India-EU Trade Deal: 10 साल से चल रही थी बातचीत, अब जाकर हुई 'मदर ऑफ ऑल डील्स', भारत को होगा जबरदस्त फायदा!
भारत और 27 देशों वाले यूरोपीय संघ को मिलाकर दुनिया की करीब 25% अर्थव्यवस्था और लगभग दो अरब लोगों का बाजार बनता है। भारत और EU के बीच सामानों का व्यापार पहले ही 136 अरब डॉलर से ज्यादा का हो चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह नया समझौता व्यापार को और बढ़ाएगा, लागत घटाएगा और भारत को एक मजबूत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट हब बनाएगा
India-EU Trade Deal: 10 साल से चल रही थी बातचीत, अब जाकर हुई 'मदर ऑफ ऑल डील्स' (PHOTO- AI)
लगभग दो दशकों तक रुक-रुक कर चली बातचीत के बाद, भारत और यूरोपीय संघ ने आखिरकार एक महत्वाकांक्षी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर बातचीत पूरी कर ली है, जिसे "मदर ऑफ ऑल डील्स" कहा जा रहा है। लंबी चर्चा और आखिरी समय में हुए समझौतों के बाद यह डील तय हुई है। इससे दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार पर बड़ा असर पड़ने की उम्मीद है।
भारत और 27 देशों वाले यूरोपीय संघ को मिलाकर दुनिया की करीब 25% अर्थव्यवस्था और लगभग दो अरब लोगों का बाजार बनता है। भारत और EU के बीच सामानों का व्यापार पहले ही 136 अरब डॉलर से ज्यादा का हो चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह नया समझौता व्यापार को और बढ़ाएगा, लागत घटाएगा और भारत को एक मजबूत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट हब बनाएगा।
भारत के व्यापार सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा, “यह EU के साथ बेहतर आर्थिक जुड़ाव के लिए एक संतुलित और भविष्य को ध्यान में रखने वाला समझौता होगा। इससे दोनों पक्षों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा मिलेगा।”
अभी समझौता क्यों हुआ?
भारत और EU के बीच बातचीत की शुरुआत 10 साल से भी पहले हुई थी, लेकिन बाजार पहुंच, टैक्स और नियमों को लेकर मतभेद के कारण बातचीत 9 साल तक रुकी रही।
साल 2022 में फिर से बातचीत शुरू हुई, क्योंकि दोनों को लगा कि अब अपनी अर्थव्यवस्था और व्यापार को अलग-अलग देशों तक फैलाना जरूरी हो गया है।
पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने बातचीत को तेजी से आगे बढ़ाने पर सहमति जताई।
EU भारत के साथ रिश्ते मजबूत कर एक ही देश पर निर्भरता कम करना चाहता है। हाल ही में EU ने दक्षिण अमेरिका और एशिया के कई देशों के साथ व्यापार समझौते किए हैं।
वहीं भारत ने भी ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और ओमान जैसे देशों के साथ समझौते आगे बढ़ाए हैं।
इन सब कारणों से, दोनों पक्षों ने आखिरी समय तक चल रही बातचीत में कार, स्टील और नियमों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी समझौता कर लिया।
ऑटोमोबाइल सेक्टर में कटौती से भारतीयों को कैसे फायदा होगा?
भारत ने यूरोप के कई प्रोडक्ट पर इंपोर्ट ड्यूटी कम करने का वादा किया है। इसके बदले, EU भारत के मैन्युफैक्चरिंग, केमिकल, टैक्सटाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कई सेक्टर में बेहतर बाजार पहुंच देगा।
ऑटोमोबाइल सेक्टर सबसे विवादित क्षेत्र रहा। वर्तमान में भारत में विदेशी कारों पर 100% से भी ज्यादा इंपरोर्ट ड्यूटी लगती है, खासकर प्रीमियम और लक्जरी कारों पर।
नए समझौते के तहत, यूरोपीय देशों में बनी कारों पर ड्यूटी लगभग 40% तक घटाई जा सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत इंपोर्ट ड्यूटी को 110% से कम करने पर विचार कर रहा था।
इससे यूरोप से भारत में कारें लाना सस्ता होगा और वैश्विक कंपनियों को भारत में निवेश बढ़ाने का अवसर मिलेगा।
यूरोपीय कार कंपनियों के लिए अवसर
Volkswagen, BMW, Mercedes-Benz और Renault जैसी कंपनियों के लिए यह समझौता भारत के तेजी से बढ़ते ऑटो मार्केट में और गहरा प्रवेश करने का रास्ता खोलेगा।
लक्जरी इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को खास फायदा होगा। भारत में 40,000 डॉलर से ज्यादा कीमत वाली यूरोपीय कारों पर लगभग 100% इंपोर्ट ड्यूटी लगती है। लक्जरी EVs, जो आमतौर पर 1 करोड़ रुपए से शुरू होती हैं, इस कैटेगरी में आती हैं।
FTA के बाद ड्यूटी कम होने से यूरोपीय कंपनियां अपनी कारों की कीमतें ज्यादा कॉम्पिटेटिव बना पाएंगी। उदाहरण के लिए:
BMW iX और i4
Mercedes-Benz EQS और EQE
Audi Q8 e-tron
Volvo XC40 Recharge
इन मॉडलों की मांग पहले से ही भारत में अमीर ग्राहकों के बीच बढ़ रही है।
घरेलू उद्योग की सुरक्षा
भारतीय वार्ताकारों ने स्थानीय निर्माता और मास मार्केट कारों की सुरक्षा बनाए रखने की कोशिश की है।
सस्ते और बजट इलेक्ट्रिक वाहन, जो ज्यादातर भारत में निर्मित और घरेलू कंपनियों की ओर से बनाए जाते हैं, सीधे प्रतिस्पर्धा से प्रभावित नहीं होंगे।
इस तरह, समझौता लक्जरी और प्रीमियम यूरोपीय कारों के लिए अवसर बढ़ाएगा, जबकि भारतीय और बजट EVs सुरक्षित रहेंगे।
यूरोप को क्या मिलेगा और भारत को क्या फायदा होगा?
हालांकि, ऑटोमोबाइल सेक्टर को इससे सबसे ज्यादा फायदा होगा, लेकिन FTA का दायरा बहुत बड़ा है और यह कई दूसरे सामानों पर भी लागू होगा। भारत यूरोप से आने वाली वाइन पर आयात शुल्क कम करने वाला है।
इसके बदले, यूरोप भारत से कपड़े, गहने, केमिकल, दवाइयां और इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्यात में बेहतर पहुंच देगा।
वार्ताकारों ने संवेदनशील औद्योगिक क्षेत्रों को भी ध्यान से संभाला है, ताकि घरेलू प्रोडक्ट को अचानक नुकसान न हो।
कुछ कृषि और डेयरी प्रोडक्ट को पूरी तरह से समझौते से बाहर रखा गया है। इसका कारण भारत के छोटे किसानों की आजीविका की सुरक्षा को सुनिश्चित करना है, जो सालों से सरकार की प्राथमिकता रही है।
इस तरह, समझौता दोनों पक्षों के लिए लाभ और सुरक्षा का संतुलन बनाता है।
भारत ने उठाए EU के नॉन-टैरिफ रुकावटों पर सवाल
भारत ने बार-बार EU की ओर से लगाए गए गैर-शुल्क (non-tariff) बाधाओं पर आपत्ति जताई है। इनमें खासतौर से स्टील, एल्यूमीनियम और सीमेंट पर कार्बन-बेस्ड ड्यूटी शामिल हैं।
इसके अलावा, नई दिल्ली ने EU के Generalised System of Preferences (GSP) के तहत भारत को मिलने वाले विशेष टैरिफ लाभ को घटाए जाने पर भी चिंता जताई है। इससे लगभग 2 अरब डॉलर के भारतीय निर्यात पर असर पड़ा है।
सरकारी अधिकारी मानते हैं कि नया FTA इन दबावों को कम करने और भारत के उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में मदद करेगा।
आज भारत-EU व्यापार की स्थिति
मार्च 2025 तक समाप्त वित्तीय वर्ष में, भारत और EU के बीच सामानों का द्विपक्षीय व्यापार 136 अरब डॉलर से ज्यादा रहा।
भारत का EU में निर्यात: 75.9 अरब डॉलर
EU से भारत का आयात: 60.7 अरब डॉलर
मुख्य निर्यात कैटेगरी:
रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट – 15.0 अरब डॉलर
डीजल: 9.3 अरब डॉलर
एविएशन टरबाइन फ्यूल: 5.4 अरब डॉलर
इन प्रोडक्ट पर FTA के तहत ज्यादा बदलाव की संभावना नहीं है, क्योंकि इन पर पहले से ही कम टैरिफ लगता है और इनकी कीमतें मुख्य रूप से वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर निर्भर करती हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स – 11.3 अरब डॉलर
इसमें स्मार्टफोन का योगदान 4.3 अरब डॉलर है, जो दिखाता है कि भारत वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए एक बड़ी असेंबली और निर्माण केंद्र बनता जा रहा है।
भारत को कैसे होगा फायदा?
अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) घरेलू उद्योग को नुकसान पहुंचाए बिना कई फायदे देगा। Global Trade Research Initiative (GTRI) का मानना है कि टैरिफ में कटौती से भारतीय प्रोडक्ट की इनपुट लागत कम होगी, वैल्यू चेन में गहरी भागीदारी बढ़ेगी और भारत की कॉम्पिटेटिव स्थिति मजबूत होगी। इसके अलावा, व्यापार की मात्रा बढ़ने से भारत का वैश्विक व्यापार नेटवर्क मजबूत होगा और देश को लंबे समय में स्ट्रक्चरल लाभ मिलेंगे।
भारत से यूरोप में जो सामान जाता है, वो यूरोप के दूसरे देशों से आने वाले आयात की जगह लेता है, इसलिए यूरोप की अपनी फैक्ट्रियों को कोई नुकसान नहीं होता। वहीं, यूरोप से आने वाले सामान सीधे भारत की फैक्ट्रियों और छोटे-मध्यम उद्योगों (MSME) में जाता है, जिससे प्रोडक्शन बढ़ता है और भारत का निर्यात मजबूत होता है। इस तरह, यह समझौता भारत के लिए लॉन्ग टर्म में फायदा पहुंचाएगा और देश की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत करेगा।