बॉलीवुड की मशहूर और शानदार गायिका श्रेया घोषाल ने हाल ही में एक इंटरव्यू में अपने करियर और लाइव परफॉर्मेंस के प्रति अपनी गहरी भावना साझा की। उन्होंने बताया कि स्टेज पर लाइव गाना उनके लिए सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि उनका जुनून और पहचान है। उन्होंने साफ कहा कि वह कभी भी लिप-सिंकिंग पर निर्भर नहीं रहेंगी और अगर किसी वजह से ऐसा करना पड़े, तो वह गाना छोड़ देंगी। यह स्पष्ट करती है कि उनके लिए संगीत केवल शो के लिए नहीं, बल्कि आत्मा का हिस्सा है। 5 बार की राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता श्रेया ने कहा कि लाइव स्टेज पर परफॉर्म करना उनके दिल और रियाज की मेहनत का सबसे बड़ा फल है।
उनका मानना है कि दर्शकों से मिलने वाला प्यार और तालियों की गूँज ही उन्हें हर बार स्टेज पर नई ऊर्जा देती है। श्रेया का यह दृष्टिकोण उन्हें न केवल एक कलाकार बल्कि एक आदर्श गायिका के रूप में स्थापित करता है, जो अपनी कला में ईमानदार और लगनशील हैं।
ब्रेक लेने की इच्छा और अरिजीत सिंह की तारीफ
श्रेया ने अरिजीत सिंह के प्लेबैक सिंगिंग से ब्रेक लेने के फैसले को बहादुरी भरा कदम बताया। उन्होंने कहा कि कभी-कभी उनका भी मन ब्रेक लेने का करता है। श्रेया ने बताया कि अरिजीत संगीत के प्रति इतने ईमानदार हैं कि उनकी गहरी कनेक्शन ही उन्हें फैंस के बीच खास बनाती है।
श्रेया ने कलाकारों को चेताया कि स्टेज पर अपनी निजी मुश्किलों को दिखाना उचित नहीं। दर्शक संगीत और सुकून पाने आते हैं। उन्होंने कहा, "जब दिल खुश होता है, तो ऊर्जा अपने आप आती है। तालियों और दर्शकों की प्रतिक्रिया मेरी प्रेरणा है।"
प्रारंभिक जीवन और संगीत यात्रा
श्रेया घोषाल का जन्म 12 मार्च 1984 को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हुआ। चार साल की उम्र से ही उन्होंने संगीत सीखना शुरू किया। छह साल की उम्र में शास्त्रीय संगीत की ट्रेनिंग मिली। 16 साल की उम्र में सारेगामा जीतने के बाद, उन्हें संजय लीला भंसाली ने फिल्म देवदास में 'बैरी पिया' गाने का मौका दिया और इसके लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड मिला।
श्रेया ने अपने बचपन के दोस्त शिलादित्य मुखोपाध्याय से 5 फरवरी 2015 को शादी की। उनके एक बेटा है, देवयान, जिनका जन्म 22 मई 2021 को हुआ।
श्रेया ने अब तक 3000 से अधिक गाने गाए हैं, जिनमें हिंदी, बंगाली, कन्नड़, तेलुगू, तमिल, मलयालम, भोजपुरी, मराठी समेत कई भाषाएं शामिल हैं। वह कई रियलिटी शो की जज भी रह चुकी हैं।
श्रेया को ‘श्रेया घोषाल दिवस’ के रूप में अमेरिका के ओहियो में सम्मानित किया गया। 2017 में दिल्ली के मैडम तुसाद म्यूजियम में उनकी मोम की प्रतिमा लगाई गई।