ममआज जब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में स्टारकिड और नेपोटिज्म को लेकर बहस तेज है, ऐसे समय में अक्षय खन्ना की कहानी खुद-ब-खुद अलग चमकती है। एक मशहूर सरनेम के साथ इंडस्ट्री में कदम रखना जितना आसान माना जाता है, अक्षय के लिए उतना ही चुनौतीपूर्ण रहा। विनोद खन्ना जैसे दिग्गज अभिनेता के बेटे होने के बावजूद उन्होंने कभी इस पहचान को अपनी ताकत नहीं बनाया। न दिखावा, न शोर और न ही खुद को आगे बढ़ाने की होड़—अक्षय ने हमेशा अपने काम को बोलने दिया। उनकी यात्रा उन कलाकारों जैसी रही, जो कैमरे के सामने कम और किरदारों के अंदर ज्यादा जीते हैं।
भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय उन्होंने अपनी अलग राह चुनी, जहां सफलता का पैमाना बॉक्स ऑफिस नहीं बल्कि अभिनय की गहराई थी। यही वजह है कि अक्षय खन्ना का सफर आज भी प्रेरणा देता है और उनकी वापसी हर बार खास बन जाती है।
फॉर्मूला हीरो नहीं, किरदारों के अभिनेता
अक्षय खन्ना कभी भी पारंपरिक हीरो की छवि में फिट नहीं बैठे। न रोमांटिक हीरो बनने की होड़, न एक्शन स्टार का दिखावा। उन्होंने हमेशा जटिल, ग्रे शेड और चुनौतीपूर्ण किरदारों को चुना। यही वजह है कि उनकी फिल्में भले ही कम हों, लेकिन उनके किरदार दर्शकों के दिल-दिमाग में लंबे समय तक बसे रहते हैं।
‘दिल चाहता है’ और ‘हंगामा’ जैसी फिल्मों से पहचान बनाने के बावजूद अक्षय को लंबे वक्त तक वो मौके नहीं मिले, जिनके वो हकदार थे। इसके बावजूद उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। न तगड़ा पीआर, न सोशल मीडिया का शोर—बस काम, धैर्य और सही समय का इंतजार।
‘छावा’ और ‘धुरंधर’ से दमदार वापसी
अब वक्त ने करवट ली है और अक्षय खन्ना फिर चर्चा के केंद्र में हैं। ‘छावा’ और ‘धुरंधर’ ने साबित कर दिया कि अनुभव और अभिनय की गहराई क्या होती है। खासकर ‘धुरंधर’ में रहमान डकैत के रूप में उनकी मौजूदगी बिना ज्यादा संवादों के भी दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ती है।
2025 बना अक्षय खन्ना का साल
करीब तीन दशक के करियर के बाद अक्षय खन्ना ने साबित कर दिया है कि स्टारडम से ज्यादा टिकाऊ होती है प्रतिभा। साल 2025 उनके लिए सुनहरा साबित हुआ। ‘छावा’ ने साल की शुरुआत में रिकॉर्ड बनाए, वहीं साल के अंत में आई ‘धुरंधर’ इतिहास रच रही है। इस साल अगर कोई अभिनेता सबसे ज्यादा सफल और कमाऊ फिल्मों का चेहरा बना है, तो वह अक्षय खन्ना ही हैं।