NARI Report 2025: कोहिमा, विशाखापट्टनम और भुवनेश्वर ने मारी बाजी, महिलाओं की सुरक्षा के मामले में दिल्ली, जयपुर और पटना सबसे नीचे

NARI Report 2025: महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से जारी रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर-पूर्व के कोहिमा, आइजवाल, गंगटोक और इटानगर के अलावा विशाखापट्टनम, भुवनेश्वर और मुंबई सबसे सुरक्षित शहर हैं। वहीं इस मामले में देश की राजधानी दिल्ली और पटना समेत कई शहर निचले पायदान पर हैं।

अपडेटेड Aug 29, 2025 पर 2:40 PM
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महिलाओं की सुरक्षा के मामले में दिल्ली सबसे निचले पायदान पर रही।

NARI Report 2025: महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से देश के शहरों की सूची जारी की गई है, जो बताती है कि किन शहरों में देश की आधी आबादी खुद को ज्यादा महफूज महसूस करती है। नेशनल एनुअल रिपोर्ट ऐंड इंडेक्स ऑन वुमेंस सेफ्टी (NARI) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक कोहिमा, भुवनेश्वर, विशाखापट्टनम, आइजवाल, गंगटोक, इटानगर और मुंबई महिलाओं के लिए ज्यादा सुरक्षित शहर हैं। इसके मुकबाले देश की राजधानी दिल्ली और फरीदाबाद सहित, पटना, जयपुर, कोलकाता, रांची और श्रीनगर महिलाओं की सुरक्षा के मामले में निचले पायदान पर हैं।

इस सर्वे की रिपोर्ट 28 अगस्त को जारी की गई। इसके तहत राष्ट्रव्यापी सूचकांक के लिए 31 शहरों में 12,770 महिलाओं का सर्वेक्षण किया गया। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा स्कोर 65 प्रतिशत आंका गया। इसमें शामिल शहरों को बेंचमार्क ‘काफी ऊपर’, ‘ऊपर’, ‘नीचे’ या ‘काफी नीचे’ की श्रेणी में रखा गया।

इस सूची में मौजूद कोहिमा, आइजवाल और विशाखापट्टनम जैसे शहरों को बेहतर लैंगिक समानता, बेहतर पुलिस व्यवस्था, नागरिक भागीदारी और महिलाओं के अनुकूल बुनियादी ढांचा से जोड़ा गया। वहीं, पटना और जयपुर जैसे शहरों का प्रदर्शन इस मामले में कमजोर रहा। यहां कमजोर संस्थागत प्रतिक्रिया, पितृसत्तात्मक नजरिया और शहरी बुनियादी ढांचे में अंतर के कारण यह समस्या और भी बदतर हो गई है।

रिपोर्ट में कहा गया, कोहिमा, आइजवाल, विशाखापट्टनम, भुवनेश्वर, गंगटोक, इटानगर, राष्ट्रीय सुरक्षा की रैंकिंग में अव्वल रहे। इनका उच्च लैंगिक समानता, बुनियादी ढांचे, बेहतर पुलिस व्यवस्था या नागरिक भागीदारी से जुड़ाव पाया गया। वहीं, दिल्ली, फरीदाबाद, रांची, पटना, कोलकाता और श्रीनगर में खराब बुनियादी ढांचा व्यवस्था, पितृसत्तात्मक नियम या कमजोर संस्थागत प्रतिक्रिया के चलते सबसे खराब स्कोर रहा।

सुरक्षा धारणाएं : एक मिलीजुली तस्वीर

10 में से छह महिलाओं ने कहा कि वे शहर में खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं, लेकिन 40% अब भी ‘असुरक्षित’ या ‘उतना सुरक्षित नहीं’ की श्रेणी में हैं।


पब्लिक ट्रांसपोर्ट और मनोरंजन स्थलों पर रात के समय सुरक्षा की धारणा सबसे तेज गिरावट देखने को मिली।

शैक्षिक संस्थान सबसे सुरक्षित (86% दिन के समय) बताए गए, लेकिन रात के समय या कैंपस के बाहर सुरक्षा की धारणा तेजी से कमजोर हुई।

कार्यस्थल पर सुरक्षा का थोड़ा ज्यादा भरोसा रहा : सर्वे में शामिल 91% महिलाओं ने ऑफिस में खुद हो सुरक्षित महसूस किया। इसके बावजुद आधी महिलाओं ने माना कि उन्हें नहीं पता कि उनके नियोक्ता के पास पीओएसएच (यौन उत्पीड़न रोकथाम) नीति है या नहीं। जिन लोगों को इसकी जानकारी थी, उनमें से ज्यादातर ने इनको प्रभावी बताया।

अधिकारियों पर भरोसा कमजोर बना रहा और चार में से एक महिला ने माना कि शिकायतों पर प्रभावी तरीके से कार्रवाई की गई।

उत्पीड़न के ठिकाने और उनका बाहर न आना

सर्वे में देखा गया कि 2024 में 7% महिलाओं ने सार्वजनिक स्थानों पर उत्पीड़न झेला। यह संख्या 24 साल से कम उम्र की महिलाओं में दोगुनी यानी 14% रही।

  • आस-पड़ोस (38%) और सार्वजनिक परिवहन (29%) सबसे ज्यादा उत्पीड़न के हॉटस्पॉट के रूप में उभरे।
  • इसके बावजूद, तीन में से केवल एक पीड़ित ने ही अपने अनुभवों की रिपोर्ट की, जिससे ज्यादातर घटनाएं आधिकारिक एनसीआरबी डेटा से बाहर रह गईं।

अध्ययन में चेतावनी दी गई कि अपराध के आधिकारिक आंकड़े उस स्थिति की सही तस्वीर पेश नहीं करते हैं, जिससे महिलाएं रोज गुजरती हैं। इसके मुताबिक, ‘तीन में से दो उत्पीड़न के मामलों की रिपोर्ट नहीं करती हैं। इसका अर्थ हुआ कि एनसीआर बहुत सी घटनाओं की जानकारी से चूक जाती है।’

हर क्षेत्र में सुरक्षित माहौल बने : एनसीडब्लू

रिपोर्ट जारी करते हुए, राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की अध्यक्ष विजया राहतकर ने कहा कि सुरक्षा को केवल कानून-व्यवस्था के मुद्दे के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसे ‘शिक्षा, स्वास्थ्य, काम के अवसर या आवाजाही की स्वतंत्रता जैसे महिलाओं के जीवन के हर पहलू को प्रभावित करने वाले मुद्दे के तौर पर देखा जाना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि जब महिलाएं असुरक्षित महसूस करती हैं, तो ‘वे खुद को सीमित कर लेती हैं, और महिलाओं का खुद को सीमित करना न केवल उनके अपने विकास के लिए, बल्कि देश के विकास के लिए भी है।’

राहतकर ने महिलाओं की सुरक्षा के चार आयामों - शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, वित्तीय और डिजिटल - पर बात की और साइबर अपराध और व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग के खिलाफ मजबूत सुरक्षा का आग्रह किया।

उन्होंने पब्लिक ट्रांसपोर्ट में महिला पुलिस अधिकारियों और महिला ड्राइवरों की बढ़ती संख्या की सराहना की, साथ ही हेल्पलाइन, स्मार्ट शहरों में सीसीटीवी कवरेज और परिवहन केंद्रों पर बेहतर सुरक्षा नेटवर्क की भी सराहना की।

लेकिन उन्होंने समाज को उसकी भूमिका की भी याद दिलाई: "हम अक्सर व्यवस्था को दोष देते हैं, लेकिन हमें यह भी पूछना चाहिए कि हमने क्या किया है। चाहे हेल्पलाइन का इस्तेमाल करना हो, जागरूकता अभियानों में सहयोग करना हो, या सार्वजनिक शौचालयों को साफ़ रखना हो, समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।"

राहतकर ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा का मतलब सिर्फ उत्पीड़न और हिंसा से बचाव नहीं है, बल्कि यह समान अवसर, समान वेतन और कार्यस्थल पर सम्मानजनक माहौल सुनिश्चित करने से भी जुड़ा है।

क्या है NARI सूचकांक

इस सूचकांक की सोच परिकल्पना पीवैल्यू एनालिटिक्स, नॉर्थकैप विश्वविद्यालय और जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल संयुक्त रूप से है। इसे ग्रुप ऑफ इंटेलेक्चुअल्स एंड एकेडमिशियंस (जीआईए) द्वारा प्रकाशित किया जाता है।

अपराध के आंकड़ों को धारणा-आधारित सर्वे के साथ जोड़कर पेश करने के पीछे इस सूचकांक का उद्देश्य भारतीय शहरों में महिलाओं की सुरक्षा की एक मुकम्मल तस्वीर खड़ी करना है। यह न केवल आंकड़ों को, बल्कि शहरी जीवन में महिलाओं की रोजमर्रा की हकीकत को भी उजागर करती है।

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