दिवाली से पहले दिल्ली की एयर क्वालिटी में भारी गिरावट आई है, जिसके कारण अधिकारियों को बढ़ते प्रदूषण से निपटने के लिए GRAP (ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान) फेज 1 लागू करना पड़ा है। राष्ट्रीय राजधानी का एयर क्वालिटी इंडेक्ट (AQI) 'खराब' श्रेणी में पहुंच गया है, जिससे लाखों लोगों के स्वास्थ्य और दैनिक जीवन पर असर पड़ रहा है। इस नियम का उद्देश्य प्रदूषण के सोर्स पर अंकुश लगाना और संवेदनशील आबादी की सुरक्षा करना है, क्योंकि शहर बिगड़ते धुंध और जहरीली हवा से जूझ रहा है।
बुधवार को दिल्ली के साथ-साथ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में भी एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) बिगड़ गया। नोएडा में सुबह 7 बजे AQI 369 पर पहुंच गया, जो आज सुबह 5 बजे 228 था। शहर में धुंध की एक परत छाई हुई थी। गाजियाबाद में सुबह 5 बजे से 7 बजे के बीच AQI 320-325 के बीच रहा। फरीदाबाद में AQI सुबह 5 बजे 252 से बढ़कर सुबह 7 बजे 267 हो गया।
खराब AQI को देखते हुए दिल्ली-NCR में प्रदूषित इलाकों में रहने वाले लोगों को मास्क पहनने और जितना हो सके घर के अंदर रहने की सलाह दी जाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लोगों को हवा में मौजूद जहरीले प्रदूषकों के कारण बाहर टहलने, जॉगिंग करने या व्यायाम करने से बचने की सलाह दी है।
AQI यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स या वायु गुणवत्ता सूचकांक की तय सीमा अलग-अलग स्तरों में बांटी गई है- 0 से 50 तक को “अच्छा”, 51 से 100 को “मध्यम”, 101 से 200 को “खराब”, 201 से 300 को “बहुत खराब”, 301 से ऊपर को “खतरनाक” श्रेणी में रखा जाता है। अगर AQI 100 से नीचे रहे तो एयर क्वालिटी सामान्य मानी जाती है, लेकिन 200 के ऊपर पहुंचने पर सांस लेने में दिक्कत या स्वास्थ्य संबंधित समस्याएं हो सकती हैं, और 300 पार होने पर हवा बेहद हानिकारक मानी जाती है।
आपके शहर का कितना है AQI?
Data Source: aqi.in/dashboard
दिल्ली में आर्टिफशियल बारिश की तैयारी
वहीं दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने बुधवार को यह घोषणा की कि दिल्ली भर में क्लाउड सीडिंग के लिए पायलट ट्रेनिंग पूरी हो गई है। उन्होंने कहा, "अगर आने वाले 2-3 दिनों में मौसम अनुकूल रहा, तो भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की अनुमति से सरकार तीन घंटे का यह अभ्यास आयोजित करेगी।"
क्लाउड सीडिंग या मेघ-बीजन एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसके जरिए आर्टिफिशियल तरीक से बारिश कराई जाती है। जब प्राकृतिक तौर पर बादल तो होते हैं लेकिन उनसे बारिश नहीं होती, तब वैज्ञानिक उन्हें बरसाने के लिए यह तकनीक अपनाते हैं।
क्लाउड सीडिंग में कुछ खास तरीके के केमिकल, जैसे सिल्वर आयोडाइड, ड्राई आइस या सामान्य नमक, हवा में या बादलों के अंदर छोड़े जाते हैं। ये रसायन बादलों में मौजूद पानी की नमी को आकर्षित करते हैं और छोटे-छोटे पानी के कणों को जोड़कर बड़ी बूंदें बनाते हैं, जो फिर बारिश के रूप में गिरती हैं। इस प्रक्रिया के लिए आमतौर पर विमान, रॉकेट, या जमीन से चलने वाले जनरेटरों का इस्तेमाल किया जाता है।