बांदा में टेंप्रेचर 48°C पार, दुनिया की सबसे गर्म टॉप 100 जगहों में 97 भारत से! गंगा के मैदान सहारा रेगिस्तान से भी ज्यादा गर्म क्यों?

Banda Heatwave: एक कृषि प्रधान मैदानी इलाका दुनिया के सबसे विशाल रेतीले रेगिस्तान को भी गर्मी में कैसे पछाड़ सकता है, इसका मुख्य कारण प्राकृतिक शीतलन तंत्र (Natural Cooling Mechanisms) का पूरी तरह से गायब होना है। आमतौर पर उत्तरी और मध्य भारत गर्मियों के दौरान पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) नामक एक मौसमी प्रणाली पर निर्भर रहते हैं

अपडेटेड May 22, 2026 पर 6:17 PM
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तपते उत्तर भारत और हीटवेव को लेकर लगातार जारी हो रहे रेड अलर्ट जारी किया गया है।

तपते उत्तर भारत और हीटवेव को लेकर लगातार जारी हो रहे रेड अलर्ट, ऑरेंज अलर्ट ने लोगों का हलकान कर रखा है। इस बीच भारत से एक ऐसा डाटा सामने आया है जिसने वैज्ञानिकों को भी चौंका दिया है। शुक्रवार दोपहर रियल-टाइम ग्लोबल वेदर ट्रैकिंग मेट्रिक्स (वैश्विक मौसम ट्रैकिंग आंकड़ों) से एक चौंकाने वाला डाटा जारी हुआ। इसके मुताबिक दुनिया की 100 सबसे गर्म जगहों में से रिकॉर्ड 97 जगहें अकेले भारत में दर्ज की गईं।

हमारे सहयोगी न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताहिक वैश्विक मौसम के ढर्रे में आए इस अजीबोगरीब बदलाव के कारण भारत के गंगा के मैदानी इलाके और मध्य भारत के क्षेत्रीय केंद्र पारंपरिक रेगिस्तानी हॉटस्पॉट्स की तुलना में काफी अधिक तापमान दर्ज कर रहे हैं। जब दुनिया के सबसे मशहूर और सबसे गर्म माने जाने वाले रियाद, टिम्बकटू और डेथ वैली जैसे इलाके भारत के कुछ इलाकों के मुकाबले तुलनात्मक रूप से ठंडे बने हुए हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के बांदा और ओडिशा के बलांगीर जैसे शहर बार-बार 48 डिग्री सेल्सियस (°C) के खौफनाक आंकड़े को पार कर रहे हैं।

आखिरकार भारत में इस स्तर पर पड़ रही भीषण और ऐतिहासिक गर्मी के पीछे क्या वजह है? क्यों कृषि प्रधान मैदानी इलाके दुनिया के सबसे बड़े रेतीले रेगिस्तानों से भी ज्यादा उबल रहे हैं? मौसम और पर्यावरण विशेषज्ञों के विश्लेषण के आधार पर आइए इसके पीछे की वजह को समझते हैं-


क्या है इस रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के पीछे का हीट डोम?

देशभर को भट्टी की तरह झुलसाने के पीछे तात्कालिक रूप से एक बहुत बड़ा और स्थिर वायुमंडलीय वेदर सिस्टम जिम्मेदार है। इसे हीट डोम कहा जाता है। इस सिस्टम के तहत उपमहाद्वीप के ऊपर एक विशाल हाई-प्रेशर (उच्च दबाव) सिस्टम फंस गया है। यह एक स्टेशनरी प्लेनेट्री लिड की तरह काम कर रहा है। वैज्ञानिक तौर पर जब भी गर्म हवा ऊपर उठने की कोशिश करती है तो ऊपर मौजूद यह हाई-प्रेशर सिस्टम उसे वापस नीचे जमीन की तरफ धकेल देता है। हवा के इस तरह नीचे की ओर दबने के कारण हवा का द्रव्यमान कंप्रेस हो जाता है और बहुत भारी मात्रा में संचयी गर्मी (Cumulative Heat) पैदा होती है।

इस थर्मल कम्प्रेशन को पश्चिमी शुष्क सीमाओं से आने वाली बेहद सूखी और झुलसाने वाली उत्तर-पश्चिमी हवाएं लगातार फ्यूल देने का काम कर रही हैं। यह पूरा वेदर सिस्टम पूरी तरह से स्थिर (Static) है, इसलिए यह समुद्र की ठंडी हवाओं या बादलों को देश के अंदरूनी हिस्सों में प्रवेश करने से पूरी तरह रोक रहा है। इसी रुकावट के कारण बढ़ती बेसलाइन टेंप्रेचर के लिए सेल्फ सस्टेनिंग साइकिल बना दे रहा है।

सहारा रेगिस्तान से भी ज्यादा गर्म क्यों हो गए गंगा के मैदान?

एक कृषि प्रधान मैदानी इलाका दुनिया के सबसे विशाल रेतीले रेगिस्तान को भी गर्मी में कैसे पछाड़ सकता है, इसका मुख्य कारण प्राकृतिक शीतलन तंत्र (Natural Cooling Mechanisms) का पूरी तरह से गायब होना है। आमतौर पर उत्तरी और मध्य भारत गर्मियों के दौरान पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) नामक एक मौसमी प्रणाली पर निर्भर रहते हैं। भूमध्य सागर से आने वाले ये उपोष्णकटिबंधीय तूफान अपने साथ अस्थाई रूप से बादलों की चादर, नमी और मानसून-पूर्व धूल भरी आंधियां लाते हैं, जो गर्मियों के दौरान लगातार बढ़ रहे तापमान पर ब्रेक लगाने का काम करते हैं।

साल 2026 में इस पश्चिमी विक्षोभ में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। नमी के इस बफर के बिना, सीधे तौर पर exposed मैदानी इलाकों से टकराने वाले सौर विकिरणका असर शत-प्रतिशत और अत्यंत घातक हो गया है। गहरे रेगिस्तान की रेत की यह खासियत होती है कि सूरज ढलने के बाद वह बहुत तेजी से गर्मी को वापस अंतरिक्ष में उत्सर्जित कर देती है और रातें ठंडी हो जाती हैं, लेकिन भारत के अत्यधिक कंक्रीट वाले शहरी केंद्र और सूखे कृषि क्षेत्र इस थर्मल एनर्जी (गर्मी) को सोखकर अपने अंदर ही रोक लेते हैं। रात के समय भी गर्मी के इसी रिटेंशन की वजह से रातें ठंडी नहीं हो पा रही हैं और भयंकर वॉर्म नाइट के अलर्ट जारी हो रहे हैं।

इंसानी गतिविधियों ने शहरों को बनाया हीट आइलैंड

क्षेत्रीय मौसम संबंधी कारणों के अलावा, स्थानीय स्तर पर पर्यावरण के साथ की गई अंधाधुंध छेड़छाड़ और गिरावट ने बांदा और बलांगीर जैसे शहरों को हाइपर-लोकलाइज्ड हीट आइलैंड में बदल दिया है। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित बांदा में दशकों से बड़े पैमाने पर जमीन का अत्यधिक दोहन, नदियों के तल से आक्रामक रूप से बालू का अवैध खनन और स्थानीय हरित आवरण (ग्रीन कवर) का बड़े पैमाने पर विनाश हुआ है। बांदा जैसी जगहों पर तो ग्रीन कवर घटकर महज तीन प्रतिशत (3%) के नाजुक स्तर पर पहुंच गया है। इसने जमीन के अलबेडो (Surface Albedo - सौर ऊर्जा को परावर्तित करने की क्षमता) को मौलिक रूप से बदल दिया है।

नदियों के पूरी तरह सूखने और पथरीले इलाकों के पूरी तरह से खुले होने के कारण अब जमीन में बिल्कुल भी नमी नहीं बची है जो इवैपोरेटिव कूलिंग की प्रक्रिया को सुचारू बना सके। इसका नतीजा यह हो रहा है कि बंजर हो चुकी यह जमीन अधिकतम सौर विकिरण को सोखती है और उसे सीधे निचले वायुमंडल में वापस परावर्तित कर देती है। जब ये सारे स्थानीय विनाशकारी कारक एक तीव्र अल नीनो पैटर्न के साथ मिल जाते हैं, तो पर्यावरण का पूरा सुरक्षा ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है। यही वजह है कि आज करोड़ों लोग इस तरह के जलवायु संकट के बीच जीने को मजबूर हैं।

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