India Crude Oil Supply: मिडिल ईस्ट में जारी अस्थिरता और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की कम आवाजाही ने भारत की चिंता बढ़ा दी थी। इन्हीं सब के बीच दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल खरीदार भारत ने अब अपनी निर्भरता मिडिल ईस्ट से हटाकर रूस, अफ्रीका और ईरान जैसे देशों पर बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने समय रहते वैकल्पिक रास्ते खोजकर देश में पेट्रोल-डीजल की भारी किल्लत होने से बचा लिया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और भारत पर असर
भारत अपनी जरूरत का लगभग आधा कच्चा तेल 'होर्मुज जलडमरूमध्य' के रास्ते मंगाता है। लेकिन 28 फरवरी को ईरान पर हुए हमलों के बाद से इस रास्ते पर ट्रैफिक नाममात्र रह गया है। अमेरिका और इजरायल के एक्शन के बाद यह समुद्री रास्ता असुरक्षित हो गया है। चीन की तुलना में भारत के पास तेल का भंडार कम है, जिससे कीमतों में उछाल का असर भारत पर सबसे ज्यादा पड़ने का डर था।
रूस बना भारत का सबसे बड़ा सहारा
जब मिडिल ईस्ट से सप्लाई घटी, तो भारत ने फिर से रूस का रुख किया। मार्च में भारत ने रूस से औसतन 19.8 लाख बैरल प्रतिदिन तेल आयात किया, जो जनवरी-फरवरी की तुलना में लगभग दोगुना है। अमेरिका द्वारा रूसी तेल पर दी गई अस्थायी छूट का भारतीय रिफाइनरियों ने भरपूर फायदा उठाया। 16 मई की डेडलाइन से पहले भारत ज्यादा से ज्यादा रूसी तेल सुरक्षित कर लेना चाहता है।
अफ्रीका, ईरान और वेनेजुएला से भी बढ़ा व्यापार
सिर्फ रूस ही नहीं, भारत ने अपने पुराने और नए सहयोगियों को भी सक्रिय कर दिया है। अफ्रीकी देश अंगोला से होने वाला आयात मार्च में तीन गुना बढ़कर 3.27 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया। नाइजीरिया से भी सप्लाई बढ़ी है।
सालों बाद भारत ने ईरान से 2.76 लाख बैरल और वेनेजुएला से 1.37 लाख बैरल से तेल मंगाना शुरू किया है। यह कदम अमेरिकी प्रतिबंधों के जोखिम के बावजूद अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
सस्ता तेल खत्म, अब बढ़ेंगी कीमतें?
भले ही भारत ने तेल की उपलब्धता सुनिश्चित कर ली है, लेकिन अब चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। विश्लेषकों का कहना है कि अब 'सस्ते तेल का दौर' खत्म हो गया है। अप्रैल में खरीदे गए तेल की कीमत वैश्विक बेंचमार्क से $5 से $15 प्रति बैरल ज्यादा है।अनुमान लगाया जा रहा है कि राज्य चुनावों के बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में 28 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि, सरकार फिलहाल एक्साइज ड्यूटी घटाकर कीमतों को थामे हुए है।
क्या अफ्रीकी तेल मिडिल ईस्ट की जगह ले पाएगा?
विशेषज्ञों के मुताबिक, अफ्रीकी तेल एक हद तक मदद तो कर सकता है, लेकिन यह मिडिल ईस्ट के तेल का पूर्ण विकल्प नहीं है। इसका कारण यह है कि भारतीय रिफाइनरियां एक विशेष ग्रेड के तेल के लिए बनी हैं, जबकि अफ्रीकी तेल का ग्रेड अलग होता है।