पीएम मोदी अपनी 5 दिन की यात्रा के दूसरे पड़ाव पर नीदरलैंड पहुंच चुके हैं। नीदरलैंड पहुंचने पर प्रधानमंत्री मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया गया। यह दौरा भारत और यूरोप के बीच मजबूत होते रिश्तों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। वहीं पीएम मोदी के इस दौरे पर नीदरलैंड ने भारत को एक खास तोहफा दिया है। नीदरलैंड की सरकार ने चोल राजवंश के बहुत कीमती और ऐतिहासिक ताम्रपत्र (तांबे की प्लेट्स) भारत को वापस सौंप दिए हैं। बता दें कि, इसे औपनिवेशिक दौर में विदेश ले जाई गई भारतीय सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
नीदरलैंड ने लौटाई भारत की ये बेशकीमती चीज
बता दें कि, चोल काल की इन दुर्लभ तांबे की प्लेटों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड्स यात्रा के दौरान भारत को लौटाया गया। नीदरलैंड्स में इन प्लेटों को “लीडेन प्लेट्स” के नाम से जाना जाता है। ये चोल राजवंश से जुड़े सबसे अहम ऐतिहासिक अभिलेखों में शामिल हैं। ये तांबे की प्लेटें एक सौ साल से ज्यादा समय तक डच प्रशासन के पास रहीं और लीडेन विश्वविद्यालय में सुरक्षित रखी गई थीं। इन ऐतिहासिक धरोहरों की वापसी भारत सरकार, डच सरकार और लीडेन विश्वविद्यालय के बीच कई वर्षों तक चली बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के बाद संभव हो सकी।
चोल वंश से जुड़ा है ये ताम्रपत्र
अन्नामंगलम तांबे की प्लेटचोल सम्राट राजराजा चोल प्रथम के शासनकाल की मानी जाती हैं। उनका शासन 985 ईस्वी से 1014 ईस्वी तक रहा था। इतिहासकार इन प्लेटों को तमिल संस्कृति और विरासत का बेहद अहम हिस्सा मानते हैं। साथ ही, इन्हें भारत के बाहर सुरक्षित रखे गए चोल काल के सबसे महत्वपूर्ण शिलालेखों में गिना जाता है। इन तांबे की प्लेटों में नागपट्टिनम में बने एक बौद्ध मठ “चूड़ामणि विहार” को दी गई जमीन, कर और राजस्व से जुड़े अनुदानों का जिक्र है। इस मठ का निर्माण आज के इंडोनेशिया के श्रीविजय साम्राज्य के शासक श्री मारा विजयोतुंग वर्मन ने करवाया था।
जानें क्या कहते हैं इतिहासकार
इतिहासकारों का मानना है कि ये शिलालेख चोल साम्राज्य के स्वर्णकाल में दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच मजबूत समुद्री व्यापार, धार्मिक मेल-जोल और सांस्कृतिक संबंधों की अहम जानकारी देते हैं। इन अभिलेखों से यह भी पता चलता है कि उस समय के हिंदू शासक बौद्ध संस्थानों को भी संरक्षण और सहायता देते थे। इससे अलग-अलग धर्मों के बीच आपसी सम्मान और साथ मिलकर रहने की परंपरा की झलक मिलती है।
इतिहासकारों और विद्वानों के मुताबिक, उस समय भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच गहरे सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध थे। माना जाता है कि प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान दीपंकर श्रीज्ञान, जिन्हें “अतीश” के नाम से भी जाना जाता है, इंडोनेशिया तक यात्रा कर चुके थे। वहीं, नालंदा विश्वविद्यालय जाने वाले कई चीनी बौद्ध यात्री भी भारत आने के दौरान इस क्षेत्र से होकर गुजरते थे।
अन्नामंगलम तांबे की प्लेट इसलिए हैं बेहद खास
अन्नामंगलम तांबे की प्लेट अपने आकार और बनावट के कारण भी बेहद खास मानी जाती हैं। इनमें 21 बड़ी और 3 छोटी तांबे की चादरें हैं, जिनका कुल वजन करीब 30 किलोग्राम है। ये सभी प्लेटें एक गोल तांबे के छल्ले से जुड़ी हुई हैं, जिस पर चोल राजवंश की शाही मुहर बनी हुई है। हालांकि यह अनुदान सम्राट राजराजा चोल प्रथम के शासनकाल में दिया गया था, लेकिन इतिहासकारों के अनुसार उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम ने बाद में इन जानकारियों को हमेशा के लिए सुरक्षित रखने के लिए तांबे की प्लेटों पर खुदवाने का आदेश दिया था। विशेषज्ञों का मानना है कि ये तांबे की पट्टिकाएं सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड नहीं हैं, बल्कि बेहद कीमती ऐतिहासिक दस्तावेज़ हैं। इनके जरिए मध्यकालीन दक्षिण भारत की समृद्ध संस्कृति, समुद्री व्यापार और दुनिया के दूसरे हिस्सों से जुड़े रिश्तों की जानकारी मिलती है।
चोल राजवंश का उदय तब हुआ, जब शासक विजयालय ने लगभग 850 ईस्वी में तंजावुर पर कब्जा किया। चोल शासन के दौरान तमिल सभ्यता ने व्यापार, कला, वास्तुकला और प्रशासन के क्षेत्र में काफी प्रगति की। इस दौर की सबसे बड़ी वास्तुकला उपलब्धियों में से एक बृहदीश्वर मंदिर है, जिसे 10वीं सदी के आखिर में सम्राट राजराजा चोल प्रथम ने बनवाया था। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर आज यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है। चोल काल अपनी खूबसूरत कांस्य मूर्तियों के लिए भी प्रसिद्ध रहा। उस समय बनाई गई कई मूर्तियां आज भी अपनी शानदार कला और बारीक कारीगरी के लिए दुनियाभर में सराही जाती हैं।