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Indus Water Treaty: 1960 में लोकसभा में बहस के दौरान कांग्रेस सासंदों तक ने किया था संधि का विरोध, नेहरू अलग पड़ गए थे

ज्यादातर सासंदों यहां तक कि कांग्रेस के सासदों ने भी सिंधु जल संधि की आलोचना की थी। 30 नवंबर, 1960 का दिन लोकसभा में IWT पर चर्चा के लिए तय किया गया। तब सांसदों की राय काफी विभाजित दिखी। सरकार के इस संधि के फैसले का विरोध कई सासंदों ने किया

Edited By: Rakesh Ranjanअपडेटेड Aug 18, 2025 पर 6:24 PM
Indus Water Treaty: 1960 में लोकसभा में बहस के दौरान कांग्रेस सासंदों तक ने किया था संधि का विरोध, नेहरू अलग पड़ गए थे
सिंधु जल संधि पर सांसदों के विरोध की वजह से लोकसभा में बहस का समापन बगैर वोटिंग के हुआ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले के प्राचीर से कहा कि सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) 1960 में हुआ था। पाकिस्तान के साथ इस संधि पर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हस्ताक्षर किए थे। उन्होंने कहा कि यह संधि एकतरफा थी, जिससे इंडिया के किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस संधि पर तब लोकसभा में व्यापक बहस हुई थी।

ज्यादातर सासंदों यहां तक कि कांग्रेस के सासदों ने भी सिंधु जल संधि की आलोचना की थी। 30 नवंबर, 1960 का दिन लोकसभा में IWT पर चर्चा के लिए तय किया गया। तब सांसदों की राय काफी विभाजित दिखी। सरकार के इस संधि के फैसले का विरोध कई सासंदों ने किया। यहां तक कि कई कांग्रेसी सांसदों ने भी इसका विरोध किया। उनका मानना था कि इस संधि में इंडिया के हितों की अनदेखी हुई है। इस संधि पर संसद या विपक्ष को भरोसे में लिए बगैर हस्ताक्षर किया गया था। संसद में बहस से पहले ही इस पर हस्ताक्षर हो चुके थे।

IWT उन कुछ प्रस्तावों में से एक था, जिन पर नेहरू को अपने करियर के सबसे कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। संसद में करीब हर सांसद ने इस संधि का विरोध किया। कई सासंदों ने तो इसे देश का दूसरा बंटवारा तक बताया। तब बलरामपुर से सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे ऐसा खतरनाक रियायत बताया था, जिससे दोनों देशों के बीच लंबे समय तक रिश्ता कायम नहीं रह पाएगा। इस संधि पर संसद में बहस होने से पहले ही 19 सितंबर, 1960 को नेहरू और पाकिस्तान के मिलिट्री शासक और राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर कर दिए थे।

30 नवंबर को इस संधि पर चर्चा के लिए 10 सासंदों ने प्रस्ताव दिए थे। चर्चा के लिए सिर्फ दो घंटे का समय तय किया गया। पहले से ही यह साफ हो चुका था कि इस संधि में अब संसद की कोई भूमिका नहीं रह गई है। सिर्फ खानपूर्ति के लिए इस पर संसद में बहस कराई गई। वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में हुई इस संधि के तहत रावी, ब्यास और सतलुज भारत को देने का प्रस्ताव था। सिंधु, झेलम और चिनाब पाकिस्तान को देने का प्रस्ताव था। पाकिस्तान में पुनर्वास कार्य पर खर्च के लिए इंडिया को 83 करोड़ रुपये देने का प्रस्ताव था।

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