भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर (1950 के दशक) में जब भी खूबसूरती और बेहतरीन अदाकारी की बात होती है, तो एक नाम प्रमुखता से उभरता है निम्मी। आज के दौर में शायद कम ही लोग जानते हों, लेकिन एक दौर ऐसा था जब निम्मी की लोकप्रियता बड़ी-बड़ी हीरोइनों से कहीं ज्यादा थी। हाल ही में उनके फिल्मी सफर की कुछ ऐसी बातें सामने आई हैं, जो आज के सितारों के लिए किसी मिसाल से कम नहीं हैं।
राज कपूर की खोज और 'बरसात' का जादू
निम्मी का असली नाम नवाब बानो था। उन्हें फिल्मी दुनिया में लाने का श्रेय 'शोमैन' राज कपूर को जाता है। किस्सा यह है कि निम्मी फिल्म 'अंदाज' के सेट पर अपनी मौसी ज्योति के साथ गई थीं। वहां राज कपूर की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने 1949 की फिल्म 'बरसात' के लिए उन्हें साइन कर लिया। 'बरसात' में वह लीड एक्ट्रेस नहीं थीं, लेकिन फिल्म के गाने और उनकी मासूमियत ने उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया।
50 के दशक में निम्मी का जादू ऐसा था कि वह जिस फिल्म में सेकंड लीड या सपोर्टिंग रोल में होती थीं, उसकी चर्चा मुख्य हीरोइन से ज्यादा होने लगती थी। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि कई बार फिल्म के निर्देशक उनके सीन बढ़ाने के लिए मजबूर हो जाते थे। फिल्म 'आन' (1952) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कहा जाता है कि फिल्म में निम्मी के किरदार को लोगों ने इतना प्यार दिया कि अंत में उनके सीन और एक गाना अलग से जोड़ा गया ताकि फिल्म को जबरदस्त रिस्पॉन्स मिले।
हॉलीवुड का ऑफर और निम्मी का इनकार
निम्मी केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में थीं। उनकी फिल्म 'आन' का प्रीमियर लंदन में हुआ था, जहां दुनिया भर के दिग्गज मौजूद थे। इसी दौरान उन्हें हॉलीवुड से फिल्मों के बड़े ऑफर मिले। उस दौर में जहां किसी भी कलाकार के लिए हॉलीवुड जाना एक सपना होता था, निम्मी ने भारतीय संस्कृति और अपनी पसंद को तवज्जो देते हुए उन ऑफर्स को ठुकरा दिया। निम्मी का मानना था कि उनके लिए अपनी माटी की फिल्में और यहां के दर्शक ज्यादा मायने रखते हैं।
फिल्म जगत में एक अमिट पहचान
निम्मी ने उस दौर के सभी बड़े सितारों दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद के साथ काम किया। उनकी प्रमुख फिल्मों में 'उड़न खटोला', 'दीदार', 'सजा' और 'आकाशदीप' जैसी कई हिट फिल्में शामिल हैं। वह एक ऐसी अभिनेत्री थीं जिन्होंने कभी ग्लैमर के पीछे भागने के बजाय किरदारों की गहराई को चुना। आज भले ही निम्मी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा के पन्नों पर उनकी मुस्कान और 'बरसात' की वो मासूमियत हमेशा जिंदा रहेगी। वह सही मायनों में एक ऐसी एक्ट्रेस थीं, जिन्होंने अपनी शर्तों पर जी कर दिखाया कि सफलता केवल स्क्रीन टाइम की मोहताज नहीं होती।