Mohammad Deepak News: 'एक आरोपी पुलिस सुरक्षा कैसे मांग सकता है?'; उत्तराखंड हाई कोर्ट ने ‘मोहम्मद’ दीपक को लगाई फटकार

Mohammad Deepak News: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने गुरुवार (19 मार्च) को कहा कि ‘मोहम्मद’ दीपक कुमार अपने खिलाफ चल रहे एक मामले से जुड़ी याचिका दायर करके पुलिस पर दबाव डालने की कोशिश कर रहे हैं। पीठ ने याचिका में पुलिस सुरक्षा की मांग पर आपत्ति जताते हुए उन्हें मौखिक रूप से यह फटकार लगाई

अपडेटेड Mar 20, 2026 पर 10:50 AM
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Mohammad Deepak News: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने मो. दीपक से पूछा कि एक आरोपी पुलिस सुरक्षा कैसे मांग सकता है?

Mohammad Deepak News: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कोटद्वार विवाद मामले में खुद को 'मोहम्मद दीपक' बताने वाले जिम मालिक दीपक कुमार को फटकार लगाते हुए पूछा कि एक आरोपी पुलिस सुरक्षा कैसे मांग सकता है? कोर्ट ने FIR रद्द करने के अनुरोध वाली कुमार की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। पीठ ने याचिका में पुलिस सुरक्षा की मांग और कथित पक्षपातपूर्ण आचारण के लिए पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई जैसे अनावश्यक अनुरोध को शामिल करने पर आपत्ति जताते हुए उन्हें मौखिक रूप से यह फटकार लगाई।

जस्टिस राकेश थपलियाल की सिंगल पीठ ने गुरुवार (19 मार्च) को इस तरह याचिकाओं को दबाव बनाने की रणनीति करार दिया, जिसका उद्देश्य मौजूदा जारी जांच को प्रभावित करना और पूरे मामले को सनसनीखेज बनाना है। अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जब याचिकाकर्ता स्वयं एक संदिग्ध आरोपी है तो पुलिस सुरक्षा मांगने के पीछे उसका क्या औचित्य है?

क्या है मामला?


कोटद्वार में 26 जनवरी को हुई एक घटना के संबंध में कुमार के खिलाफ दंगा करने, चोट पहुंचाने और शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमानित करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि कोटद्वार में एक मुस्लिम दुकानदार, वकील अहमद द्वारा अपनी दुकान का नाम 'बाबा' रखे जाने पर आपत्ति प्रकट कर रहे बजरंग दल के सदस्यों के साथ दीपक कुमार का झगड़ा हुआ था। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था।

FIR रद्द करने की मांग

FIR को रद्द का अनुरोध करते हुए कुमार ने हाई कोर्ट का रुख किया है। याचिका में कुमार ने अदालत से यह भी प्रार्थना की थी कि कथित घृणा भाषण देने वालों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 के तहत FIR दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। याचिका में कुमार और उनके परिवार के लिए पुलिस सुरक्षा और पक्षपातपूर्ण आचरण के लिए कथित रूप से दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच का भी अनुरोध किया गया है।

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने इस तरह की याचिकाओं की वैधता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह जांच एजेंसी पर दबाव डालने का एक तरीका है। जांच अधिकारी ने भी कहा कि याचिकाकर्ता को कोई खतरा नहीं है। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के स्वयं संदिग्ध आरोपी होने के बावजूद संरक्षण का अनुरोध करने के तर्क पर सवाल उठाया।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आज की तारीख में याचिकाकर्ता एक संदिग्ध आरोपी है। जो व्यक्ति जांच के दायरे में है एवं संदिग्ध आरोपी है, उसे पुलिस सुरक्षा कैसे मिल सकती है? पीठ ने कहा कि इस स्तर पर ऐसी राहत पूरी तरह से अनावश्यक है। अदालत ने कहा कि यह जांच एजेंसी पर दबाव डालने का एक प्रयास मात्र प्रतीत होता है।

पुलिस जांच को लेकर अदालत गंभीर

अदालत ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच के अनुरोध को भी गंभीरता से लिया। साथ ही आरोपों को साबित करने के लिए रिकॉर्ड में कोई सबूत न होने पर टिप्पणी की कि जांच लंबित होने के दौरान इस तरह का अनुरोध करना, कार्यवाही को प्रभावित करने का प्रयास मात्र है। सुनवाई के दौरान अदालत के संज्ञान में लाया गया कि दो FIR याचिकाकर्ता की शिकायत के आधार पर दर्ज की गयी थीं।

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कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसी कोई शिकायत है तो उसे भी शुक्रवार को अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा। सुनवाई के दौरान, हाई कोर्ट ने घटना के बाद याचिकाकर्ता को समर्थकों से कथित तौर पर मिली धनराशि के बारे में भी पूछताछ की। दीपक के अनुसार, घटना के बाद उन्हें दान के रूप में लगभग 80,000 रुपये प्राप्त हुए, जिसके बाद उन्होंने खाते की गतिविधि बंद कर दीं।

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