पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और SIR के तहत जारी वोटर लिस्ट सुर्खियों में बना हुआ है। इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय ने CAA के तहत नागरिकता देने के लिए दो और एम्पावर्ड कमेटियों का गठन किया है। इससे पहले भी दो कमेटियां बनाई जा चुकी हैं। अब कुल चार कमेटियां नागरिकता से जुड़े आवेदनों की जांच और अंतिम फैसला लेने का काम करेंगी।
सूत्रों के मुताबिक, इन कमेटियों का काम लंबित आवेदनों की तेजी से समीक्षा करना है, ताकि योग्य लोगों को जल्द नागरिकता दी जा सके। खासतौर पर मतुआ समुदाय के बीच यह मांग उठ रही थी कि उन्हें नागरिकता का स्पष्ट दर्जा मिले और वोटिंग अधिकार सुनिश्चित हों। राज्य के फाइनल वोटर लिस्ट से लगभग 65 लाख नाम हटाए गए हैं, जबकि अधिक मात्रा में वोटरों के नाम पेंडिंग भी रखे गए है। चुनाव आयोग का कहना है कि जिनकी नागरिकता औपचारिक रूप से तय नहीं हुई है, उन्हें मतदाता सूची में शामिल करना संभव नहीं है।
वहीं, इन सब के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बंगाल दौरे पर हैं। इस दौरान उन्होंने CAA को लेकर मौजूदा सरकार पर जमकर हमला बोला और कहा, "ममता बनर्जी ने CAA का विरोध किया, अगर वे इसका विरोध न करती तो एक-एक बंग्लादेशी शरणार्थी को नागरिकता मिल गई होती।" साथ ही उन्होंने कहा, अब भी चिंता की कोई बात नहीं, भाजपा सरकार एक-एक बंग्लादेशी हिंदू शरणार्थी को नागरिकता देगी।
CAA और SIR का मुद्दा खासकर मतुआ समुदाय पर प्रभाव डाल रही है। चुनाव से ठीक पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से नागरिकता कानून को लेकर कमेटियों का विस्तार करना भाजपा के लिए एक अहम कदम माना जा रहा है। भाजपा का मानना है कि नागरिकता मिलने के बाद इन लोगों को मतदान का अधिकार भी मिलेगा, जिससे चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस CAA और SIR प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर लगातार सवाल उठा रही हैं। उनका आरोप है कि इन सब का उपयोग करके लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर किया जा रहा है।
इसी बीच भाजपा 'परिवर्तन यात्रा' के जरिए राज्य में जोरदार प्रचार अभियान शुरू कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत कई केंद्रीय नेता बंगाल का दौरा कर रहे हैं। भाजपा का फोकस खास तौर पर अनुसूचित जाति, जनजाति और सीमावर्ती इलाकों पर है, जहां मतुआ और अन्य समुदायों का प्रभाव है। राज्य में 84 विधानसभा सीटें SC/ST के लिए आरक्षित हैं, जो चुनावी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि CAA का मुद्दा बंगाल चुनाव में निर्णायक साबित हो सकता है। भाजपा इसे नागरिकता और अधिकार का सवाल बता रही है, जबकि तृणमूल इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण की रणनीति करार दे रही है। अब देखना यह होगा कि क्या CAA के जरिए भाजपा बंगाल में सत्ता परिवर्तन का रास्ता बना पाएगी, या यह मुद्दा उल्टा असर डालेगा।