जहां तक भारत रत्न का सवाल है, उससे सिर्फ अपनी विचारधारा और अपनी पार्टी के लोगों को नहीं नवाजा है मोदी ने, जैसा नेहरू करते थे, बल्कि उन विभूतियों को भी नवाजा है, जिनके अपने राजनीतिक शिष्य कहे जाने वाले लोग उनके लिए कुछ नहीं कर पाए थे। कर्पूरी ठाकुर का उदाहरण सबके सामने है, जिन्हें भारत रत्न प्रदान करने का यश मोदी ने हासिल किया। ये काम लालू यादव जैसे लोगों ने नहीं किया, जिन्होंने कर्पूरी ठाकुर के नाम पर ही अपनी राजनीति चमकाई और जमकर उनका फायदा उठाया। मोदी ने 2024 में न सिर्फ कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से नवाजा बल्कि लालकृष्ण आडवाणी, पीवी नरसिंह राव और एमएस स्वामीनाथन को भी। राव और स्वामीनाथन का कोई संबंध बीजेपी से नहीं था, बल्कि राव तो वो प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने आरएसएस पर आखिरी बार प्रतिबंध लगाया था, 1992 में विवादस्पद बाबरी ढांचा विध्वंस के बाद। जहां तक रिश्तों को संभालने, खुद से पहल कर सुधारने का सवाल है, उसके लिए मोदी का नीतीश कुमार के मामले में दिखाया गया बड़प्पन सबके सामने है। जिन नीतीश ने बार- बार मोदी का साथ छोड़ा, उन्हें अपमानित किया, उन्हें भी सहेजते रहे मोदी, ये सोचकर कि भारतीय राजनीति में नीतीश जैसे लोग कम ही हैं, जो सियासी तौर पर लंबे लमय तक विरोधी रहने के बावजूद ईमानदारी और शुचिता के मामले में विरले हैं।