एक साल में 180 गानों का रिकॉर्ड, गिनीज में एंट्री और गोल्डन लाइफस्टाइल वाला स्टार

‘डिस्को किंग’ के रूप में पहचान बनाने वाले बप्पी लहरी ने अपने करियर में 500 से अधिक फिल्मों में संगीत दिया। उनकी धुनें हर जश्न और पार्टी की जान बन गईं। भले ही आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गीत अब भी श्रोताओं के दिलों में गूंजते हैं

अपडेटेड Feb 16, 2026 पर 2:14 PM
Story continues below Advertisement
बप्पी लहरी ने सिर्फ गाने नहीं बनाए, बल्कि एक दौर को आवाज दी।

भारतीय सिनेमा में जब भी ‘डिस्को’ की धुन बजती है, दिल और दिमाग एक साथ जिस नाम को याद करते हैं, वह है बप्पी लहरी। सोने की चमचमाती चेन, काले चश्मे, घुंघराले लंबे बाल और चेहरे पर सजी मासूम मुस्कान—उनकी शख्सियत ही अपने आप में एक स्टाइल स्टेटमेंट थी। वे सिर्फ गायक या संगीतकार नहीं थे, बल्कि एक दौर की पहचान थे। ‘डिस्को किंग’ के नाम से मशहूर बप्पी दा ने भारतीय म्यूजिक इंडस्ट्री को एक नई बीट, नई चमक और नया अंदाज दिया।

उनकी मौजूदगी मंच पर अलग ही ऊर्जा भर देती थी, और उनकी धुनें सुनते ही पैर खुद-ब-खुद थिरकने लगते थे। 80 और 90 के दशक में उनका संगीत सिर्फ ट्रेंड नहीं, बल्कि एक क्रेज बन चुका था। बप्पी लहरी ने अपनी अनोखी स्टाइल और जोशीले संगीत से खुद को भीड़ से अलग साबित किया।

करियर की शुरुआत से सुपरहिट पहचान तक


बप्पी दा ने 1973 में फिल्म नन्हा शिकारी से बतौर संगीत निर्देशक अपने सफर की शुरुआत की। हालांकि असली पहचान उन्हें 1975 की फिल्म जख्मी से मिली। इस फिल्म में उन्होंने न सिर्फ संगीत दिया, बल्कि प्लेबैक सिंगर के रूप में भी अपनी आवाज का जादू चलाया। इसके बाद उनकी धुनें हर पार्टी, हर शादी और हर जश्न की जान बन गईं।

उनका पॉप और डिस्को का फ्यूजन उस दौर में बिल्कुल नया था। तेज बीट्स और कैची धुनों ने उन्हें युवाओं का चहेता बना दिया।

एक साल, 33 फिल्में और 180 गाने!

बप्पी लहरी का मानना था कि साल में दो-तीन फिल्में करना ही काफी है, लेकिन जुनून जब सिर चढ़कर बोले तो इतिहास बन जाता है। साल 1986 में उन्होंने 33 फिल्मों के लिए 180 से ज्यादा गाने रिकॉर्ड कर एक अनोखा रिकॉर्ड कायम किया।

उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि ने उन्हें Guinness World Records में जगह दिलाई। उस समय पूरी इंडस्ट्री उनकी रफ्तार और मेहनत देखकर दंग रह गई थी।

संगीत विरासत में मिला

27 नवंबर 1952 को बंगाल के एक संगीत परिवार में जन्मे बप्पी दा के लिए सुर और ताल जैसे खून में ही थे। उनके पिता अपरेश लहरी और मां बंसरी लहरी दोनों ही प्रसिद्ध गायक-संगीतकार थे।

सिर्फ तीन साल की उम्र से उन्होंने संगीत की तालीम लेना शुरू कर दी थी। क्लासिकल तबला वादन की शिक्षा उन्होंने मशहूर गुरु पंडित शांताप्रसाद से ली। 11 साल की उम्र तक आते-आते वह पियानो बजाने लगे थे। आगे चलकर उन्होंने हिंदी, बंगाली और दक्षिण भारतीय भाषाओं में 5 हजार से अधिक गाने गाए और 500 से ज्यादा फिल्मों में संगीत दिया।

सोने से खास रिश्ता

बप्पी दा का सोने के गहनों से लगाव भी किसी कहानी से कम नहीं। वे अमेरिकी पॉप आइकन Elvis Presley से बेहद प्रभावित थे। एल्विस को अक्सर सोने की चेन पहने देखकर उन्होंने ठान लिया था कि जब सफलता मिलेगी, तो वे भी सोना पहनेंगे—और उन्होंने अपना वादा निभाया।

उनका सोने से प्यार सिर्फ चेन और अंगूठियों तक सीमित नहीं था। कहा जाता है कि वे सोने के कप में चाय पीना भी पसंद करते थे और इसे अपने लिए ‘लकी चार्म’ मानते थे।

हमेशा याद रहेंगे डिस्को किंग

बप्पी लहरी ने सिर्फ गाने नहीं बनाए, बल्कि एक दौर को आवाज दी। उनकी धुनों ने पीढ़ियों को थिरकाया और भारतीय संगीत में डिस्को की चमक हमेशा के लिए दर्ज कर दी। उनकी स्टाइल, उनका संगीत और उनकी मुस्कान—सब कुछ आज भी उतना ही यादगार है।

हिंदी में शेयर बाजार स्टॉक मार्केट न्यूज़,  बिजनेस न्यूज़,  पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App  डाउनलोड करें।