पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही सियासी माहौल लगातार गरमाता जा रहा है। इसी बीच जनता उन्नयन पार्टी के संस्थापक हुमायूं कबीर ने बुधवार (11 फरवरी) को बेलडांगा में बाबरी मस्जिद के निर्माण की शुरुआत कर दी है। इसके बाद गुरुवार से उनकी 'बाबरी यात्रा' भी शुरू होने जा रही है। इस मौके पर करीब 1200 लोगों की आवाज में कुरान पढ़ी गई। हुमायूं कबीर का दावा है कि अगले दो साल के भीतर बेलडांगा में पूरी मस्जिद तैयार कर दी जाएगी। उन्होंने पहले ही 6 दिसंबर को मस्जिद की नींव रखी थी और 11 फरवरी से काम शुरू करने का वादा किया था।
निर्माण स्थल पर बड़ी संख्या में आम लोग ईंटे लेकर पहुंचे। सिर्फ पुरुष ही नहीं, बल्कि महिलाएं भी सिर पर ईंटें उठाकर मस्जिद के लिए दान करती नजर आईं। कुछ लोग पास के भट्टों से ईंटें खरीदकर ला रहे हैं, तो कुछ अपने गांवों से समान लेकर पहुंच रहे हैं। वहीं, कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि वे धार्मिक भावना के तहत निर्माण कार्य में सहयोग कर रहे हैं।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। हुमायूं कबीर ने खुला राजनीतिक बयान देते हुए कहा कि वे मुस्लिम वोटों को एकजुट कर भाजपा को सत्ता में आने से रोकेंगे। उन्होंने यहां तक दावा किया कि वे करीब 100 विधायकों के साथ विपक्ष की मजबूत ताकत बनेंगे।
उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी चुनौती देते हुए कहा कि अब उन्हें मुस्लिम वोट नहीं मिलेंगे। उन्होंने कहा, "मैं ममता बनर्जी को चैलेंज करता हूं, उन्हें अब मुसलमानों के वोट नहीं मिलेंगे। मैं मुसलमानों के वोट लेकर अपोज़िशन में रहूंगा। आप हिंदुओं के वोटों से 150 सीटों से सत्ता में आ सकते हैं। BJP को रोकने के लिए कौन पॉलिटिक्स कर रहा है? मैं BJP को सत्ता से बाहर रखने का वादा करता हूं।" कबीर के मुताबिक, वे मुस्लिम वोटों के सहारे भाजपा को रोकेंगे, जबकि तृणमूल कांग्रेस हिंदू वोटों के दम पर सत्ता में आने की कोशिश करेगी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बाबरी मस्जिद निर्माण चुनाव से पहले राज्य की मुस्लिम वोटों पर गहरा असर डालेगी और TMC की वोटिंग गणित को प्रभावित करेगी। खासकर मुर्शिदाबाद और आसपास के इलाकों में इसका असर देखने को मिल सकता है। क्योंकि यह मुस्लिम बहुल इलाका है।
कुल मिलाकर, बंगाल चुनाव से पहले धार्मिक भावनाएं, वोट बैंक की राजनीति और नेताओं के तीखे बयान राज्य की सियासत को और जटिल बना रहे हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि हुमायूं कबीर की यह पहल जमीन पर कितना असर डालती है।