Director Suparn Varma: फिल्म 'हक' के निर्देशक सुपन वर्मा ने एक पैनल चर्चा के दौरान आज के सिनेमाई जगत में फिल्म बनाने की बदलती चुनौतियों पर बात की। चर्चा का केंद्र बिंदु दर्शकों की बदलती अपेक्षाएं, फिल्मों में हिंसा को दिखाना और क्रिएटिव फ्रीडम के साथ आने वाली जिम्मेदारियां थीं। निर्देशक सुपन वर्मा ने हिंदी फिल्म दर्शकों की बदलती पसंद के बारे में विस्तार से बताया और इस बात पर जोर दिया कि वे किस तरह पहले से कहीं अधिक टफ हो गए हैं।
ज़ूम पर बातचीत में, सुपन वर्मा ने नीरज घायवान, अनुराग बसु, आरती कादव और रीमा कागती के साथ नजर आए। फ़िल्म निर्माण के दौरान आने वाली परेशानियों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि हिंदी फ़िल्मों के दर्शक, विशेष रूप से हिंदी फ़िल्मों के प्रति, बहुत अधिक टफ हो गए हैं। हिंदी में बनी 'लोका' जैसी फ़िल्म को स्वीकार नहीं किया जाएगा। कई ऐसे विचार होते हैं जिन पर चर्चा करते समय आपको अचानक एहसास होता है कि उन्हें तेलुगु या मलयालम फ़िल्म के रूप में तो बनाया जा सकता है, लेकिन हिंदी फ़िल्म के रूप में नहीं।”
निर्देशक ने सिनेमाघरों में दर्शकों की कम प्रसेंस पर भी अपनी राय व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उन्हें फिल्मों से ज़्यादा फिल्म निर्माताओं की चिंता है। उन्होंने आगे कहा, “केवल 25 फीसद फिल्में ही देखी जा रही हैं। हम उनके लिए फिल्में नहीं बना रहे हैं क्योंकि बाकी लोग उन्हें देख नहीं सकते। फिल्म की लागत परिवार के लिए 5 रुपये से भी ज़्यादा होगी। कम आय वाले परिवार के लिए 25 रुपये तो दूर की बात है। मुझे नहीं लगता कि भारत की 80 से 85 पीसद आबादी फिल्में नहीं देख रही है। जब तक कि वह किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर न हो।”
सुपर्ण वर्मा हाल ही में 'द फैमिली मैन' के तीसरे सीज़न में नज़र आए थे। इससे पहले, उन्होंने यामी गौतम अभिनीत राजनीतिक थ्रिलर 'हक' का निर्देशन और सह-निर्माण किया था। वर्मा ने सोनीलिव के लिए 'लूटेरे' (2024) की पटकथा भी लिखी और नेटफ्लिक्स के लिए 'राणा नायडू' (2023) का सह-निर्देशन किया।
उन्होंने डिज़्नी+ हॉटस्टार के लिए 'द ट्रायल' (2023) का निर्माण और निर्देशन किया तथा ज़ी5 के लिए 'सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है' (2023) का निर्माण किया। उनकी योजना 'कुर्बानी' के रीमेक का निर्देशन करने और 'फ्लेम्स' (2025) का निर्माण करने की है, जिसका हाल ही में जोगजा-नेटपैक एशियन फिल्म फेस्टिवल में प्रीमियर हुआ था।