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मुजफ्फरनगर में 97 केस की फाइलों पर फिर उठे सवाल, जज रवि कुमार दिवाकर ने फैसले में क्या लिखा?

अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने NDPS Act के एक मामले में आरोपी को बरी करते हुए अदालत से 97 हत्या के मामलों को वापस लेने के आदेश पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश का सबसे जरूरी काम न्याय करना है, लेकिन अगर न्याय करने वाले के साथ ही अन्याय हो जाए तो वह अपनी बात कहां रखेगा। उनके इस बयान के बाद अदालत से जुड़े इस फैसले को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।

Roopali Sharmaअपडेटेड Sep 18, 2026 पर 10:32 AM
मुजफ्फरनगर में 97 केस की फाइलों पर फिर उठे सवाल, जज रवि कुमार दिवाकर ने फैसले में क्या लिखा?

मुजफ्फरनगर: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में 97 हत्या के मामलों की पत्रावलियां वापस लिए जाने का मामला एक बार फिर चर्चा में है। फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने NDPS Act के एक पुराने मामले में फैसला सुनाते हुए इन फाइलों को वापस लिए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। रवि कुमार दिवाकर मूल रूप से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के रहने वाले हैं। उनका जन्म जुलाई 1980 में हुआ था। पढ़ाई की बात करें तो उन्होंने B.Com और LLM की पढ़ाई की है। इसके बाद साल 2009 में उन्होंने अतिरिक्त सिविल जज के तौर पर उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में कदम रखा। तब से अब तक उन्होंने न्यायिक सेवा में करीब 17 साल पूरे किए हैं। इस दौरान उनकी तैनाती उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में रही और उन्होंने सुल्तानपुर, बदायूं, वाराणसी, बरेली और मुजफ्फरनगर जैसे जिलों में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालीं। फिलहाल वह मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर तैनात हैं।

दरअसल, जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत से हत्या के 97 लंबित मामलों की पत्रावलियां अगस्त में जिला एवं सत्र न्यायालय में वापस ली गई थीं। इससे पहले उनकी अदालत में हत्या से जुड़े कई मामलों में फैसले हुए थे। अब एक एनडीपीएस मामले के फैसले में जज ने इन पत्रावलियों को वापस लेने के आदेश और उसकी कानूनी प्रक्रिया पर अपनी टिप्पणी दर्ज की है।

रिटायरमेंट से 13 दिन पहले लिया गया था फैसला

फैसले में दर्ज जज की टिप्पणी के मुताबिक, 97 पत्रावलियों को वापस लेने का आदेश तत्कालीन जिला जज के रिटायरमेंट से करीब 13 दिन पहले जारी हुआ था। जज ने सवाल उठाया कि इन मामलों को वापस लेने के आदेश में इसके पीछे का कारण स्पष्ट नहीं किया गया।

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