नीरज घायवान की 'होमबाउंड' बॉलीवुड की उन रेयर फिल्मों में शुमार है, जो दिल को छू लेती है और समाज के आईने में झांकने पर मजबूर कर देती है। यह फिल्म दो गहरे दोस्तों चंदन (विशाल जेठवा) और शोएब (इशान खट्टर) की कहानी बुनती है, जो उत्तर भारत के एक छोटे से गांव देवरी से निकलकर अपनी जिंदगी को पटरी पर लाने का सपना देखते हैं। पुलिस जॉब पाने की तैयारी में जुटे ये दोनों, जाति-पात और धर्म के भेदभाव से जूझते हुए भी एक-दूसरे का हाथ थामे रहते हैं।
फिल्म की शुरुआत इनके बचपन से होती है, जहां नदी किनारे बैठे दोनों सपनों की उड़ान भरते हैं। चंदन दलित बैकग्राउंड से ताल्लुक रखता है, जो सरनेम छिपाकर नौकरी तलाशता है, तो शोएब मुस्लिम होने की वजह से जॉब में मुश्किलें झेलता है। कॉलेज में चंदन की मुलाकात सुधा (जान्हवी कपूर) से होती है, जो प्यार की एक कोमल कड़ी जोड़ती है। लेकिन एंट्रेंस एग्जाम के रिजल्ट का इंतजार लंबा खिंचता है, और बीच में देशव्यापी लॉकडाउन की मार पड़ती है।
फिल्म की बात करें तो क्लाइमेक्स में दोनों गांव लौटने के सफर पर निकलते हैं। भीड़भाड़ वाले ट्रक में चंदन को बुखार चढ़ जाता है। साथी यात्री उसे कोविड का मरीज समझकर बाहर निकाल देते हैं। हाईवे किनारे शोएब अपनी गोद में चंदन को लिये जान बचाने की जद्दोजहद करता है, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। चंदन की मौत के बाद शोएब उसका शव गांव ले जाता है और मां को चंदन का आखिरी गिफ्ट-चप्पल सौंपता है। बाद में चंदन का अपॉइंटमेंट लेटर आता है जिसमें चंदन क्वालीफाई कर जाता है।
फिल्म में ईशान खट्टर, जान्हवी कपूर और विशाल जेठवा ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं। जान्हवी कपूर ने अपने किरदार में मासूमियत और दृढ़ता का ऐसा मेल दिखाया कि उन्हें बेस्ट एक्टर ऑफ द ईयर (फीमेल) का अवॉर्ड भी मिला। वहीं ईशान और विशाल ने दोस्ती और संघर्ष की भावनाओं को बखूबी जीवंत किया।
'होमबाउंड' सिर्फ ट्रेजेडी नहीं, बल्कि दोस्ती की मिसाल है। घायवान ने जातिवाद, इस्लामोफोबिया जैसे मुद्दों को बखूबी उकेरा है, बिना उपदेश दिए। विशाल और इशान का अभिनय कमाल का है। आंखों से ही भाव उभरते हैं। 119 मिनट की यह फिल्म भारत की 2026 ऑस्कर एंट्री है, जो थिएटर्स में रोने पर मजबूर कर देती है।
नीरज घायवान ने इस कहानी को बेहद संवेदनशीलता और गहराई से परदे पर उतारा है। फिल्म में इमोशन और रियलिज्म का ऐसा संगम है कि दर्शक खुद को किरदारों के साथ उसी सफर में महसूस करते हैं। सिनेमैटोग्राफी में सन्नाटा, खाली सड़कें और थके हुए चेहरे दोस्ती की ताकत को और भी उजागर करते हैं।