छात्रों पर गोलीकांड में पूर्व PM केपी ओली पर नेपाल सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, रिहा करने का दिया आदेश

बता दें कि, पिछले महीने नेपाली कांग्रेस के नेता और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को भी इसी मामले में पहले उनके घर से गिरफ्तार किया गया था। यह कार्रवाई गृह मंत्रालय की ओर से दर्ज कराई गई एक आधिकारिक शिकायत के बाद की गई, जिसके आधार पर जांच शुरू हुई और गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए। ‘काठमांडू पोस्ट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस अधिकारियों ने बताया कि ये गिरफ्तारियां एक आयोग की सिफारिशों के आधार पर हुई थीं

अपडेटेड Apr 06, 2026 पर 10:06 PM
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नेपाल हाई कोर्ट ने सोमवार को पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को रिहा करने का आदेश दिया है।

नेपाल हाई कोर्ट ने सोमवार को पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को रिहा करने का आदेश दिया है। केपी शर्मा ओली को नेपाल पुलिस ने भक्तपुर स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया था। यह गिरफ्तारी सितंबर 2025 में जेन-जी आंदोलन के दौरान की गई कार्रवाई को लेकर हुई थी। इन प्रदर्शनों के दौरान कुल 77 लोगों की मौत हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला तब आया है, जब एक दिन पहले ही काठमांडू की एक अदालत ने दोनों को 5 दिन की कस्टडी में भेजने का आदेश दिया था। हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दोनों के जेल से बाहर आने का रास्ता साफ हो गया है।

जेन-जी आंदोलन को लेकर हुई थी कार्रवाई 

बता दें कि, पिछले महीने नेपाली कांग्रेस के नेता और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को भी इसी मामले में पहले उनके घर से गिरफ्तार किया गया था। यह कार्रवाई गृह मंत्रालय की ओर से दर्ज कराई गई एक आधिकारिक शिकायत के बाद की गई, जिसके आधार पर जांच शुरू हुई और गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए। ‘काठमांडू पोस्ट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस अधिकारियों ने बताया कि ये गिरफ्तारियां एक आयोग की सिफारिशों के आधार पर हुई थीं। इस आयोग की अध्यक्षता पूर्व विशेष अदालत के न्यायाधीश गौरी बहादुर कार्की कर रहे थे। आयोग ने प्रदर्शनों के दौरान की गई कार्रवाई की जांच की थी और अपनी रिपोर्ट में कई वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कदम उठाने की सिफारिश की थी।


आयोग ने अपनी सिफारिश में कहा था कि पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, रमेश लेखक और उस समय के पुलिस महानिरीक्षक चंद्र कुबेर खापुंग पर आपराधिक लापरवाही का मामला चलाया जाए। इनके खिलाफ राष्ट्रीय दंड संहिता की धारा 181 और 182 के तहत कार्रवाई की बात कही गई थी। इन धाराओं के तहत अधिकतम 10 साल तक की सजा हो सकती है। रिपोर्ट में कुछ अन्य अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की गई थी। इनमें उस समय के गृह सचिव गोकर्ण मणि दवाड़ी, सशस्त्र पुलिस बल के प्रमुख राजू अर्याल, राष्ट्रीय जांच विभाग के पूर्व प्रमुख हुतराज थापा और काठमांडू के तत्कालीन मुख्य जिला अधिकारी छवि रिजाल शामिल हैं। आयोग ने कहा था कि इनके खिलाफ धारा 182 के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

इसके अलावा, आयोग ने कहा कि जो भी अन्य अधिकारी इस मामले में दोषी पाए जाएं, उनके खिलाफ संबंधित विभागों के कानूनों के तहत सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। रिपोर्ट में कई गंभीर चूकों की ओर इशारा किया गया है। इसमें कहा गया है कि पूरी कार्रवाई आपराधिक लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी का नतीजा थी। साथ ही यह भी सामने आया कि अधिकारियों को पहले से हिंसा बढ़ने की खुफिया जानकारी मिली थी, लेकिन उन्होंने समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इसी लापरवाही के कारण प्रदर्शनों के दौरान हालात बिगड़ गए और कई लोगों की जान चली गई।

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