उन 12 राज्यों की लिस्ट जिनके 111 जिलों की खेती खराब कर सकता है कमजोर मानसून, 2 जुलाई तक का ये आसन्न खतरा सर पर मंडराया

Monsoon and Farmer News: दक्षिण-पश्चिम मानसून की सुस्त रफ्तार के कारण देश के 12 राज्यों के 111 जिलों पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में एक समीक्षा बैठक के बाद बताया कि मानसून के आगामी 2 जुलाई तक कमजोर रहने की आशंका है

अपडेटेड Jun 24, 2026 पर 4:22 PM
Monsoon and Farmer News: मानसून में 43% की भारी कमी आई है। देश के 12 राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित हैं

Monsoon and Farmer News: देश में कृषि क्षेत्र और किसानों के सामने एक बार फिर बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की सुस्त रफ्तार के कारण देश के 12 राज्यों के 111 जिलों पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में एक समीक्षा बैठक के बाद बताया कि मानसून के आगामी 2 जुलाई तक कमजोर रहने की आशंका है।

इससे विशेष रूप से वर्षा आधारित क्षेत्रों में खरीफ फसलों की बुवाई और पैदावार बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। इसके साथ ही सरकार ने स्पष्ट किया है कि कमजोर मानसून की इस स्थिति से निपटने के लिए देश पूरी तरह तैयार है और किसानों को घबराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है।

मानसून में 43% की भारी कमी, ये 12 राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित


जानकारी के मुताबिक वर्तमान में मानसून की बारिश में कुल 43 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुमान के मुताबिक 2 जुलाई तक मानसून कमजोर बना रहेगा। इसका सीधा असर खरीफ की फसलों पर पड़ेगा। वैज्ञानिक डेटा के आधार पर कृषि मंत्रालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने कम बारिश और अपर्याप्त सिंचाई वाले संवेदनशील जिलों का आकलन किया है। इसके तहत देश के 12 राज्यों के कुल 315 जिलों को कमजोर मानसून से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों के रूप में मैप किया गया है।

इन 12 राज्यों के नाम नीचे दिए गए हैं-

मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा।

तीन श्रेणियों में बांटे गए जिले: 111 जिले अति संवेदनशील

मंत्रालय ने सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर इन 315 प्रभावित जिलों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है। अति संवेदनशील श्रेणी में उन 111 जिलों को रखा गया है, जहां सिंचाई की सुविधा 25 प्रतिशत से भी कम है। इन 111 जिलों में से अकेले 20 जिले महाराष्ट्र में स्थित हैं। यहां मानसून की सुस्ती का सबसे गंभीर असर पड़ सकता है।

मध्यम संवेदनशील श्रेणी में वे 76 जिले शामिल हैं, जहां सिंचाई का कवर 25 से 50 प्रतिशत के बीच है। कम संवेदनशील जिलों में 128 जिलों को रखा गया है, जहां पर्याप्त बांध और सिंचाई का बुनियादी ढांचा मौजूद है। कृषि मंत्री ने इन राज्यों के कृषि मंत्रियों और जिला कलेक्टरों के साथ विस्तृत चर्चा कर स्थानीय स्तर पर तैयारियों को तेज करने का आग्रह किया है।

खेतों को खाली नहीं छोड़ेगी सरकार, आकस्मिक योजना तैयार

कमजोर मानसून के प्रभाव को कम करने और किसानों की आजीविका को सुरक्षित रखने के लिए सरकार वैज्ञानिक योजना और फील्ड-स्तरीय हस्तक्षेप लागू कर रही है। इसके लिए राज्यवार आकस्मिक योजनाएं तैयार की गई हैं। राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे ऐसी फसलों को बढ़ावा दें जिन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है, जैसे दालें, तिलहन और मोटे अनाज।

किसानों को किसी एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय कम समय में तैयार होने वाली और जलवायु के अनुकूल बीजों की किस्मों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। कृषि मंत्री ने स्पष्ट कहा है कि, 'अगर बारिश में लंबा गैप आता है तो हम किसानों को वैकल्पिक फसलें उगाने का सुझाव देंगे। हम खेतों को खाली नहीं रहने देंगे।' इसके साथ ही उन्होंने बताया कि इस सीजन के लिए बीज और खाद पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।

जल संरक्षण को टॉप प्रायोरिटी, मनरेगा और ग्रामीण योजनाओं की मदद

कमजोर मानसून की आशंका के बीच सरकार ने जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। तालाबों, जलाशयों, जलधाराओं, कृषि तालाबों, चेक डैमों, स्टॉप डैमों और अस्थायी बांध संरचनाओं की तुरंत मरम्मत और उन्हें मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। ग्रामीण विकास कार्यक्रमों जैसे VB-GRAMG के तहत जल संरक्षण और जल संचयन के काम को प्राथमिकता दी जाएगी ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन और जल भंडारण क्षमता में वृद्धि दोनों काम एक साथ हो सकें।

संवेदनशील जिलों को निर्देश दिया गया है कि वे पेयजल की आपूर्ति को पहली प्राथमिकता दें और आवश्यकता पड़ने पर पानी की प्रचुरता वाले क्षेत्रों से कमी वाले इलाकों में पानी ट्रांसफर करने की व्यवस्था करें। जलाशयों के भंडारण की समीक्षा में पाया गया कि कुछ बेसिनों में भंडारण स्तर सामान्य से ऊपर है जबकि अन्य में 20 से 60 प्रतिशत तक की कमी देखी जा रही है। इसके अनुसार राज्यों को काम करने को कहा गया है।

176 मिलियन टन उत्पादन का लक्ष्य, अल नीनो पर रखी जा रही नजर

22 जून तक देश में खरीफ फसलों की बुवाई कुल बोए गए क्षेत्र के 10 प्रतिशत से कम हिस्से पर हुई है। यह पिछले साल की इसी अवधि के 11।79 मिलियन हेक्टेयर से मामूली रूप से अधिक 11।99 मिलियन हेक्टेयर दर्ज की गई है। वर्तमान में सोयाबीन को छोड़कर बाकी अधिकांश फसलें आगे चल रही हैं। सरकार ने खरीफ 2026 के लिए लगभग 176 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य रखा है। मंत्री ने कहा कि ये अनुमान सामान्य परिस्थितियों पर आधारित होते हैं, लेकिन हम यह सुनिश्चित करेंगे कि उत्पादन में गिरावट न आए।

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रीयल-टाइम ट्रैकिंग और समय पर सलाह जारी करने के लिए मंत्रालय ने एक 'अल नीनो मॉनिटरिंग सेल' और एक 'क्रॉप वेदर वॉच ग्रुप' का गठन किया है। चिन्हित राज्यों में फसल बीमा योजनाओं और किसान क्रेडिट कार्ड के तहत व्यापक पंजीकरण कराने को कहा गया है। देश के 731 कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) को सक्रिय कर एसएमएस, व्हाट्सएप और कॉल सेंटरों के माध्यम से किसानों तक समय पर सलाह पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं।

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