न सिर्फ खुद अदालतों में हाजिरी देना, मुकदमों में जिरह करना, बल्कि राम जेठमलानी जैसे कानून विशेषज्ञों को भी बड़े ही आराम से इन मामलों का एक- एक पहलू सुलझाना, ये सारा काम सहज ढंग से करते थे तुषार मेहता। अपने कैरियर के शुरुआती दौर से ही हर केस का पूरी गहराई से अध्ययन करना, उसके हर पहलू में जाना तुषार मेहता की आदत में शुमार था, इसलिए किसी भी केस की जानकारी उनकी जुबान पर रहती थी। इसी बीच वो समय भी आया, जब अमित शाह के खिलाफ तत्कालीन यूपीए सरकार के दबाव में सीबीआई ने सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में चार्जशीट दाखिल कर दी और मजबूरन उन्हें मोदी मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर जुलाई 2010 में सीबीआई के सामने सरेंडर करना पड़ा। शाह की इस कानूनी लड़ाई में तुषार मेहता पूरी ताकत से उनके साथ खड़े रहे। इस वजह से कुछ समय बाद ही न सिर्फ गुजरात हाईकोर्ट से अमित शाह को जमानत हासिल हुई, बल्कि अगले कुछ वर्षों में एक के बाद एक तमाम मुठभेड़ मामलों को सफल ढंग से लड़कर न सिर्फ शाह बल्कि गुजरात के उन पुलिसकर्मियो को भी छुड़वाने, मामले से बरी करवाने में कामयाब रहे मेहता, जो लंबे समय से जेल में थे।