअल फंड्स पर, जिन पर STT चुकाया गया हो, होने वाले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन को पूरी तरह टैक्स फ्री कर दिया गया।
यह कदम भारतीय पूंजी बाजार के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। इससे बाजार में पारदर्शिता बढ़ी, लेनदेन आसान हुआ और घरेलू के साथ-साथ विदेशी निवेशकों का भरोसा भी मजबूत हुआ। इक्विटी बाजारों में गहराई आई और निवेश का दायरा तेजी से बढ़ा।
2018 में टैक्स की वापसी
हालांकि समय के साथ यह टैक्स छूट निवेश व्यवहार को असंतुलित करने लगी। कई बार निवेश का उद्देश्य आर्थिक मजबूती के बजाय टैक्स बचत बन गया। इसी असंतुलन को दूर करने और टैक्स बेस को सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने 2018 में सूचीबद्ध इक्विटी और इक्विटी-उन्मुख म्यूचुअल फंड्स पर LTCG टैक्स दोबारा लागू किया। आयकर अधिनियम की धारा 112A के तहत एक लाख रुपये से अधिक के गेन पर 10 प्रतिशत टैक्स लगाया गया।
इसके साथ ही 31 जनवरी 2018 तक अर्जित गेन को ‘ग्रैंडफादरिंग’ के जरिए टैक्स से सुरक्षित रखा गया। यह एक संतुलित कदम था, जिससे निवेशकों को अचानक झटका न लगे और बाजार की प्रतिस्पर्धात्मकता भी बनी रहे।
बजट 2024: एकरूपता की दिशा में कदम
बजट 2024 में सरकार ने कैपिटल गेन टैक्स को और तार्किक बनाने की दिशा में अहम कदम उठाया। सूचीबद्ध इक्विटी पर LTCG टैक्स की दर 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत कर दी गई। वहीं गैर-सूचीबद्ध इक्विटी पर यह दर 20 प्रतिशत से घटाकर 12.5 प्रतिशत कर दी गई। इसका साफ उद्देश्य अलग-अलग इक्विटी साधनों पर टैक्स दरों में समानता लाना था।
हालांकि इस एकरूपता के साथ इंडेक्सेशन का गेन हटा दिया गया। यही नीति अचल संपत्ति पर भी लागू की गई, जहां LTCG टैक्स 20 प्रतिशत से घटाकर 12.5 प्रतिशत कर दिया गया, लेकिन इंडेक्सेशन समाप्त कर दी गई। हितधारकों की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए सरकार ने 23 जुलाई 2024 से पहले खरीदी गई संपत्तियों के लिए संक्रमणकालीन राहत दी। इसके तहत व्यक्ति और HUF चाहें तो इंडेक्सेशन के साथ 20 प्रतिशत टैक्स या बिना इंडेक्सेशन 12.5 प्रतिशत टैक्स चुन सकते हैं।
आगे सुधार की गुंजाइश
बजट 2026 की ओर बढ़ते हुए यह साफ दिखता है कि भारत एक सरल, तटस्थ और भविष्य के अनुरूप कैपिटल गेन टैक्स ढांचा बनाना चाहता है। लेकिन कुछ क्षेत्रों में अभी भी सुधार की गुंजाइश है।
सबसे बड़ी असंगति होल्डिंग पीरियड को लेकर है। सूचीबद्ध शेयरों के लिए 12 महीने से ज्यादा रखने पर LTCG माना जाता है, जबकि गैर-सूचीबद्ध शेयरों के लिए 24 महीने की शर्त है। इन अवधियों में समानता लाने से जटिलता कम होगी और टैक्स सिस्टम ज्यादा तार्किक बनेगा।
STT पर पुनर्विचार की जरूरत
जब इक्विटी पर LTCG टैक्स फिर से लागू हो चुका है, तो मौजूदा दरों पर STT बनाए रखने का औचित्य भी सवालों के घेरे में है। आज निवेशकों पर दोहरा बोझ है—एक तरफ STT और दूसरी तरफ कैपिटल गेन टैक्स। STT में कमी या इसे चरणबद्ध तरीके से खत्म करने से लेनदेन लागत घटेगी और बाजार में तरलता बढ़ेगी।
इक्विटी और डेट म्यूचुअल फंड में समानता
फिलहाल इक्विटी-उन्मुख म्यूचुअल फंड्स को टैक्स में खास फायदा मिलता है, जबकि डेट फंड्स पर स्लैब के अनुसार टैक्स लगता है, चाहे होल्डिंग अवधि कुछ भी हो। इससे डेट फंड्स की आकर्षण क्षमता घट गई है। होल्डिंग अवधि या टैक्स ढांचे में तालमेल लाकर इस असंतुलन को दूर किया जा सकता है।
CCD और सशर्त प्रतिफल पर स्पष्टता
अनिवार्य रूप से परिवर्तनीय डिबेंचर (CCD) को कई बार इक्विटी जैसा माना गया है, लेकिन टैक्स ट्रीटमेंट अब भी डेट जैसा है। इन्हें इक्विटी के समान टैक्स ट्रीटमेंट देने से व्यवस्था ज्यादा स्पष्ट होगी। इसी तरह M&A सौदों में सशर्त प्रतिफल पर टैक्स कब लगे, इस पर भी कानून में साफ दिशा-निर्देश जरूरी हैं।
भारत की निवेश प्रतिस्पर्धात्मकता
हालिया आंकड़े बताते हैं कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी बढ़ी है। ऐसे में कैपिटल गेन टैक्स का वास्तविक युक्तिकरण—जहां समान साधनों पर समान टैक्स, कम जटिलता और कम दोहरा बोझ हो—निवेशकों का भरोसा दोबारा कायम कर सकता है।
आगे की राह
भारत अगर अपने पूंजी बाजारों को मजबूत करना चाहता है और दीर्घकालिक वैश्विक निवेश आकर्षित करना चाहता है, तो एक सरल, पारदर्शी और पूर्वानुमेय कैपिटल गेन टैक्स ढांचा बेहद जरूरी है। बजट 2026 इस दिशा में ठोस और दूरदर्शी कदम उठाने का एक बड़ा अवसर हो सकता है।