सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया केंद्र सरकार को नोटिस, चुनाव आयुक्तों को 'आजीवन सुरक्षा' और नियुक्ति प्रक्रिया पर छिड़ी कानूनी जंग

SC Issues Notice To Centre: याचिका में 'मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त के नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यावधि अधिनियम, 2023' की वैधता पर सवाल उठाए गए है। याचिका का दावा है कि यह कानून CEC और ECs को उनके कार्यकाल के दौरान किए गए किसी भी कार्य के लिए दीवानी और आपराधिक कार्यवाहियों से जीवनभर के लिए सुरक्षा प्रदान करता है

अपडेटेड Jan 12, 2026 पर 4:14 PM
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याचिका में 'मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त के नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यावधि अधिनियम, 2023' की वैधता पर सवाल उठाए गए है

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने आज केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग (ECI) को एक महत्वपूर्ण नोटिस जारी किया है। यह नोटिस उस याचिका पर आधारित है जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) को अभियोजन से 'आजीवन मुक्ति' देने वाले नए कानून को चुनौती दी गई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि न्यायालय इस गंभीर संवैधानिक प्रश्न की बारीकी से जांच करेगा।

'आजीवन सुरक्षा' पर है विवाद

याचिका में 'मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त के नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यावधि अधिनियम, 2023' की वैधता पर सवाल उठाए गए है। याचिका का दावा है कि यह कानून CEC और ECs को उनके कार्यकाल के दौरान किए गए किसी भी कार्य के लिए दीवानी और आपराधिक कार्यवाहियों से जीवनभर के लिए सुरक्षा प्रदान करता है। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि संविधान निर्माताओं ने ऐसी व्यापक सुरक्षा जजों को भी नहीं दी थी। संसद ऐसा 'कवच' कैसे दे सकती है जो अन्य संवैधानिक उच्चाधिकारियों के पास भी नहीं है?


नियुक्ति समिति पर भी उठ रहे सवाल

याचिका में उस बदलाव को भी चुनौती दी गई है जिसके तहत चुनाव आयुक्तों को चुनने वाली समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर कर दिया गया है। 2023 के कानून के अनुसार, समिति में प्रधानमंत्री, लोक सभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। कांग्रेस कार्यकर्ता जया ठाकुर की याचिका में कहा गया है कि CJI को हटाकर कैबिनेट मंत्री को शामिल करने से चयन प्रक्रिया में सरकार का पलड़ा भारी हो गया है, जो निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट बनाम संसद

यह मामला न्यायिक और विधायी शक्तियों के बीच टकराव को लेकर है। मार्च 2023 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि नियुक्तियां एक निष्पक्ष पैनल PM, विपक्ष का नेता और CJI द्वारा की जाएं, जब तक कि संसद कोई कानून न बना ले।दिसंबर 2023 में सरकार ने शीतकालीन सत्र में नया कानून पारित किया और CJI को पैनल से हटा दिया। विपक्ष ने इसे अदालती आदेश की भावना को कुचलने वाला कदम बताया था।

अब आगे क्या होगा?

दिसंबर 2025 में तत्कालीन CJI संजीव खन्ना ने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था क्योंकि इसमें मुख्य न्यायाधीश की भूमिका पर ही सवाल थे। अब जस्टिस सूर्यकांत की बेंच द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद केंद्र सरकार को इस कानून के बचाव में अपना पक्ष रखना होगा। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या चुनाव आयोग जैसी संस्था की स्वायत्तता बनाए रखने के लिए जजों की तरह ही चुनाव आयुक्तों को भी नियुक्ति पैनल में न्यायिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है या नहीं।

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