Brahma Chellaney: चर्चित जियोपॉलिटिकल विश्लेषक और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के प्रोफेसर ब्रह्मा चेलानी ने भारत की सैन्य रणनीति को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। चेलानी का मानना है कि भारत आज भी 'पुराने ढर्रे' के युद्ध की तैयारी कर रहा है, जबकि आधुनिक युद्ध का चेहरा पूरी तरह बदल चुका है। उन्होंने 'ओपन' मैग्जीन के एक लेख का हवाला देते हुए कहा कि मौजूदा ईरान-अमेरिका संघर्ष इस बात का जीता-जागता प्रमाण है।
पारंपरिक युद्ध बनाम 'असीमेट्रिक' वॉरफेयर
चेलानी के अनुसार, भारत का सैन्य ढांचा अभी भी बड़े और पारंपरिक युद्धों पर केंद्रित है, जिसमें टैंक, तोपें और लड़ाकू विमानों की मुख्य भूमिका होती है। चेलानी का कहना है कि भारत के पड़ोसी देश अब 'असीमेट्रिक' यानी गैर-पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीन की कार्रवाई का जिक्र किया, जहां चीन ने बिना किसी बड़े पारंपरिक युद्ध के क्षेत्रीय बदलाव हासिल कर लिए।
एक जबरदस्त केस स्टडी है ईरान युद्ध
ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रहा संघर्ष यह दिखाता है कि सिर्फ सैन्य श्रेष्ठता काफी नहीं है। अमेरिका और इजरायल ने ईरान की सैन्य क्षमता को काफी नुकसान पहुंचाया, लेकिन चेलानी के अनुसार, इससे कोई स्पष्ट 'रणनीतिक जीत' हासिल नहीं हुई। ईरान ने महंगे जहाजों या विमानों के बजाय सस्ते ड्रोन, मिसाइलों और समुद्री खतरों का इस्तेमाल किया। इन छोटे और कम लागत वाले हथियारों ने होर्मुज जलसंधि जैसे महत्वपूर्ण रास्तों पर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को हिला कर रख दिया।
'महंगे सौदे' बनाम 'सस्ते और मारक हथियार'
ब्रह्मा चेलानी ने भारत के रक्षा बजट और खरीद पर भी सवाल उठाए हैं। भारत अभी भी दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातकों में से एक है और अरबों डॉलर महंगे फाइटर जेट्स और हाई-वैल्यू प्लेटफॉर्म्स पर खर्च कर रहा है। चेलानी का तर्क है कि भारत इन महंगे विमानों पर जितना खर्च कर रहा है, उसकी तुलना में स्वदेशी ड्रोन और मिसाइल तकनीक पर निवेश काफी कम है। जबकि आज के दौर में सस्ते ड्रोन दुश्मन के महंगे डिफेंस सिस्टम को बेकार साबित कर सकते हैं।
रक्षा का खर्च और आर्थिक बोझ
'ओपन' लेख के अनुसार, ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका को एक बड़ी आर्थिक चुनौती का सामना करना पड़ा। ईरान ने सस्ते ड्रोन दागे, लेकिन उन्हें हवा में नष्ट करने के लिए अमेरिका को अपने सबसे महंगे इंटरसेप्टर सिस्टम और मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ा। दुश्मन पर हमला करने की लागत के मुकाबले खुद का बचाव करने की लागत बहुत ज्यादा थी। भारत के लिए भी यह एक चेतावनी है कि क्या वह भविष्य में ऐसे 'खर्चीले' युद्ध झेल पाएगा?
लेख यह भी बताता है कि ईरान युद्ध ने अमेरिका का ध्यान 'इंडो-पैसिफिक' क्षेत्र से भटका दिया है। युद्ध के संचालन को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच भी मतभेद उभर कर सामने आए। होर्मुज की नाकेबंदी और धमकियों ने वैश्विक बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव पैदा किया, जिससे साबित हुआ कि छोटे हथियार भी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बंधक बना सकते हैं।