TMC को टूटने से बचाने के लिए ममता ने चला आखिरी दांव, भंग की पार्टी की सभी कमेटियां, अब क्या करेंगे बागी विधायक?

TMC vs Asli TMC: इस पूरे संकट के केंद्र में हैं पार्टी से निकाले गए नेता ऋतब्रत बनर्जी। ऋतब्रत ने बुधवार को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रथींद्र बोस से मुलाकात की। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि उनके पास TMC के लगभग 60 विधायकों (MLAs) का समर्थन पत्र था

अपडेटेड Jun 03, 2026 पर 3:19 PM
TMC को टूटने से बचाने के लिए ममता ने चला आखिरी दांव, भंग की पार्टी की सभी कमेटियां, अब क्या करेंगे बागी विधायक?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बुधवार को एक बहुत बड़ा भूचाल आ गया। लगातार 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद, हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में करारी हार झेलने वाली ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) अब बगावत के दौर से गुजर रही है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि पार्टी के दो-फाड़ होने का खतरा मंडरा रहा है।

इस बड़े संकट को भांपते हुए ममता बनर्जी की अगुवाई वाली TMC ने एक बेहद चौंकाने वाला फैसला लिया है। पार्टी ने पश्चिम बंगाल में अपनी सभी कमेटियों और संगठनों को तुरंत प्रभाव से भंग कर दिया है। पार्टी का कहना है कि वे अब नए सिरे से आत्ममंथन करेंगे और संगठन को दोबारा खड़ा करेंगे।

बगावत की पूरी कहानी: शिवसेना जैसा टर्निंग पॉइंट?


इस पूरे संकट के केंद्र में हैं पार्टी से निकाले गए नेता ऋतब्रत बनर्जी। ऋतब्रत ने बुधवार को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रथींद्र बोस से मुलाकात की। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि उनके पास TMC के लगभग 60 विधायकों (MLAs) का समर्थन पत्र था।

गौर करने वाली बात यह है कि विधानसभा में TMC के कुल 80 विधायक हैं। इनमें से करीब 60 विधायक बुधवार को विधानसभा में एक बैठक के लिए इकट्ठा हुए। राजनीति के जानकारों का कहना है कि यह संख्या बहुत बड़ी है। दलबदल कानून (Anti-Defection Law) से बचने के लिए दो-तिहाई विधायकों का साथ होना जरूरी होता है, और बागियों के पास यह संख्या मौजूद है। यह बिल्कुल वैसा ही मामला लग रहा है जैसा 2022 में महाराष्ट्र में हुआ था, जब एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत करके शिवसेना को दो हिस्सों में बांट दिया था।

TMC विधायक मुस्तफिजुर रहमान ने भी मीडिया से बात करते हुए माना, "मैं सुन रहा हूं कि 59 विधायकों ने दस्तखत कर दिए हैं, और मैंने भी इस पर साइन किए हैं।"

ममता से बैर नहीं, लेकिन अभिषेक बनर्जी मंजूर नहीं!

इस बगावत में एक बहुत ही दिलचस्प पेंच है। बागियों ने विधानसभा अध्यक्ष को जो पत्र सौंपा है, उसमें ममता बनर्जी को ही पार्टी की 'चेयरपर्सन' (प्रमुख) बताया गया है। यानी बागी गुट सीधे ममता बनर्जी को चुनौती नहीं दे रहा है, बल्कि वे विधानसभा के भीतर की लीडरशिप और ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ हैं।

सूत्रों के मुताबिक, बागी विधायकों ने साफ कह दिया है कि पार्टी और विधायकों के फैसलों में उन्हें अभिषेक बनर्जी की कोई भी दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं है।

वफादारों ने कहा- "पीठ में छुरा घोंपा"

दूसरी तरफ, TMC के सीनियर नेता और विधायक कुणाल घोष ने इस बगावत को पार्टी के साथ गद्दारी बताया है। उन्होंने कहा, "अगर इन लोगों को कोई भी शिकायत या परेशानी थी, तो इन्हें पार्टी के अंदर बात करनी चाहिए थी। लेकिन इन्होंने पीठ में छुरा घोंपने का काम किया है।" घोष ने बागियों को 'गद्दार' बताते हुए दावा किया कि पार्टी इस संकट से उबर जाएगी और ममता बनर्जी के नेतृत्व में एकजुट रहेगी।

विवाद की शुरुआत कहां से हुई?

इस झगड़े की जड़ें 6 मई को ममता बनर्जी के घर पर हुई एक मीटिंग से जुड़ी हैं।

चुनाव हारने के बाद TMC ने विधानसभा में सोवनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष (LoP - विपक्ष का नेता) और फिरहाद हाकिम को चीफ व्हिप बनाने का फैसला किया।

लेकिन विधानसभा सचिवालय ने इस फैसले को मंजूरी नहीं दी। नियम के मुताबिक, इन पदों के लिए सभी विधायकों की औपचारिक बैठक में बकायदा चुनाव होना चाहिए था।

इसके बाद बागी विधायकों ने आरोप लगाया कि पार्टी लीडरशिप को जो दस्तखत उन्होंने किसी और काम के लिए दिए थे, उनका गलत इस्तेमाल करके सचिवालय को सूची भेज दी गई।

जब तनाव बढ़ा, तो पार्टी ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से बाहर निकाल दिया। लेकिन पासा उलटा पड़ गया और निकाले गए ऋतब्रत बनर्जी ही इस पूरी बगावत का मुख्य चेहरा बनकर उभरे। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जावेद खान जैसे दिग्गज नेता, जो सालों से ममता बनर्जी के सबसे वफादार माने जाते थे, वे भी इस समय बागी गुट के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।

कानूनी तौर पर विपक्ष का नेता बनने के लिए सिर्फ 30 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है, जो कि दोनों गुटों के पास आसानी से है। लेकिन अब लड़ाई सिर्फ पद की नहीं है। अब असली जंग इस बात की है कि 'असली TMC' किसकी है और विधानसभा के भीतर पार्टी पर किसका नियंत्रण रहेगा। बंगाल की राजनीति किस करवट बैठेगी, इस पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।

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