Rakhigarhi Human Skeletal Remains: हरियाणा के ऐतिहासिक सिंधु-सरस्वती सभ्यता स्थल राखीगढ़ी (Rakhigarhi) से हाल ही में मिले मानव कंकालों ने इतिहासकारों और वैज्ञानिकों की उत्सुकता बढ़ा दी है। राखीगढ़ी के इस प्राचीन रहस्य से पर्दा उठाने के लिए अब देश की दो बड़ी राष्ट्रीय संस्थाएं एक साथ आई हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने विस्तृत वैज्ञानिक जांच और उन्नत अनुसंधान के लिए इन मानव अवशेषों को भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण (AnSI) को सौंप दिया है। दोनों संस्थाओं के बीच हुए एक MoU के तहत इस ऐतिहासिक शोध को आगे बढ़ाया जा रहा है।
मलबे और कब्रों से क्या मिला?
राखीगढ़ी को सिंधु-सरस्वती सभ्यता का अब तक का सबसे बड़ा ज्ञात स्थल माना जाता है। यह हरियाणा में लगभग 550 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। यहां प्रारंभिक हड़प्पा काल से लेकर परिपक्व हड़प्पा काल तक के निरंतर निवास के प्रमाण मिले हैं। हाल ही में एएसआई (ASI) की उत्खनन शाखा-II द्वारा फील्ड सीजन 2025-26 के दौरान राखीगढ़ी के टीला नंबर 7 में खुदाई की गई थी।
यह इलाका पहले से ही एक कब्रिस्तान के रूप में चिन्हित है। इस खुदाई के दौरान कुल आठ कब्रों का पता चला। इन कब्रों से 3 पूरे मानव कंकाल बरामद किए गए। दूसरे कब्रों से मानव कंकालों के कई महत्वपूर्ण टुकड़े भी मिले हैं। इन सभी अवशेषों को विस्तृत जांच के लिए कोलकाता स्थित AnSI की प्राचीन मानव कंकाल प्रयोगशाला और रिपोजिटरी में स्थानांतरित कर दिया गया है। अधिकारियों के मुताबिक इस साइट से मिले बाकी अवशेषों को भी अगले कुछ दिनों में सौंप दिया जाएगा।
आधुनिक तकनीक से खुलेंगे इतिहास के पन्ने
AnSI के महानिदेशक प्रो बीवी शर्मा के मुताबिक इस ट्रांसफर से सिंधु-सरस्वती सभ्यता के इस महत्वपूर्ण शहरी केंद्र के बहु-विषयक अनुसंधान को बड़ी गति मिलेगी। वैज्ञानिक इन कंकालों पर कई आधुनिक और उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल करेंगे। कंकालों के जेनेटिक्स और जीनोमिक इतिहास की पड़ताल की जाएगी।
स्थिर आइसोटोप अध्ययन से उस दौर के लोगों के खान-पान और गतिशीलता को समझने की कोशिश होगी। ऑस्टियोलॉजिकल और पैलियोपैथोलॉजिकल जांच से कंकालों की शारीरिक बनावट, बीमारियों के प्रसार और स्वास्थ्य के स्तर को जानने का प्रयास किया जाएगा। पर्यावरण पुनर्निर्माण से हड़प्पा काल के दौरान मानव और पर्यावरण के बीच के संबंधों को समझने की कोशिश की जाएगी।
देश-विदेश के बड़े संस्थान मिलकर करेंगे रिसर्च
इस ऐतिहासिक खोज के रहस्यों को सुलझाने के लिए AnSI अकेले काम नहीं कर रही है, बल्कि वह देश और दुनिया के कई प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ साझेदारी करेगी। इस रिसर्च टीम में शामिल होंगे। इसमें बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP), बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU), ब्रिटेन का यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) शामिल हैं।
सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB), हैदराबाद के वरिष्ठ वैज्ञानिक और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित डॉ कुमारस्वामी थनगराज ने बताया कि इन अवशेषों पर 'एंशिएंट डीएनए टेक्नोलॉजी' के इस्तेमाल से ईसा पूर्व 3000 (3000 BCE) के समय से मानव जीनोम के विकास, अनुकूलन और प्राकृतिक चयन को समझने में मदद मिलेगी। वहीं बीएचयू के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि इससे हड़प्पा आबादी के वंश, स्वास्थ्य और जीवन शैली के पुख्ता सबूत मिलेंगे।
4। सालों बाद AnSI के इस गौरवशाली शोध का पुनरुद्धार
अधिकारियों ने बताया कि साल 1945 में अपनी स्थापना के समय से ही AnSI के पास सिंधु-सरस्वती स्थलों से मिले अवशेषों पर ऑस्टियोलॉजिकल शोध की एक लंबी परंपरा रही है। विभिन्न चुनौतियों की वजह से बीते वर्षों में यह काम धीमा पड़ गया था। अब संस्थान ने विशेष अनुसंधान टीमों का गठन कर और वैज्ञानिकों को विशेष प्रशिक्षण देकर 'पैलियोएंथ्रोपोलॉजिकल रिसर्च' (पुरामानवविज्ञानी अनुसंधान) को पुनर्जीवित करने के प्रयास शुरू किए हैं।
डेक्कन कॉलेज (पुणे) के पूर्व प्रोफेसर सुभाष वालिंबे और राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर किशोर के। बासा ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि शहरीकरण ने मानव जीवविज्ञान को कैसे प्रभावित किया, यह समझने के लिए गहन नृवंशविज्ञान परीक्षा बेहद जरूरी है।