आजकल ‘साड़ी कैंसर’ शब्द ने लोगों के बीच एक अजीब सा डर पैदा कर दिया है, खासकर महिलाओं में। साड़ी जो भारतीय जीवनशैली, परंपरा और रोजमर्रा की पहचान का हिस्सा है, उसी को लेकर भ्रम फैलना स्वाभाविक है। कई महिलाएं सोचने लगती हैं कि क्या उनका रोज साड़ी पहनना कहीं उनकी सेहत के लिए खतरा तो नहीं बन रहा। लेकिन सच्चाई इससे अलग है। डॉक्टरों के अनुसार, समस्या साड़ी पहनने में नहीं, बल्कि उसे लंबे समय तक एक ही जगह पर बहुत कसकर बांधने की आदत में है।
बदलती लाइफस्टाइल और अनजाने में की जाने वाली छोटी गलतियां धीरे-धीरे शरीर पर असर डाल सकती हैं। ऐसे में जरूरी है कि डरने के बजाय सही जानकारी पर ध्यान दिया जाए और अपने पहनावे में छोटे-छोटे बदलाव करके खुद को सुरक्षित रखा जाए।
आखिर क्या होता है ‘साड़ी कैंसर’?
ये कोई आधिकारिक मेडिकल नाम नहीं है। डॉक्टर इसे स्किन कैंसर के एक दुर्लभ रूप—क्यूटेनियस स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा—से जोड़ते हैं। ये आमतौर पर कमर के उस हिस्से में होता है, जहां लंबे समय तक कपड़ा कसकर बांधा जाता है।
साड़ी नहीं, आदतें बनती हैं वजह
असल समस्या साड़ी नहीं, बल्कि उसे बहुत टाइट बांधने की आदत है। सालों तक एक ही जगह पर दबाव और रगड़ पड़ने से त्वचा में बदलाव आने लगते हैं, जो धीरे-धीरे सूजन का रूप ले सकते हैं।
धीरे-धीरे बढ़ती है समस्या
न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुधीर कुमार का कहना है कि ये बीमारी अचानक नहीं होती। शुरुआत में खुजली, काला पड़ना या त्वचा का मोटा होना जैसे छोटे संकेत मिलते हैं। अगर इन्हें नजरअंदाज किया जाए, तो लंबे समय में यह गंभीर रूप ले सकते हैं।
क्यों नजरअंदाज हो जाते हैं लक्षण?
क्योंकि शुरुआत के लक्षण सामान्य लगते हैं, लोग उन्हें गंभीरता से नहीं लेते। अक्सर डॉक्टर के पास तब पहुंचते हैं जब घाव ठीक नहीं होता या दर्द शुरू हो जाता है।
इससे बचना मुश्किल नहीं है। बस साड़ी या पेटीकोट को ज्यादा टाइट न बांधें, गांठ की जगह बदलते रहें और साफ-सफाई का ध्यान रखें। छोटी-सी सावधानी बड़ी परेशानी से बचा सकती है।
अगर समय रहते पता चल जाए, तो इसका इलाज सामान्य स्किन कैंसर की तरह किया जाता है। सर्जरी या रेडिएशन से इसे कंट्रोल किया जा सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सिर्फ सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी तरह से किसी दवा या इलाज का विकल्प नहीं हो सकता। ज्यादा जानकारी के लिए हमेशा अपने डॉक्टर से संपर्क करें।