करीब 20 साल के बाद बिहार की राजनीति में बड़ा परिवर्तन होने जा रहा है। पिछले दो दशक से बिहार में सत्ता के केंद्र रहे नीतीश कुमार की राजनीति अब सिमटी दिख रही है। नीतीश कुमार, पटना छोड़ दिल्ली का रुख किया है। उनकी आगे की राजनीति राज्यसभा सांसद के रूप में जारी रहेगी। वहीं नीतीश कुमार के बाद बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? ये सवाल फिलहाल बिहार की राजनीति में यक्ष प्रश्न बना हुआ है। वहीं सूबे में जारी इस राजनीतिक उथल पुथल के बीच बि्हार सीएम की रेस में कौन-कौन नाम आगे है...आइए जानते हैं।
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने सोमवार को कहा कि बिहार में पार्टी के 'पहले मुख्यमंत्री' का नाम मंगलवार को घोषित किया जा सकता है। इसके लिए केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के पटना आने की संभावना है। शिवराज सिंह चौहान को भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली मुख्यालय ने रविवार को विधायक दल के नए नेता के चुनाव के लिए केंद्रीय पर्यवेक्षक बनाया है। वह उसी दिन बिहार पहुंच सकते हैं, जब नीतीश कुमार के इस्तीफा देने की उम्मीद जताई जा रही है। 75 साल के नीतीश कुमार एक हफ्ते पहले ही राज्यसभा सांसद बने हैं। जानकारी के मुताबिक, नीतीश कुमार 14 अप्रैल को सुबह 11 बजे होने वाली अपनी आखिरी कैबिनेट बैठक के बाद राजभवन जाकर इस्तीफा दे सकते हैं। माना जा रहा है कि इसी बैठक में वह पद छोड़ने का औपचारिक ऐलान भी कर सकते हैं।
भारतीय जनता पार्टी की बिहार इकाई के अध्यक्ष संजय सरावगी ने पत्रकारों से कहा कि, शिवराज सिंह चौहान मंगलवार को पटना आएंगे और उनकी मौजूदगी में बीजेपी विधायक अपने नेता का चुनाव करेंगे। वहीं दिलीप जायसवाल ने कहा कि, यह उनके लिए एक भावुक पल है। उन्होंने उम्मीद जताई कि नीतीश कुमार नई सरकार को आगे भी मार्गदर्शन देते रहेंगे। 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पास 202 सीटों के साथ मजबूत बहुमत है। इनमें सबसे ज्यादा 89 सीटें बीजेपी के पास हैं, जबकि जनता दल (यूनाइटेड) के पास 85 सीटें हैं। बाकी सीटें सहयोगी दलों—एलजेपी (रामविलास), हम और आरएलएम के पास हैं।
सीएम पद की रेस में सम्राट चौधरी सबसे आगे
वहीं दिलीप जायसवाल से मुख्यमंत्री पद के संभावित नामों के बारे में पूछा, तो उन्होंने सीधा जवाब देने से बचते हुए कहा कि यह फैसला विधायक दल का सामूहिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि अभी किसी तरह का अनुमान लगाना ठीक नहीं है और शिवराज सिंह चौहान के आने के बाद ही स्थिति साफ होगी। न तो संजय सरावगी और न ही दिलीप जायसवाल ने शपथ ग्रहण समारोह की तारीख पर कुछ कहा, लेकिन चर्चा है कि यह कार्यक्रम 14 अप्रैल को हो सकता है। साथ ही, यह भी माना जा रहा है कि पीएम नरेंद्र मोदी इस मौके पर शामिल हो सकते हैं।
इस बीच, सम्राट चौधरी का नाम मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे बताया जा रहा है। वह इस समय उपमुख्यमंत्री हैं और उनके पास गृह मंत्रालय जैसे अहम विभाग की जिम्मेदारी भी है। उनके बारे में अमित शाह ने पहले कहा था कि उन्हें “बड़ा नेता” बनाया जाएगा। हालांकि, कुछ लोग सम्राट चौधरी की आलोचना भी करते हैं। उनका कहना है कि वह लंबे समय तक राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (यूनाइटेड) में रहे हैं, इसलिए उन्हें संघ परिवार का पुराना और मजबूत नेता नहीं माना जाता।
नित्यानंद राय का नाम भी नाम भी है शामिल
कुछ नेताओं का कहना है कि सम्राट चौधरी पहले ही विधायक दल के नेता चुने जा चुके हैं, क्योंकि उन्हें नवंबर में इस पद पर नियुक्त किया गया था। ऐसे में अगर फिर से चुनाव होता है, तो यह संकेत हो सकता है कि भारतीय जनता पार्टी अब दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर रही है। इसी बीच, एक और नाम चर्चा में है—नित्यानंद राय। वह केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हैं और उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1980 के दशक में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के रूप में की थी, जब राम जन्मभूमि आंदोलन चल रहा था। साल 2019 में केंद्रीय मंत्री बनने से पहले वह बिहार बीजेपी के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। बीजेपी से जुड़े सूत्रों का मानना है कि नया मुख्यमंत्री संभवतः पिछड़ा वर्ग (OBC) या दलित समुदाय से हो सकता है। पार्टी को अपने सवर्ण वोट बैंक पर भरोसा है, लेकिन बिहार में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए उसे अन्य समुदायों में भी समर्थन बढ़ाना जरूरी है। बिहार की राजनीति पर 1990 के दशक के मंडल आंदोलन का गहरा असर रहा है, जिसने सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को काफी हद तक बदल दिया था।
निशांत कुमार की भूमिका पर भी सबकी नजरें
इस बीच, सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आगे नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की भूमिका क्या होगी। निशांत ने हाल ही में जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल होने का फैसला लिया है।
पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि 44 साल के निशांत को नए मंत्रिमंडल में उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, हालांकि वह अभी तक विधायक नहीं हैं। वहीं, कुछ अन्य नेताओं का कहना है कि नीतीश कुमार चाहते हैं कि उनका बेटा पहले अपनी पहचान खुद बनाए और फिर बड़े पद की जिम्मेदारी संभाले। बताया जा रहा है कि नीतीश कुमार ने पार्टी कार्यकर्ताओं के दबाव में आकर ही निशांत के राजनीति में आने को मंजूरी दी थी।