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561 वर्ष पुरानी सैन्य इकाई: तनोट माता की रक्षा से 1971 की निर्णायक जीत तक 13 ग्रेनेडियर्स का गौरवशाली इतिहास

1965 के भारत-पाक युद्ध में इस बटालियन ने तनोट माता मंदिर की रक्षा करते हुए सांचू और साधेवाला की महत्वपूर्ण चौकियां कब्जे में लीं। 1971 के युद्ध में बटालियन ने पाकिस्तान के करीब 300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर रणहाल और बिजनोट जैसे महत्वपूर्ण स्थान अपने नियंत्रण में लिए

Amitabh Sinhaअपडेटेड Oct 05, 2026 पर 12:34 AM
561 वर्ष पुरानी सैन्य इकाई: तनोट माता की रक्षा से 1971 की निर्णायक जीत तक 13 ग्रेनेडियर्स का गौरवशाली इतिहास
इस अवसर पर सैनिक कल्याण मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को बटालियन द्वारा विशेष रूप से आमंत्रित किया गया

3 अक्टूबर को जशपुर में 13 ग्रेनेडियर्स ‘गंगा जैसलमेर रीसाला’ ने अपने गौरवशाली इतिहास को याद किया। 1465 से चली आ रही 561 वर्ष पुरानी यह सैन्य इकाई भारतीय सेना की सबसे पुरानी और अनुभवी सैन्य टुकड़ियों में से एक है। इसके सैनिकों में बड़ी संख्या राजस्थान के सीकर, झुंझुनू और नागौर जिलों से आती है। इस सैन्य इकाई की शुरुआत ऊंटों पर सवार होकर रेगिस्तानी युद्ध लड़ने वाली टुकड़ी के रूप में हुई थी। समय के साथ इसका स्वरूप बदला और आज यह भारतीय सेना की एक सशक्त स्टैंडर्ड इन्फेंट्री बटालियन के रूप में सेवा दे रही है।

1965 के भारत-पाक युद्ध में इस बटालियन ने तनोट माता मंदिर की रक्षा करते हुए सांचू और साधेवाला की महत्वपूर्ण चौकियां कब्जे में लीं। 1971 के युद्ध में बटालियन ने पाकिस्तान के करीब 300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर रणहाल और बिजनोट जैसे महत्वपूर्ण स्थान अपने नियंत्रण में लिए।

इस अवसर पर सैनिक कल्याण मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को बटालियन द्वारा विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। राठौड़ का इस बटालियन से पारिवारिक जुड़ाव भी रहा है—उनकी तीन पीढ़ियों ने इस गौरवशाली रीसाले में सेवा दी है, प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों तक। कर्नल राठौड़ ने बटालियन के शौर्य, परंपरा और बलिदान को नमन करते हुए कहा कि ऐसी सैन्य विरासत केवल इतिहास नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।

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