जब हम TV पर सुनते हैं कि "1 डॉलर अब 83 या 84 रुपये का हो गया है", तो हमें लगता है कि यह सिर्फ गणित का एक आंकड़ा है। लेकिन असली कहानी तब शुरू होती है, जब आप उस पैसे को लेकर बाजार निकलते हैं। आइए समझते हैं कि ₹100 की ताकत भारत और अमेरिका में कितनी अलग है।
अमेरिका में ₹100 की 'बेबसी'
अगर आप आज ₹100 को डॉलर में बदलें, तो आपको लगभग 1.10 से 1.20 डॉलर मिलेंगे। कागजों पर यह बुरा नहीं लगता, लेकिन अमेरिका की महंगाई के सामने यह रकम बहुत छोटी है।
अब सवाल है कि इस 100 की नीले पत्ती में वहां क्या मिलेगा? इतने पैसे में आप शायद एक छोटी पानी की बोतल, एक चॉकलेट बार या किसी सुपरमार्केट से एक फल खरीद पाएंगे।
अगर आप सोच रहे हैं कि वहां ₹100 (1 डॉलर) में एक कप अच्छी कॉफी मिल जाएगी, तो भूल जाइए। वहां एक नॉर्मल कॉफी की शुरुआत ही कम से कम 2 या 3 डॉलर (करीब ₹170-₹250) से होती है।
अब इसी ₹100 को भारत के नजरिए से देखिए। यहां यह रकम आज भी काफी काम की है:
असली खेल: "परचेजिंग पावर" का
यहीं पर अर्थशास्त्र का एक बड़ा शब्द आता है- 'परचेजिंग पावर'। इसका सीधा मतलब है कि आपका पैसा असल में कितना काम कर सकता है।
भले ही एक्सचेंज रेट कुछ भी कहे, लेकिन भारत में ₹100 की 'परचेजिंग पावर' अमेरिका के 1.20 डॉलर से कहीं ज्यादा है।
अमेरिका इतना महंगा क्यों है?
अमेरिका में चीजें महंगी होने की वजह सिर्फ सामान नहीं है, बल्कि वहां का लेबर (मजदूरी), किराया और रहन-सहन का खर्च बहुत ज्यादा है। एक कप कॉफी बनाने वाले को जो सैलरी मिलती है और उस दुकान का जो किराया है, वो सब उस कॉफी की कीमत में जुड़ जाता है।
भारत की तरह अमेरिका में भी फर्क पड़ता है। अगर आप न्यूयॉर्क या सैन फ्रांसिस्को जैसे बड़े शहरों में हैं, तो वहां 1 डॉलर (₹84) की कोई कीमत नहीं है। छोटे शहरों में शायद थोड़ा ज़्यादा मिल जाए, लेकिन फिर भी वह भारत के मुकाबले बहुत कम होगा।
एक्सचेंज रेट हमें सिर्फ सिक्के का एक पहलू दिखाता है। असली सच यह है कि पैसा कितना है, उससे ज्यादा जरूरी यह है कि उस पैसे से आप कितना सामान घर ला सकते हैं। भारत में आपका ₹100 आज भी एक 'उपयोगी' रकम है, जबकि अमेरिका में यह सिर्फ एक छोटी सी शुरुआत भर है।